Saturday, 4 March 2017

संतोष चौबे की 'अकवि समय' पुस्तक की समीक्षा

समीक्षा- इस अकवि समय में/संतोष चैबे/मेधा बुक्स दिल्ली
       एक असंवेदी युग में कवित्व की संभावनाओं का उद्घोष
                                                   प्रभुदयाल मिश्र

        श्री संतोष चैबे की काव्य कृति इस अ-कवि समय में कविता की उस सार्वभौम शक्ति की उद्घोषणा है जो वस्तुतः काल को उसके अस्तित्व का बोध कराती है । अर्थात् कविता के लिए कवि को भाव अथवा भूमिका की तलाश में भटकने की आवश्यकता नहीं रहती । वह भी ठीक आदमी की आत्मा अथवा ब्रह्म की ही भाँति (तेरा साईं तुज्झ में कहना कुछ और भी निकट होगा) उसके बहुत ही करीब लगातार उसके साथ ही चलती रहती है । श्री चौबे को बखूबी उसकी अच्छी पहचान है । अतः वे समय को चुनौती देने में जैसे समर्थ हैं ।
        यूं श्री संतोष यह बखूबी समझते हैं कि कम से कम दुनियां के दूसरे लोगों के वास्ते ही सही, उन्हें समय का चुनाव कर लेना चाहिए । जाहिर है इसके लिए पहले उन्हें ऐसी तमाम स्थितियों का मुआयना कर लेना होगा जो उनके चैतन्य न रह पाने से उनके विरोध में खड़ी हो जाती हैं । इसके लिए वे अपने में अतीन्द्रिय सामरथ्य भी खोजने लगते हैं-
 इतना हल्का /कि उड़ सकूं/पूरे आकाश में
 इतना पवित्र/कि जुड़ सकूं/पूरी पृथ्वी से
इतना विशाल /कि समेट लूं /पूरा विश्व अपने में -पृ.14/15
    अब प्रश्न यही रहता है कि इस कवि की कविता उसे कितने दूर ले जाती है/ले गई है-
फिसलते /नेत्र फिसलते दृष्य/फिसलती /गति फिसलते सत्य
आदमी /की नीयत में खोट
सतह /के नीचे के विस्फोट- पृ. 92
-कोई सीमा नहीं है, कोई हद नहीं है । वह कहीं भी/किधर को भी चल पड़ता है । यह हद यदि अपने आपको बचा रखती है, तो बचाले,  कवि तो कितनी भी लम्बी रेखा खींच लेने का माद्दा रखता है !

  अच्छा हो समय को दी गई इस चुनौती को हम समय के सुपुर्द कर यह प्रतीक्षा करें कि कल -(- करीब एक चौथाई दशक का समय) कवि को क्या जबाब लेकर आता है!                                                                                        35, ईडन गार्डन, भोपाल, १६ 

Thursday, 16 February 2017

सत्यं परं धीमहि

कृति -  शाश्वत सत्य /रचनाकार – रामनिवास खंडेलवाल
सम्पादन- डा. स्वाति तिवारी/प्रकाशन- परम्परा प्रकाशन, साईं कृपा कोलोनी, इंदौर  
                      सत्यं परं धीमहि
                                  प्रभुदयाल मिश्र
श्री रामनिवास खंडेलवाल द्वारा अपने प्रियजनों को लिखे शताधिक पत्रों से सुप्रसिद्ध लेखिका डा. स्वाति तिवारी ‘शाश्वत सत्य’ का साक्षात्कार करते हुए उसे इस कृति के पाठकों को भी परिचित कराते हुए चुनौतीपूर्ण कार्य किया है. इस तरह का महान संकल्प द्वापर युग में भागवत की रचना करते हुए भगवान् वेदव्यास ही कभी सामने लेकर आये थे जिन्होंने इस महापुराण के आरम्भ में यह प्रतिज्ञा कथन किया कि मैं ‘परम सत्य के अनुसंधान में प्रवृत्त हुआ हूँ – सत्यं परम धीमहि ! यहाँ प्रश्न यह उठता है कि परम अर्थात शाश्वत सत्य के साक्षात्कार की विधा क्या हो सकती है – ध्यान, तप, उपासना, कविता या कि पत्र ? इस सम्बन्ध में सामान्य सहमति न भी बने तब भी यह कहा जा सकता है कि एक विशुद्ध रचनाधर्मिता निश्चित ही इस महत कार्य की भूमिका हो सकती है. और स्वातिजी की स्वधर्मिता जब इसका साक्ष्य दे रही होती है तो इस पर संदेह की गुंजायश प्रायः नहीं बचती.
‘शब्दों’ के शिलालेख’, ‘विद्वानों की बात’, ‘ज्ञानवाण’, ’जीवन अनंत है’ और ‘किताबें’ आदि संश्लिष्ट शीर्षों में पिरोये इन पत्रों के सार भाग को ही संग्रहीत किया गया है. दुनिया की अनेक भाषाओं में पत्र शैली में कालजयी कथा साहित्य, उपन्यास और संस्मरण साहित्य की रचना हुई है. किन्तु इन्हें पढ़ते हुए पाठक जैसे इस मूलभूत अविश्वास को सदा दवाकर रखता है कि ये पत्र वास्तव में तो नहीं ही लिखे गए हैं तथा यह कि वे केवल कल्पना की उड़ान भर हैं. किन्तु यहाँ वैसा बिलकुल नहीं है. इन पत्रों के लेखक श्री खंडेलवाल का आत्मसंघर्ष, जिजीविषा और अपने प्रियजनों- विशेषकर पुत्री और दौहित्र आदि के कल्याण का भाव लेखक को लेकर उत्कृष्ट पारिवारिक, सामाजिक, संस्कृत और लोक चेतना का परिचायक है.
वर्तमान युग में मुद्रण, प्रकाशन और संचार के साधन सुगमता से उपलब्ध हैं. यदि आज के रामनिवास खंडेलवाल अपने पूर्वोक्त दायित्व के भाव को लेकर चलते हैं तो वे, ट्वीटर, फेसबुक, इन्स्ताग्राम,जीप्लस,लिंक्डइन,व्हात्सप आदि नाना माध्यमों को साधकर भी इतना लिख और प्रकाशित नहीं करा सकते थे. आज के माध्यमों की सीमा यह है कि संक्षेप और सीमा की शर्त उसमें रचनाधर्मी को पंख फैलाने की फुर्सत नहीं देती. इस अर्थ में यह किताब हाल में ही बीत गए उस युग की सलामती का दस्तावेज हो जाती है जो हमारे हाथ से लगातार खिसकता जा रहा है.
एक प्रश्न यह भी प्रायः उठता है कि ‘शब्दों के ये शिलालेख’ इतिहास – साहित्य, संवाद, परिवार, समाज और संस्कृति की धारा में कितनी दूर तलक ठहरेंगे ? यह बहुत ही स्वाभाविक है कि यह ललक शब्द शिल्पी में ही नहीं, प्रत्येक व्यक्ति में ही होती है कि वह स्वयं न होते हुए भी अपने शब्द, क्रिया और सम्बन्ध की भूमिका में बहुत दूर तक जिए. किन्तु ‘कविहिं अरथ आखर बल साँचा’- एक शब्द शिल्पी, रचना कार की अपने बल की सत्यता पर निर्भरता कहीं बहुत अधिक होती है. इस पुस्तक के लोकार्पण के समय डा. स्वाति तिवारी ने शब्द ब्रह्म की सत्ता का उल्लेख किया था. गीता में ‘अक्षरं ब्रह्म परमं’ कहा गया है. तुलसीदास जी ने रामायण में ‘वरणानाम अर्थसंघानाम’ की बात कही है. दार्शनिक दृष्टि से ‘शब्द’ आकाश की तन्मात्रा है. आकाश स्वयं में परम व्याप्ति है. अतः यह परम, शाश्वत सत्य ही है कि शब्द का आश्रय अपनी व्याप्ति में आकाश के समानांतर पहुंचाता है. अस्तु इति शम .   
३५, ईडन गार्डन, चूनाभटटी, कोलार रोड भोपाल १६ -०४२५०७९०७२             
       pdmishrabpl67@hotmail.com

