Sunday, 26 June 2022

निर्वचन माह जून तुलसी मानस भारती 2022


निर्वचन (जून 22) 

                                    चिरजीवी – चिरंजीवी 

            सप्त चिरजीवियों के साथ चिरंजीवी मार्कंडेय जी को स्मरण करने की परंपरा सनातन है । यह इसलिए भी स्मरणीय है क्योंकि जहाँ चिरंजीविता एक कल्प की है (विभीषण को श्री राम ने वरदान दिया – करहु कल्प भर राज तुम) वहीं श्री मार्कंडेय जी तो भगवान शिव के प्रसाद से मुनि लोमश की ही तरह प्रलयांत तक चिरंजीवी हैं । फिर हम कागभुशुंडि जी को भी कैसे भुला सकते हैं जिनके संबंध में स्वयं भगवान शिव का साक्ष्य है - जासु नाश कल्पांत न होई ! अस्तु चिरजीवियों का एक पृथक क्रम भी कुछ इस प्रकार बनता है – अपने प्रत्येक रोम की संख्या में प्रति कल्प तक जीने वाले लोमश जी, कल्पांत के प्रलय के साक्षात्कर्ता मार्कण्डेय जी और कल्पांत को भी अतिक्रांत करते काग भुशुंडि जी !   

भगवान शिव की अहैतुकी कृपा प्राप्त यमराज की सत्ता का अतिक्रमण कर जन्मना अल्पायु के मार्कण्डेय जी को जब अपनी चिरंजीविता में भगवान की माया के दर्शन की कामना हुई तो उन्हें महाप्रलय का साक्षात्कार हुआ जिसके महाजल प्लावन की अनंतता में अंतत: भगवान ने जिस अलौकिक छ्वि के दर्शन कराये उन ‘बाल मुकुन्द’ का ‘चिरजीवी मार्कण्डेय’ द्वारा साक्षात्कार तो जैसे वैष्णव जनों की परम निधि ही है - 

करारविन्देन पदारविंदं मुखार्विन्दे विनिवेशयन्तम् 

वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बाल मुकुंदं मनसा स्मरामि ।    

यह सही है कि जीवन, जगत और परमात्मा की सत्ता का सत्य किसी निर्वचन का विषय नहीं है । क्रांत-दर्शी भारतीय ऋषियों की परा प्रज्ञा ने उसका साक्षात्कार किया है और उसे पश्यन्ती वाक् के जिस परार्द्ध में प्रकट किया है उसे समझने और समझाने की चेष्टा मात्र ही हो सकती है । 

दीर्घजीविता प्रत्येक जन्म लेने वाले प्राणी की जैसे जन्मना अभीप्सा है । अत: सात चिरजीवियों संबंधी यह श्लोक अपनी फलश्रुति सहित किसी के भी के मुखाग्र पर देखा जा सकता है – 

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषण:

कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन: । 

सप्तैते संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्

जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित: ॥  

इस सूची के द्वापर युगीन महाभारत के दो योद्धा अश्वत्थामा और उनके मामा कृपाचार्य की विशिष्ठता पर उनके कौरवों के पक्ष लेने को लेकर प्राय: प्रश्न उठता है जबकि शास्त्र सूचना के अनुसार ये महानुभाव अगले मन्वंतर में सप्त ऋषियों की नई सूची में सम्मिलित होने वाले हैं । यह तो स्पष्ट है कि ये ऋषि कुलीन है । श्री कृप गौतम ऋषि के कुल के हैं जबकि अश्वत्थामा भारद्वाज वंशज हैं । किन्तु मूलत: ये शिव गण हैं तथा महाभारत काल में अपनी विहित भूमिकाएँ संपादित कर अगले मन्वंतर में अपनी प्रतिष्ठा के लिए वर्तमान में तप निरत हैं  ।        