Saturday, 21 January 2017

The Gita For All - Introduction

HOW THIS BOOK HAS COME TO BE WRITTEN

I have not intended any commentary or attempted exhaustive notes on either the philosophy or the teachings of the Gita after the manner of the philosophers and scholars of India and abroad. This book has just come up strangely from a small Sanskrit text which I carried with me during my visit in the summer 1989 to the erstwhile USSR, where, to my knowledge and understanding, talking about God or religion would have been an offense. I was not even confident enough there while sharing in a closed room the unsuppressed enthusiasm of a Tajik gentleman Hakim Shah who wondered if people would some day move in the streets of Dushanbey, the Capital of Tajikistan (A Republic of the then USSR), chanting ‘Hare Krishna’. It was, therefore, not a surprise to me that I was asked to put down the ‘Message of the Gita on Yoga in Everyday Life’ for the local newspapers after lecturing on different aspects of Yoga at the ‘Iroda’ Yoga Centre there. It was during the course of these lectures that I was required to give a detailed background of the Indian Yoga system and the practices advocated by various exponents of it through the ages. I believe, a quotation from an article published in ‘Communist Tajikistan’ (a Russian daily of Tajikistan) would be of quite some interest for the readers:
“YOGA is one of the six systems of Indian philosophy.1 According to these ancient systems and theories, Indian seers of past have tried to explain the purpose of life, the world and the overall design of God and nature. Yoga, among them, lays much greater emphasis on human capabilities. According to it, it is not important whether there is a God or not, but it is desirable that a man realizes his potential in accordance with his conception of Godhood. The founder of this science was PATANJALI whose theory has been propounded in his famous work YOGADARSHANA (The Science of Yoga).2 Yogadarshana explains in detail that there are eight steps of yoga practice. They are YAMA (mental discipline), NIYAMA (adherence to certain rules), ASANA (physical postures ), PRANAYAMA (breathing exercises), PRATYAHARA (making mind introspective), DHARANA (contempolation), Dhyana (mediation) and SAMADHI (realization). In brief, physical and mental preparation is necessary for one to tread the higher paths of YOGA.
Another famous exponent of the Yoga system is Lord Krishna. Krishna’s classic conversation with his friend and disciple Arjuna is recorded in a unique book called the BHAGVAT GITA. Krishna does not talk much about theories in it since Arjuna is facing a mighty army in the battlefield and he wishes to have an immediate and practical solution of his doubts concerning the propriety of killing his close relatives assembled in the battlefield. Krishna first explains that every living being has an immortal and a mortal part and to believe him to be dying is a mistaken notion. He further points out to Arjuna that when a man becomes yogi his actions are transformed into KARMAYOGA (skilled actions). In such actions there is invariably such an added efficiency that they do not follow the causal sequence.
This science of yoga remained confined to the monks and mendicants for centuries. It is now a highly acclaimed feature of modern advanced age and the peoples’ conscience all over the world is all influenced by it now. Tilak and Mahatma Gandhi were first such modern Indians who put this knowledge into practice for the liberation of India from the British Rule. In 1893, Swami Vivekananda startled the whole world by demonstrating the splendor of Yoga in the Parliament of World Religions in Chicago (USA). His teachings of Rajayoga have been immensely popular ever since. There are numerous institutions run after his teachings of Yoga. They, are rendering many constructive humanitarian services to the society in India and abroad.
Broadly, yoga in India has two main branches: Hatha Yoga (Yoga of physical exercises) and Dhyana Yoga (the Yoga of meditation). Further divisions like Bhakti Yoga (the Yoga of devotion), Karma Yoga (the Yoga of action), Gyana Yoga (the Yoga of knowledge), and Rajayoga (Yoga the  Supreme ), fall under the second category. I had accompanied Maharshi Mahesh Yogi during 1968-69 to All India Institute of Medical Sciences, New Delhi, when experiments on the efficacy of his ‘transcendental meditation’ were being conducted. According to this system, meditation effectively releases people from the stress and strain and fills them with an added energy, intelligence and happiness.
An absolutely authentic record of the  splendor  of yoga is available in the biography of Yoganand Paramhansa called ‘An Autobiography of a Yogi’. This yogi died in 1950, but his dead body was certified by eminent physicians as intact even after 24 days of his passing away. We find the first hand record of this Yogi describing how he met his teacher Yukteswara in the Regent Hotel of Bombay at 3 p.m. on 6th June, 1939, after 99 days of his departure from the world. He had a three hour long discussion with his departed guru while receiving advance courses on this science. He has provided a photograph of Mahavatara Baba also who was his great grand teacher and who, according to him is alive for more than 3500 years.
Late Shri Shivananda Saraswati of Rishikesh U.P. India, himself initially a physician, made immense contribution towards a systematic exposition of this science through many books and has a wide ranging following in India and abroad.
Yoga tends to become mystical in the course of the expansion of consciousness of a man. Yogis tell us that there is a mysterious power called Kundalini lying dormant at the base of the spinal cord in every human being. If this power is awakened and activated, a man can perform miracles by exercising conscious control over his autonomous nervous system. He can also at the same time experience extra-sensory perceptions like hearing, seeing and smelling things existing at any distance or time. Some Yogis call it the science of Shaktipata (the incidence or fall of energy from the enlightened one to the disciple). By following this system, the aspirants does not have himself to take any trouble of being effortful doing the physical exercises because they occur automatically once the dormant power of the person is awakened and put to action. Late Swami Vishnuteertha of Dewas, MP India had his disciple Swami Shivomteertha have this competence. Late Swami Muktananda of Bombay also was an acclaimed yogi of this category.
The devotional aspects and properties of yoga have been vitalized by Bhaktivedanta Prabhupada of Krishna Consciousness and Satya Sai Baba of South India. Srila Prabhupada prescribes a Mantra for chanting whose vibrations lift a person on to a transcendental plane. Sai Baba is a man of miracles. He says that the miracles are as inherent in his nature as the normal physical movements of an ordinary human being. I have myself witnessed a number of miracles while visiting him many times in his place and have experienced them several times from a distance of thousands of kilometers. I have seen many kilograms of sacred ashes falling from his empty hand while materializing also many precious objects from nowhere. The greatest of all his miracles is the universal love flowing from his person which keeps millions of people in his following. His Yogic presence is felt and experienced by thousand of people all over the world.”
It was afterwards on August 14, 1991, that I was sitting in a long queue of about 40 thousand people in Puttaparthy with this manuscript in my hand. Sai Baba walked in my direction and halted for some moments, but I could not seek his blessings for the book as I wished. My desire of dedicating it to Sai Baba in the literal sense seemed to remain unfulfilled till I had the following dream at 5 AM on 7th June, 1992 (exactly a week before I heard from my Publishers about their willingness to print the book with some modifications as per editorial screening). I am reproducing here the vivid dream from a personal note made immediately after it.
‘I am just awake from a vivid dream. It must have been exactly 5 AM at the time of my undergoing this awakened experience! - I am sitting among devotees of Sai Baba, praying for Baba to appear. He appears. Baba looks towards my direction and characteristically asks me not to talk about the approval of the book as he has been waiting for the ‘Doctors’ examination. He also mentions that there is the need to change some of the references. The devotees present there urge that the pattern of the book is flexible enough to accommodate necessary changes.
‘Baba agrees. He nods his head. He asks me if it is so. Then he asks me to give him the copy of the book. He opens the last page. He asks me if it is the first copy. I say ‘Yes, it is’. He puts his signature stating ‘The first copy signed.’
Can knowledge and action be indeed combined? Yes, Gita teaches and trains for it..
It is evidently improper to think that the Gita just teaches Yoga or Knowledge, or Action. The Gita has been an eternal source of all universal philosophies and shall continue to remain so for ever.
What is the significance of the Yoga technique which Krishna lays so much stress on and the ‘Supreme Knowledge’ which he introduces with adjectives like ‘Top most secret’, ‘Superbly sacred’, ‘Directly experienced’, ‘Righteous’, ‘Easy to practice’ and ‘Imperishable’.
                                                  राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्
             प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं  कर्तुमव्ययम् ।.( 9-2)
As a matter of fact, the technique and the science that Krishna introduces does not differ in the sense that it points out the knowledge which should form the basis of all our doings. Our actions in this manner shall stand qualified to be termed as ‘Karmayoga’. It does not, therefore, carry much meaning when the message of the Gita is construed as Yoga, or Knowledge, or Action. The Gita, in fact, has interwoven all them so uniquely that it could well be concluded to be three in one. It is thus an awareness, a constant vigil on the part of a doer which is material. Obviously, action in human life is the base and the knowledge input is the technique of skillfully performing it.
I have often said when asked that the knowledge of Bhagvad Gita is the dearest and the best gain of my life so far ‘attaining which no other acquisition seems to be greater than that”.