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तुलसी मानस भारती के अप्रेल 22 अंक में डा. प्रेम भारती का एक आलेख ‘मैं विभीषण’ छ्पा था । इस पर पाठकों की प्रतिक्रिया सकारात्मक थी । तथापि विभीषण द्वारा व्यक्त इस पीड़ा कि उनका नाम लोग क्यों नहीं रख रहे हैं, पर गुफा मंदिर, भोपाल के महंत श्री राम प्रवेश दास जी ने आगे यह कहा कि यह तब है जबकि विभीषण चिरजीवी हैं ! तथापि उनके द्वारा यह व्यावहारिक समाधान भी दिया गया कि नाम लोग संक्षिप्त, प्रवाही और परंपरा के प्रभाव में रखते हैं । और विभीषण तो वैसे भगवान की भक्ति में सर्वथा आप्तकाम ही हैं अत: उनमें किसी पीड़ा का भाव एक लक्षणा प्रयोग ही हो सकता है ।  


प्रभुदयाल मिश्र, प्रधान संपादक, तुलसी मानस भारती



 

निर्वचन मानस भारती माह जुलाई 2022

 निर्वचन जुलाई 22

 

                          विशिष्ठाद्वैत वैष्णव- परंपरा

 

भोपाल के 66 वर्ष पुराने रामानद संस्कृत महाविद्यालय के गुफा मंदिर प्रांगण में 5 जून से 9 जून ’22 तक आद्याचार्य रामानंद जी के सिद्धान्त ग्रंथ श्रीवैष्णव मताब्ज भास्कर” पर श्रीमज्जगद्गुरु द्वाराचार्य मलूकपीठाधीश्वर स्वामी श्री राजेंद्रदास देवाचार्य जी महाराज का  व्यासपीठस्थ निर्वचन हुआ । यद्यपि प्रतिदिन तीन घंटे की समयावधि में बोलते हुये उन्होने केवल इस ग्रंथ के तीन- प्रकृति, जीव और ब्रह्म विषयक श्लोकों की भूमिका का ही प्रवर्तन किया, किन्तु स्वामी जी का कहना था कि इसका विषय विस्तार वे आगामी कथा क्रमों के आरंभ में करते रहेंगे ताकि इस महत्तर विषय का सम्यक् निर्वहन हो सके ।

श्री देवाचार्य जी इस अवसर पर तुलसी मानस भारती के स्वर्ण जयंती विशेषांक के विमोचन के लिए मानस भवन भी पधारे और अनंतर उन्होने अपने मुख्य सम्बोधन में तुलसी मानस भारती अप्रैल अंक 22 की इस स्थापना कि विशिष्ठाद्वैत की रामाश्रयी शाखा के प्रवर्तक रामानुजाचार्य जी थे, के संदर्भ में श्रीअगस्त्य संहिता, श्रीवाल्मीकिसंहिता, श्रीवसिष्ठसंहिता, श्रीमैथिलीमहोपनिषद् और आचार्य संहिता के आधार पर कहा कि इस श्री संप्रदाय की परंपरा सर्वेश्वर श्रीराम से आरंभ होकर श्री सीता, हनुमान, ब्रह्मा, वशिष्ठ, पाराशर, व्यास, शुकदेव, बोधायन और श्री रामानंद के द्वारा ही तारक मंत्र द्वारा लोक विस्तारित हुई है –

गृहीत्वा विधिवद् रामान्मंत्रराजं षडक्षरम्

भारत के अतीत में जाते हुये स्वामी जी ने बताया कि देश के दुर्निवार इतिहास में वैदिकी हिंसा के निवारण के लिए बुद्धावतार हुआ किन्तु इससे वेद का ज्ञान-खंड विलुप्त होने लगा जिसके लिए आदिशंकर ने ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या का प्रवर्तन किया । यद्यपि शंकर भगवद्पाद महान् उपासक थे जैसाकि उनके सभी देवों से संबन्धित स्तोत्रों से स्पष्ट होता है, किन्तु इसके लिए जन-जन को संवल प्रदान करने वाले परमेश्वर की उपलब्धता और नैकट्य के आश्वासन की महती आवश्यकता थी जिसका महनीय कार्य श्री रामानन्द के रूप में साक्षात् भगवान राम ने ही प्रादुर्भूत होकर सम्पन्न किया –