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नािधकं तत: । (6-22)
Naturally, I am extremely happy to share this experience with my readers.
I have obviously not gone into every detail of the text and have confined myself to just summation at places.
I have added an appendix ‘Agniyoga’ to the book to link the traditional yoga system to the psychic phenomenon of it as seen and noticed all over the world. There are also a few notes given in the end on some relevant terms so as to bring home to the foreign readers their true meaning and significance.

P.D.Mishra
Bhopal
October 16, 1992


                                               CONTENTS

           1.THE SETTING FOR THE DISCOURSE
    2.THE PATH OF DISCRIMINATION
                              3. YOGA THROUGH ACTION
                              4. YOGA THROUGH KNOWLEDGE
                             5.RENUNCIATION OF ACTION THROUGH       KNOWLEDGE
6. YOGA THROUGH SELF CONTROL
                          7. SCIENCE OF CREATION
                          8. THE INDESTRUCTIBLE BEING
                          9. THE SUPREME SECET KNOWLEDGE
                      10. DIVINE FORMS AND SPLENDOR
                      11. THE VISION OF THE UNIVERSAL FORM
                      12. YOGA THROUGH DEVOTION
                      13. DISCRIMINATION BETWEEN THE BODY AND THE EMBODIED SELF
                     14. THE THREE MODES AND GOING BEYOND
                     15. THE SUPREME SELF
                     16. THE DIVINE AND THE DEMONIAC PROPERTIES
                     17. THREE CATEGORIES OF HUMAN BEHAVIOR
                    18. REALIZATION


   APPENDIX-1
                                                                                          “

Thursday, 29 December 2016

Foreword TO ABC; XYZ; GOD

One of the best readers ! Surely amazing and superb in its approach to the unfathomable knowledge of the Supreme Truth and Reality. I have all appreciations to Shri CB Rao for this masterpiece of deep understanding and exploration.
Basically a scientist, Mr Rao has an unshakable faith in Divine. His wisdom is all assuring and well signals a lasting reward for the awakened human race. Let us only see how long it takes a scientist to become the saint now ! It has been said that the greatness of GOD will remain ever unsung even if the ink pot earth finishes entire ocean of ink using all trees as pen writing in His praise all over the sky! I only wonder if it is a beginning of this process actually begun this way here. The manifold aspects and attributes which Mr Rao discusses in 'Titbits about GOD'  surely exhibit his deep insight of accumulated vast learning as well as the exact experience required in this direction.
I am also very much impressed by the command the author exercises in a foreign language, English. The selection of appropriate words, the precise and communicative use of the punctuations and the lucidity in expression- all mark the utmost care Mr Rao takes trying to bring home his point to the reader.
About the themes and contents of the book, I will only add that Shri Rao lays a little too much stress on the principle of Karma. This principle basically gets much related to the theory of cause and effect and the birth and rebirth idea on this earth. The Vedantic view of India is indeed the ultimate indication of Reality in true tradition of knowledge. When Gita compares death to be an other aspect of life like childhood, youth or old age, it assures that there is no break in the continuity of it by death as it is One Consciousness only ever living. Further in Chapter thirteen of it when Krishna declares that He is one Kshetragya ( cosmic soul) living in all bodies, there is no case of single outing any one  soul with any separable individual identity. We do no consider an electric bulb or a fan or a tube light having a distinct electric power to be used and reused!
Further, it may sometimes be concluded by Mr Rao's exposition that GOD being All Powerful and Competent, is the Supreme Performer. In the ninth Chapter of the Gita, Bhagwan very well explains that the nature in 'His Chairmanship performs and for no other reason than this, the world evolves'. To my mind, therefore, talking about GOD, as the Supreme Performer, may at times be misleading.
I have finished reading this book word by word amidst loud marriage ceremonial noise remaining totally undisturbed. This is perhaps because the author is silently in long persuasive conversation with his readers with all earnestness and sincerity. I wish this epoch building work a great success. 
President, Maharshi Agastya Vedic Santhanam, Bhopal 

पानी बिच मीन पियासी

कहानी खुद बोलती है

कहानी, उपन्यास और कविता की सामान्यतया कोई भूमिका नहीं होती. एक सर्जक की यह रचना अपने आप में स्वगत-कथन ही तो है ! वैसे तो एक रचनाकार जीवन को उसकी सम्पूर्णता में समझ लेने का कभी दावा ही नहीं करता दूसरे वह यह बखूबी जानता है कि वह अपनी सीमा में अंततः एकांगी ही रहेगा. अतः उसके कहे को सम्पूर्ण जीवन की प्रतिकृति मान लेने की भूल करना किसी के भी लिए उचित नहीं है. सामान्य तौर से प्रत्येक मनुष्य को यह भी लगभग बहुत साफ़ ही है कि यदि जीवन को कला से पृथक कर उसका यथातथ्य रूपांकन या चित्रण भी किया जाता है तो उसमें किसी को भी ऐसा तरतीब रेखांकन नहीं मिल सकता जो पूरी तरह से लकीरों और सीमाओं में बांधा जा सकता हो. तब भी एक रचनाकार अपनी कला साधना से एक परम चितेरे की कला का अनुगमन जरूर करते रहना चाहता है. इस प्रकार वह अवश्य ही जगत के सर्जक के निकट पहुँच कर उसके ऋण अथवा वरदान से कुछ अपनी भी छाप छोड़ रखना चाहता है ! अस्तु !
रामस्वरूप पाण्डेय की ‘जल बिच मीन पियासी’ कथा-रचना की पष्ठभूमि में प्रकट उक्त विचार आरम्भ में ही जैसे यह पूछ रहे हैं कि क्या यह भूमिका मैं एक समीक्षक की हैसियत  में लिख रहा हूँ ? यह स्पष्ट है कि पाण्डेय जी मेरे परम आत्मीय हैं अतः स्नेहाविष्ट होकर ही वे उनकी इस मनोज्ञ कृति पर मेरी सम्मति चाह रहे हैं. इस तरह मैंने इसे आदि से अंत तक सप्रेम पढ़ा है. रचनाकार, आस्थावान और शुद्ध सनातनी विचारक श्री पाण्डेय जी के चिंतन के सभी आयाम मेरी दृष्टिपटल में सजीव विद्यमान हैं. शुद्ध कला और साहित्य का जीवन से गहरा सरोकार उनकी कलम से अनुप्राणित रहता है. इस कृति में भी सनातन भारतीय समाज, परिवार, शिक्षा और संस्कारों के पुनर्स्थापन की महत्ता जीवन के कोमल पक्षों से सुसवेदित होकर मूर्तिवती हुई है.
किन्तु यह बात कला का यदि सम्पूर्ण उद्देश्य जीवन मानकर चला जाय तभी लागू होगी. मेरी समझ में जिस तरह कला कला के लिए अधूरी रहती है वैसे ही कला जीवन के लिए एक ध्येय लेकर चलती हुई भी अधूरी ही रहेगी. वास्तव में कला अर्थात साहित्य द्वारा कला का स्वतंत्र और जीवनोनमुखी –दोनों ही ध्येय सिद्ध होने चाहिए. इस अर्थ में विचार करते हुए इस रचना के सम्बन्ध में कुछ प्रश्न स्वभावतः उद्भूत होते हैं. पहली बात तो यह कि साहित्य में सपाट चरित्र स्वाभाविक नहीं माने जाते. एक रचना का पात्र कोई मिट्टी का घडा नहीं होता कि उसे कुम्हार ने एक बार जैसा ढाल दिया अपने टूटने तक वह वैसा ही बना रहेगा. चरित्र विकास में मनोविज्ञान के अनुशीलन की महती आवश्यकता स्पष्ट रहती है. किस परिस्थिति में एक व्यक्ति अपने मूल चरित्र से एकदम भिन्न कब कैसा मोड़ ले लेगा, इसका पूर्वानुमान करना उसके स्वाभाविक विकास को रोक देना है. मन की यह चंचलता न केवल आज के विज्ञान का आधार है अपितु यह कृष्ण, महर्षि पतंजलि आदि भारतीय मनीषियों के चिंतन के भी केंद्र में है. इस मन या इसकी चित्तवृत्तियों के नियंत्रण के लिए सिद्ध, मुनि, साधू संत कितने पापड जीवन भर बेलकर भी ईमानदारी में यह दावा नहीं कर पाते कि उन्होंने अपने आप पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है. मन पर नियंत्रण की यह दरकार हमने इसलिए भी मान राखी है क्योंकि हमने प्रायः जीवन और संसार को स्वर्ग-नरक और अच्छे तथा  बुरे विभागों में बाँट डाला है. वास्तव में यह सरलीकरण भी मन की ही लीला है. विचित्र बात यह है कि सब कुछ करने धरने वाला यह मन साफ़ बच जाता है और वह किसी नाम और रूप को बदनामी के लिए अपने पीछे छोड़ जाता है.