श्रीरघुवर अवतार ले प्रगटे रामानन्द

कलिमहॅं जे मतिमंद अति मुक्त किए नरवृन्द ।

श्री रामानन्द जी वैष्णव मत के श्रीसंप्रदाय के आचार्य थे। उन्होने श्रीभाष्य, वेदार्थसंग्रह, गद्यत्रय, वेदांतसार आदि ग्रन्थों की रचना की । श्रीरामानन्द जी द्वारा श्रीराम का मंत्रराज षडाक्षरी तारक राम मंत्र वेदार्थ संपृक्त और तथैव प्रतिपादित है ।

रामचरित मानस के पठनकर्ता को इस मंत्र की महत्ता के सूत्र मानस में प्राप्त करते हुये बहुत हर्ष का अनुभव होगा । सबसे पहले भगवान शिव पार्वती को काशी के मुक्तिदायनी होने का रहस्य बताते हुये यही कहते हैं कि ऐसा करने की उनकी क्षमता इसी मंत्र से प्राप्त हुई है –

कासी मरत जन्तु अवलोकी । जासु नाम बल करऊँ बिसोकी ।

जब महर्षि वाल्मीकि भगवान श्री राम को उनके रहने के लिए निवास बताते हैं तो एक महत्वपूर्ण निवास कक्ष उनके हृदय में आरक्षित करने का उनके द्वारा अनुरोध यह किया जाता है –

“मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा”

और सबसे बढ़कर तो स्वयं भगवान ही शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश देते हुये यही कह देते हैं –

‘’ मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा । पंचम भजन सो बेद प्रकासा । “

यहाँ यही ध्यातव्य है कि वेद में विवर्णित यह मंत्र भगवान का अग्नि बीजात्मक तारक मंत्र ही है ।

इस विषय में आगे भी यथावसर विचार किया जाएगा जिसके लिए हमें पाठकीय प्रतिक्रिया की भी प्रतीक्षा रहेगी ।

 

प्रभुदयाल मिश्र

प्रधान संपादक                                                   

Friday, 15 April 2022

तुलसी मानस भारती संपादकीय मई 2022

 निर्वचन मई 2022

 

 

                                स्वागतेय सांस्कृतिक अनुष्ठान

नव विक्रम संवत 2079 के नवोन्मेष पर मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग के सौजन्य से महाराजा विक्रमादित्य शोध पीठ और स्वराज संस्थान संचालनालय, मध्य प्रदेश भोपाल ने श्री राम तिवारी के सम्पादन तथा पं चन्दन श्याम नारायण व्यास और राजेश्वर त्रिवेदी के सहयोग से 40 पृष्ठीय जिस विक्रम पंचांग का प्रकाशन किया है वह भारत-राष्ट्र के गौरव की उस महान विरासत का अवलेख है जिसका हमारी वर्तमान शिक्षा, संस्कृति और संदेश के रूप में अध्ययन और अध्यवसाय देश के प्रत्येक नागरिक का प्रथम कर्तव्य होना चाहिए । ईशवी सन से 57 वर्ष पहले उज्जैन के महाराज विक्रमादित्य ने शकों पर विजय के पश्चात चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा से आरंभ वर्ष भारत के आत्म गौरव तथा भारतीय अस्मिता का बोधक प्रतीक है । जिस महादानी, संस्कृति, विज्ञान और अध्यात्म के पुरोधा की राज्य सभा में महाकवि कालिदास, वराहमिहिर, वेताल भट्ट, अमरसिंह, घटखरपर, धन्वंतरि, वररुचि, शंकु, क्षपणक आदि नवरत्न उपस्थित हों उसका दिक्काल दर्शन कितना बहुआयामी होगा, उसकी आज तो कल्पना भी की जाना कठिन है ।