सही अर्थ में एक साहित्यकार भी एक संत और सद्गुरु की भूमिका वाला होता है. जिस प्रकार सत और सद्गुरु दूसरों के दोषों के परिमार्जन में अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं वैसे ही एक साहित्यकार को भी मात्र अपने पात्रों का ही नहीं अपने चरित्रों ही जैसे सभी सामान्य लोगों के परित्राण का कार्य विधेय है. उसकी यह शुद्ध जिम्मेवारी बनती है कि वह अपने चरित्रों में प्रवेश कर उनकी कमजोरी को मानव का स्थाई भाव न बनाते हुए किसी परिस्थिति विशेष में किसी आवेग का परिणाम सिद्ध कर उसे जन्मना दोषी होने के अपराध से मुक्ति प्रदान करे. उसे एक ऐसा धर्मगुरु कतई नहीं बनना है जो आदिकाल में कभी किसी प्रथम एक के किसी एक अपराध (जो अपराध भी स्वतः प्रश्नाधीन हो) के कारण सारी मानव जाति को सदा सदा के लिए अभिशप्त घोषित करता है. यहाँ तक कि वह भारतीय दर्शन के कर्म के सिद्धांत का भी निर्णायक बनने की भूमिका नहीं ले सकता क्योंकि यह सिद्धांत भी बहुत सूक्ष्म और अविज्ञेय है. संक्षेप में एक साहित्यकार की दृष्टि में यह स्वीकार ही अभीष्ट रहता है कि बुराई यदि ईश्वर के लिए भी इतनी बड़ी बुराई होती तो वह अच्छाई के साथ इसे गूंथता ही किसलिए? यह अवश्य है कि उसने मन की गतिशीलता और चंचलता के साथ बुद्धि का संकल्प और विकल्प भी मनुष्य को दिया गया है अतः इस मामले में भगवान् को बीच में न लाकर भी विचार और विश्लेषण का काम अच्छी तरह से चल सकता है.
यह सब मैंने इसलिए लिखा क्योंकि गौरी का अपाहिज ( शराबी, मांसभक्षी और दुर्व्यसनी मात्र नहीं) पति से आबद्ध रहना, नेताजी की अंत में पोल खुल जाना और गौरी की ससुराल की संपत्ति का कानूनन उसके हक़ में फैसला हो जाना इस रचना के लेखक का कर्तव्य नहीं बनता. प्रथम तो कथा का सुखान्त कथा की कोई शर्त नहीं है दूसरे कथाकार सभी परिस्थितियों के निबटारे के लिए किसी न्यायाधीश की भूमिका में नहीं होता. प्रत्येक के जीवन में प्रायः ऐसे अप्रत्याशित मोड़ आते हैं कि वे उसे विशिष्टता प्रदान करते हैं. यह अप्रत्याशित विशिष्टता ही किसी कहानी को पढने योग्य बनाती है.
वास्तव में कहानी को अपने आप में जोर जोर से यह बोलने में समर्थ होना चाहिए कि हे प्रिय पाठक, मैं जो कह रही हूँ वह कुछ हेर फेर से तुम्हारी ही बात कह रही हूँ. तुमने भी अपने जीवन में ऐसे ही उतार चढ़ाव देखे हैं ? किन्तु तुम बहुत परेशान रहते आये हो इसलिए मैं अपनापन देकर तुम्हारा दुःख बांटने आई हूँ. तुम अब अपने आप को अपराध बोध में गाली देना बिलकुल बंद करदो. और हाँ यदि कुछ बदल सको तो बदलो नहीं तो मौके वेमौके मुझे याद भर कर लेना, हो सकता है इससे भी कुछ बात बने. अच्छा, अब मैं चली ...
पुस्तक के शीर्षक पर भी मुझे कुछ कहना और शेष रह जाता है. उपन्यास की केंद्रीय चरित्र गौरी किस पीड़ा में है ? ठीक है उसकी ससुराल में अटूट संपत्ति है तथा वह उसके उपभोग में आबद्ध नहीं है. मुकुंद उसके इतने निकट होकर भी कितनी दूर नहीं है. किन्तु क्या वह उससे प्रेम का प्रतिदान चाहती है ? और उसका एक पति भी है – अपग, पुसत्व हीन ! किन्तु क्या गौरी की चारित्रिक प्रष्ठभूमि उससे यह कहला सकती है ?
वास्तव में कबीर की उलटबांसी का यह ध्रुव पद जीवन में उत्पन्न आध्यामिक बिसंगति का सन्देश देता है. अतः इससे विज्ञ पाठकों के मन में यह प्रतीक्षा जग सकती है कि गौरी भी देर सबेर मीरा के मार्ग पर चल सकती है. पर इसमें देर किस बात की ? इतने सुन्दर राजमार्ग को प्रशस्त कर लेखक आगे ‘मार्ग अवरुद्ध’ का बोर्ड क्यों टांग देता है ?
सारतः इस उपन्यास के केन्द्रीय चरित्र गौरी और मुकुंद हैं. ये दोनों ही पात्र सनातन भारतीयता के आदर्श हैं. इनमें प्रेम, संयम, त्याग, साधना, शिक्षा, अध्यवसाय, सेवा, परोपकार और समर्पण का परमोत्कट प्रकाश है. वर्तमान शिक्षा प्रणाली में इन दिनों युवा वर्ग के लिए देश में जिस शिक्षा और संस्कार की आवश्यकता प्रकट की जाती है, उसकी पूर्ति इस तरह की रचना बखूबी कर सकती है.
 प्रभुदयाल मिश्र, अध्यक्ष महर्षि अगस्त्य वैदिक संस्थानम, भोपाल                                       