इस पंचांग की पृष्ठ सामग्री में वेद और विज्ञान के त्रिकाल द्रष्टा ऋषि वामदेव, अंगिरा, अगस्त्य, भारद्वाज; भेषज धन्वन्तरि, सुश्रुत, चरक; वेदांग दर्शन और विज्ञानविद कणाद, बौधायन, लगध; राजनीति शास्त्री चाणक; गणितज्ञ खगोल शास्त्री वाराहमिहिर, वररुचि; रसायन शास्त्री व्याडि; ज्योतिर्विद भास्कराचार्य और भोगवादी दर्शन के प्रणेता चारवाक आदि के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है साथ ही यह भी बताया गया है कि हम किस प्रकार पश्चिम के पिछलग्गू बन उनके अधकचरे ज्ञान को बटोरकर अब तक वर्तमान के अंधेरे में इठलाते रहे हैं । गोस्वामी तुलसीदास जी ने संभवत: उन्हीं के संबंध में यह सटीक टिप्पणी की है –

काँच किरिच बदले ते लेहीं । कर ते डारि परस मनि देहीं । (उत्तरकाण्ड 120/12)

विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद के मण्डल 1 के दीर्घतमा ऋषि द्वारा संदृष्ट 164 वें सृष्टि सूक्त के मंत्र 11 में इस प्रकार 12 महीनों और 360 दिन तथा 360 रातों के संवत्सर की रोचक अवस्थिति अनुकल्पित की गई है –

द्वादशारं नहि तज्जराय वर्वेति चक्रं परि द्यामृतस्य

आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानि विश्तिश्च तस्थु: ।

अर्थात सूर्य का बारह अरों (महीनों) वाला चक्र पृथिवी के चारों ओर घूमता है और वह कभी भी जीर्ण नहीं होता । हे अग्ने! सात सौ बीस जोड़े पुत्र (360 दिन और 360 रातें) हमेशा रहते हैं ।

इस प्रकार यहाँ सूर्य, पृथिवी और भारतीय चांद्र पंचांग की अवधारणा की वेद मूलकता स्पष्टत: प्रतिपादित हुई है ।

इसी प्रकार अथर्ववेद कांड 10 के स्कंभ (विश्वरूप ज्योतिर्लिंग) नाम के सातवें सूक्त की ऋचा 6 में भी अद्भुद् मंत्र सृष्टि की गई है-  

क्व प्रेप्सन्ती युवती विरूपे अहोरात्रे द्रवत: संविदाने

अहा ! ये दो श्याम (रात) और धवल (दिन) युवतियाँ किस दिशा में भागी जा रही हैं !

वास्तव में अतीव वेगवान निर्वन्ध काल को लौकिक संगणना की सीमाओं में बांधने का काम तो अपौरुषेय महाकाल की ही सामर्थ्य हो सकती है । अत: यदि महाकाल की अवन्तिका के महाराज विक्रमादित्य ने उनकी कृपा से यह सामर्थ्य प्राप्त की तो इसका समादर करना भारतीय प्रज्ञा का धर्म कर्तव्य ही है ।

 

प्रभुदयाल मिश्र

प्रधान संपादक    

                                      

Friday, 25 March 2022

तुलसी मानस भारती का संपादकीय अप्रैल 2022

 श्री रामानुजाचार्य की विशिष्ट‘अद्वैत’ प्रतिमा 

 