Thursday, 22 December 2016

OS Atri's letter's extract

An extract from a letter of Shri O S Atri who was my first English lecturer in Degree College Tikamgarh and who indeed provided me the first experience of hearing a teacher speak throughout in English in the class!

' I discovered you accidentally at Ajmer in a std shop  - like Columbus discovered America. My friend Mr Singala gave me a magazine or a weekly to read - And lo ! There was the article on Tikamgarh by Shri PD Mishra ( along with his address). You have come a long way - The Way Farther ( the name of my book published in 2013) since TKG days ! I am really fortunate in having a lot of students who have done so well in life and a few are on the top of the world- or I should say at Himalayan height. Surely you are one of them. I wish you still greater successes and attainments. That you are still actively so active reminds me a quote from Milton-
' The last infirmity of noble minds is to scorn delight and live laborious days !'
Since you are a Yogi, it should still be a ' labour of love'- I mean a more pleasant exercise !'

Om Sharan, Atri, Jhansi 14-12-2016 

Monday, 12 September 2016

'अर्धालियों के पूर्णाकार' समीक्षा


पुस्तक-समीक्षा

एक समीक्षा संग्रह में पचहत्तर कृतियों
के पठन का रसास्वादन
युगेश शर्मा
    किसी भी साहित्यिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक कृति की समीक्षा का कार्य समुद्र में डुबकी लगातार मोती निकालने जैसी श्रमसाध्य कवायद है। एक निष्पक्ष और कृति केन्द्रित समीक्षा के लिए प्रतिबद्ध समीक्षक जब किसी कृति की समीक्षा करता है-तब वह वस्तुतः एक न्यायाधीश जैसा पवित्र कर्म कर रहा होता है। तब उसके समीक्षा-कर्म का एकमेव लक्ष्य कृतिकार नहीं अपितु कृति ही रहती है। यद्यपि ऐसा समीक्षा-कर्म आजकल दुर्लभ होता जा रहा है। परिणामस्वरूप कृतिकार की ख्याति और उसके समग्र आभामंडल के मुकाबले कृति गौण दिखाई देने की स्थितियां बनती जा रही हैं। ये स्थितियां विषयनिष्ठ उत्कृष्ट लेखन के लिए एक अशुभ संकेत है और गुणवत्ता युक्त गंभीर लेखन के मार्ग में इनके द्वारा कांटे बिछाये जाने का काम किया जा रहा है। हिन्दी, संस्कृत और अंग्रेजी भाषा के ज्ञाता और वैदिक विषयों के मर्मज्ञ श्री प्रभुदयाल मिश्र के समीक्षा-कर्म की पूर्व पीठिका के रूप में उपरोक्त विवेचन प्रस्तुत किया गया है। श्री मिश्र एक लंबे समय से साहित्यिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक कृतियों (पुस्तकों) की निष्पक्ष, सटीक और गहन-गंभीर समीक्षा कर रहे हैं। आपके समीक्षा-कर्म की सबसे बड़ी  विशेषता यह है कि वह केवल साहित्य तक सीमित नहीं है। उसके कई आयाम हैं। वे साहित्यिक कृतियों के साथ-साथ रामायण संबंधी शोध ग्रंथों, भक्ति-साहित्य की कृतियों और भारतीय संस्कृति की विभिन्न प्रशाखाओं से संबंधित मौलिक पुस्तकाकार सृजन को भी परख कर उस पर अपनी संतुलित टिप्पणी दे रहे हैं।
    श्री मिश्र के समीक्षात्मक आलेखों में एक बड़ी विशेषता यह भी सामने आती है कि उनके पठन से पाठक को मूल कृति के पठन जैसा रसास्वादन प्राप्त होता है। संभवतः ऐसा इस कारण संभव हो रहा है कि आपका समीक्षा-आलेख प्रारंभ से लेकर अंत तक कृति को ही अपने फोकस’ में रखता है। कृति में प्रतिपाद्य विषय और उससे निकलने वाली भाव-ध्वनियों की तरफ से अपना ध्यान भटकने नहीं देते। इसी कारण कृतिकार और पाठक दोनों स्वीकार करते हैं कि श्री मिश्र ने अपनी समीक्षा में पूरा-पूरा न्याय किया है। उनकी इस महारत में उनके विविध आयामी विशद् अध्ययन के योगदान की अनदेखी नहीं की जा सकती। विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत रचनात्मक संस्थाओं के साथ आपके दीर्घकालीन जुड़ाव और लंबे प्रशासनिक अनुभवों ने भी आपकी समीक्षा-दृष्टि को नीर क्षीर विवेकी क्षमता प्रदान की है।
    तुलसी मानस प्रतिष्ठान मध्यप्रदेश, भोपाल ने श्री प्रभुदयाल मिश्र द्वारा समय-समय पर लिखित पचहत्तर कृतियों की समीक्षाओं को अर्धालियों के पूर्णाकार’ नाम से इसी वर्ष-2016 में पुस्तकाकार प्रकाशित किया है। इस समीक्षा संग्रह में शामिल 75 समीक्षाओं में से अधिकतर तुलसी मानस प्रतिष्ठान की मुख पत्रिका तुलसी मानस भारती’ में पूर्व में प्रकाशित हो चुकी हैं। 187 पृष्ठों की इस समीक्षा-कृति में 176 पृष्ठ समीक्षाओं को दिये गये हैं। प्रत्येक समीक्षा के प्रारंभ में कृतिकार, प्रकाशक और मूल्य बाबत विवरण दिये जाने से समीक्षा की उपादेयता पाठकों के लिए काफी बढ़ गई है। इस विवरण की मदद से वे इच्छित कृति को प्राप्त कर उसके पठन का आनंद प्राप्त कर सकते हैं। संग्रह के अंतिम तीन पृष्ठों पर समीक्षक श्री प्रभुदयाल मिश्र का विस्तृत परिचय भी छापा गया है, जो संभवतः अद्यतन रूप में पहली बार आया है।