5 फरवरी 2022 को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद में रामानुजाचार्य जी की हजारवीं जयंती पर आयोजित भव्य सहस्राब्दी समारोह में स्टेचू आफ ईक्वालिटी नाम की 216 फीट ऊंची और 120 किलो सोने की प्रतिमा का अनावरण कर इसका संस्थापन सम्पन्न किया । विश्व की दूसरी सबसे ऊंची इस प्रतिमा को स्वभावत: गिनीज़ बुक में भी स्थान मिला । श्री रामानुजाचार्य जी वर्ष 1017 में तमिलनाडु के श्रीपेरांबूदूर मैं जन्मे थे । उन्होने यद्यपि आदि शंकर की परंपरा में अद्वैत वेदान्त की शिक्षा प्राप्त की थी किन्तु श्री यमुनाचार्य जी से वैष्णव दीक्षा प्राप्त कर वे सर्व सुलभ विशिष्ट सगुण ब्रह्म मत ‘विशिष्ठाद्वैत’ के सूत्रधार बने जिससे भारत में सगुण भक्ति की रामाश्रयी और कृष्णाश्रयी धाराएँ निसृत हुईं । इनमें क्रमश: रामाश्रयी में द्वादश महाभाग संत और कृष्णाश्रयी में अष्टछाप (सूरदास, परमानन्ददास, कुम्भनदास, कृष्णदास, नन्ददास, चतुर्भुजदास, गोविन्दस्वामी और छीतस्वामी) भक्त कवियों ने जन्म लिया जिंहोने पराधीन भारत की चेतना में नूतन ऊर्जा का संचार किया । 

श्री रामानुजाचार्य की भक्ति परंपरा क्रम में चतुर्थ श्री राघवानंद के शिष्य श्री रामानन्द का जन्म 1299 ई. में प्रयाग में हुआ । इनके द्वादश महाभाग शिष्यों में एक शिष्य श्री नरहर्यानन्द थे जिनके शिष्य गोस्वामी तुलसीदास थे । इस प्रकार रामोपासकों और गोस्वामी तुलसीदास के कृतृत्व प्रेमियों के लिए यह ऐतिहासिक उपक्रम निश्चित ही बहुत महत्व का है ।

यहाँ प्रसङ्गत: द्वादश महाभागों के अर्थ संदर्भ का भी उल्लेख उचित प्रतीत होता है । संत परंपरा में इस श्लोक का मंगल पाठ आज भी एक सुविहित परंपरा है –

स्वयंभूर्नारद: शंभु: कुमार: कपिलो मनु:

प्रहलादो जनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम । (श्रीमद्भाग्वत 6-20)  

इस श्लोक में यमराज अपने दूतों को समझाते हुये यह कह रहे हैं कि कि उक्त द्वादश महाभाग सम्पूर्ण भागवत रहस्य को जानने वाले हैं, अत: वे स्वयं भगवत् स्वरूप ही हैं । 

इस संत परंपरा में यह भी मान्यता है कि उक्त सभी महाभाग रामानन्द जी के शिष्यों के रूप में विश्व के कल्याणार्थ इस प्रकार उत्पन्न हुये तो जैसे ब्रह्मांड की समस्त विभूतियाँ ही इस धारा को इस प्रकार संपृक्त करने धरा धाम पर अवतीर्ण हुई थीं –1. श्री अनन्तानन्द जी ब्रह्मा जी, 2. श्री सुखानन्द जी शंकर जी,3. श्री योगानन्द जी कपिल देव जी, 4. श्री सुरसुरानन्द जी नारद जी,5. श्री गालवानन्द जी शुकदेव जी,6. श्री नरहरियानन्द जी सनतकुमार जी,7. श्री भावानन्द जी जनक जी,8. श्री कबीरदास जी प्रह्लाद जी,9. श्री पीपा जी राजा मनु जी,10. श्री रैदास जी धर्मराज जी,11. श्री धन्ना जाट जी राजा बलि जी और 12. श्री सेन भक्त जी भीष्म जी

आस्था पथ का यह पर्मैश्वर्य भक्ति मार्ग की पराकाष्ठा ही कही जा सकती है !