    समीक्षा-संग्रह अर्धालियों के पूर्णाकार’ को श्री मिश्र ने तीन खंडों अर्थात पटल में वर्गीकृत किया है। श्री मिश्र की सर्जनात्मक और अनुष्ठानात्मक सक्रियता के साथ लंबे समय से अभिन्न रूप से जुड़े तुलसी मानस भारती’ के संपादक श्री एन.एल. खंडेलवाल ने अपने ढंग की इस अनूठी कृति की भूमिका लिखी है। इस कृति में शामिल समीक्षाओं और इस संग्रह के पुस्तकाकार प्रकाशन की अंतर्कथा को रेखांकित करते हुए मानस मर्मज्ञ श्री खंडेलवाल ने संग्रहित समीक्षाओं को सही परिप्रेक्ष्य में पढ़ने और उनके रसास्वादन के जैसे द्वार ही खोल दिये हैं। आठ पृष्ठों की इस विश्लेषणात्मक भूमिका में श्री मिश्र के समीक्षकीय व्यक्तित्व को बहुत ही सरल ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास हुआ है। श्री खंडेलवाल लिखते हैं- आजकल पत्र-पत्रिकाओं में जो पुस्तक-समीक्षा प्रकाशित की जाती है, उसमें पुस्तक पर न तो गहरी नज़र डाली जाती है और न ही किसी पुस्तक का बहिरंग और अंतरंग पाठक के सामने लाना अपेक्षित रहता है। इसमें समीक्षाकार का अभिप्रेत पाठक के सामने पुस्तक विशेष की खूबियां लाना होता है। कहना न होगा कि श्री प्रभुदयाल मिश्र की समीक्षा दृष्टि इस कसौटी पर खरी उतरती है।
    समीक्षा-संग्रह के प्रथम खंड अर्थात प्रथम पटल में 28 साहित्यिक कृतियों की समीक्षाएँ शामिल हैं। यह सिलासिला डा. विनय षडंगी राजाराम के कविता संग्रह स्वर्ग का अग्नि-द्वार’ से प्रारंभ होकर रामकथा पर एकाग्र उपन्यास युगाधिपतिपर विराम लेता है। यह उपन्यास श्री चन्द्रप्रकाश जायसवाल की कृति हैं। इस खंड में जिन प्रमुख लेखकों की कृतियों की समीक्षाओं का समावेश है’ वे हैं- डा. रमानाथ त्रिपाठी, डा. प्रेम भारती, डा. देवप्रसाद खन्ना, श्री बटुक चतुर्वेदी, डा. गंगाप्रसाद गुप्त बरसैंया, और आचार्य दुर्गाशंकर शुक्ल। द्वितीय खंड को समीक्षाकार ने द्वितीय पटल कहा है और उसमें रामायण-शोध से संबंधित 16 कृतियों को लिया गया है। इस खंड में डा. लालसिंह चौधरी की पुस्तक रामचरित मानस में प्रक्षेप’ से लेकर प्रो. मूलाराम जोशी की कृति नयन बिनु वाणी’ तक कृतियों को समाविष्ट किया गया है। इस खंड में डा. प्रेम भारती, डा. शोभाकांत झा, डा. दादूराम शर्मा, डा. परशुराम शुक्ल विरही’ तथा डा. रामस्नेहीलाल शर्मा यायावर’ की शोधपरक कृतियां प्रमुख रूप से संग्रहित हैं। तृतीय खंड-तृतीय पटल में शामिल समीक्षाओं का केन्द्रीय विषय भक्ति-साहित्य’ है। इस खंड में मात्र छह कृतियां शामिल हैं। इन कृतियों के प्रमुख लेखक हैं- सर्वश्री नन्नूलाल खंडेलवाल’ डा. लक्ष्मीनारायण गुप्त विश्वबंधु’ तथा स्वामी शिवोम्।
    संस्कृति’ पर एकाग्र कृतियों को समीक्षा-संग्रह के चतुर्थ पटल (खंड) में शामिल किया गया है, जिनकी संख्या 25 है। इस खंड में प्रमुख रूप में प्रो. मूलाराम जोशी, डा. प्रेम भारती, अम्बाप्रसाद श्रीवास्तव, डा. मोहन गुप्त, डा. देवेन्द्र दीपक, पं. ईशनारायण जोशी, डा. परशुराम शुक्ल विरही, मनोजकुमार श्रीवास्तव, डा. प्रभाकर श्रोत्रिय, मुनिश्री चिन्मय सागर तथा विनोदकुमार श्रीवास्तव की कृतियों की समीक्षाओं का समावेश हुआ है। भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित डा. श्रोत्रिय की कृति भारत में महाभारत’ की समीक्षा करते हुए श्री मिश्र ने लिखा है- भारत में महाभारत वस्तुतः महाभारत विषयक एक ऐसा विश्वकोश है, जो अध्यात्म, दर्शन और पुराकथा की अमूल्य धरोहर के साथ-साथ सनातन साहित्य की अपने मूल और प्रभावात्मिकता में अप्रतिम है।‘ इसी प्रकार सुन्दरकांड: एक पुनर्पाठ में वे लिखते हैं- मनोजकुमार श्रीवास्तव की असामान्य मेधा गति और शक्ति की तारीफ ही करनी होगी, यह पुस्तक एक लेखकीय क्रा्रंति है।‘
    जैसा कि मैंने पूर्व में उल्लेख किया है, श्री मिश्र अध्यात्म और वेदों की गहराई में उतरे हुए एक सतत चिंतनशील अघ्येता हैं। हिन्दी के अलावा संस्कृत और अंग्रेजी भाषा पर भी उनका अच्छा अधिकार है। इन सब खूबियों का दर्शन संग्रह की 75 में से अधिकांश समीक्षाओं में सहज ही हो जाता है। उन्होंने कृति विशेष को कसौटी पर कस्ते समय अपने निष्कर्षों को पुष्ट और समाधानकारी बनाने के लिए पौराणिक ग्रंथों के उदाहरण भी यथास्थान दर्ज किये हैं’ जो प्रायः संस्कृत भाषा में हैं। इसके अलावा जहां भी आवश्यक हुआ है अपनी बात के समर्थन में अंग्रेजी के उद्धरणों की मदद भी उन्होंने ली है। समीक्षाओं की भाषा प्रवाहपूर्ण, स्वयं स्पष्ट और सहजग्राह्य है। समीक्षाओं में प्रयुक्त शब्दों एवं भावों के वे ही अर्थ-पाठक तक पहुंचते हैं जो समीक्षक द्वारा अपेक्षित हैं। फलस्वरूप ये समीक्षाएँ न तो किसी प्रकार का भ्रम पैदा करती हैं और न ही कृतिकारों के श्रम को नकारती हैं। मैं सार रूप में कह सकता हूँ कि संग्रह की समीक्षाओं में कहीं भी अति रंजना नहीं है। कृति में जो है- वही समीक्षा में उभरकर सामने आया है। श्री मिश्र ने अपनी समीक्षा को न्यायपूर्ण बनाये रखने के लिए बड़े लेखकों की गलतियों और कमियों की ओर संकेत करने में भी परहेज नहीं किया है।
    समीक्षा-कर्म के साथ न्याय करने वाली समीक्षा कृति अर्धालियों के पूर्णाकार’ के लिए श्री प्रभुदयाल मिश्र को साधुवाद। उन्होंने पाठकों को एक ही कृति में पचहत्तर कृतियों का रसास्वादन करा दिया है, जो एक अनूठा साहित्यिक उपक्रम माना जाएगा।

                                      
पुस्तक  - अर्धालियों के पूर्णाकार
लेखक  -  प्रभुदयाल मिश्र
प्रकाशक - तुलसी मानस प्रतिष्ठान, भोपाल
मूल्य   -  250 रुपये

व्यंकटेश कीर्ति,
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