भक्ति की इस सगुण धारा के अधिसंख्य भारतीय जनों को आज निश्चित ही यह अत्यंत प्रसन्नता का विषय है कि इसके आदि नायक की मूर्ति स्थापना इतने भव्य स्वरूप में सम्पन्न हुई । इसे भारत की अखंडता और इसके मूल की गह्वरता में अनुभव कर भारतीय मानस के यह अति आह्लादित होने का स्पष्ट अवसर है । यह ज्ञातव्य है कि नाभादास जी ने कलियुग के भक्तों का आरम्भ श्री रामानुजाचार्य से ही करते हुये अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ भक्तमाल के इस छप्पय में भगवान् के अवतारों की ही पुनरावृत्ति प्रकट स्वीकार की है -

(श्री)रामानुज उदार सुधानिधि अवनि कल्पपतरु

विष्णुस्वामी बोहित्थ सिंधु संसार पार करु

ध्वाचारज मेघ भक्ति  सर ऊसर भरिया।

निंबादित्य आदित्य कुहर अज्ञान जु हरिया॥

जनम करम भागवत धरम संप्रदाय थापी अघट।

चौबीस प्रथम हरि बपु धरे त्यों चतुर्व्यूह कलिजुग प्रगट॥

                            (भक्तमाल, उत्तरार्ध-28)   

Saturday, 1 January 2022

प्रथमं वाचो अग्रम

                    प्रथमं वाचो अग्रम्

 

डा. राजरानी शर्मा की श्रेयस और प्रेयस की शब्द यात्रा में प्रथम पग रखने पर मेरी दृष्टि मार्ग-पट्टिकाओं के इन संकेतों पर टिक जाती है –

‘ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है

इच्छा क्यों पूरी हो मन की

एक दूसरे से न मिल सके

यह विडंबना है जीवन की।

प्रत्यभिज्ञा  दर्शन को काव्य की चाशनी में पाग कर प्रस्तुत करने वाले महामनीषी जयशंकर प्रसाद की उक्त पंक्तियाँ इस मूलभूत चिन्ता की प्रतिच्छाया है कि हमारे ज्ञान परम्परा;  इच्छा शक्ति और क्रिया व्यापार में भेद है, यही भेद; यही भिन्नता विषमता का मूल कारण है। विषमता श्रेयस और प्रेयस की; विषमता कथनी और करनी की; विषमता ज्ञान के सैद्धान्तिक स्वरूप और व्यावहारिक स्वरूप के सामंजस्य कीसभी एक प्रहेलिका को जन्म देती है और प्रश्न उठता है कि क्या भारतीय दर्शन और भारतीय दार्शनिकों की त्रिकालज्ञ मनीषा हमारे जीवन के दैनंदिन व्यापारों को ज्योतित और आलोकित कर सकती है या नहीं? क्या ‘दर्शन केवल मनीषियों का एकाधिकार है? क्या केवल वाक् वितंडावाद ही दर्शन है; क्या भिन्न-भिन्न मत मतान्तरों का मायाजाल ही दर्शन है? क्या दर्शन कोई अत्यन्त दुरूह; क्लिष्ट; अव्यावहारिक वैचारिक सरणि ही है जिसमें सामान्य जन स्नान नहीं कर सकता!” (श्रेयस और प्रेयस दर्शन)  

रस हमें चाहिये ही .... उत्साह हमें चाहिये ही .... जीवन मंत्रों के हम रचयिता हैं ही ....! संत और वसंत दोनों को एक साथ साध कर चलने वाले हम सृजन के भी पुजारी हैं ...  और उदात्त चेतना के भी ! धरा को धन्यवाद कहना हमारी परम्परा है सो वसंतोत्सव मनाकर अनंत सृजन को नैवेद्य बनाकर ....” इदन्न मम “ की आहुतियों सा यज्ञ सरीखा जीवन जीना हमारी भारतीयता का मर्म है ! प्रफुल्लित रहना हमारा धर्म है ! सो हम वसंत को मनाते हैं वसंतोत्सव को जीते हैं ! (ऋतुराज वसंत)

अपने ज्ञान-गूगल से इस मार्ग के प्रकाश हेतु वाक का प्रथम आयाम यह है  -    

बृहस्पते प्रथमं वाचो अग्रं यत् प्रैरत नामधेयं दधानाः

यदेषां श्रेष्ठं यदरिप्रमासीत् प्रेणा तदेषां निहितं गुहाविः।

यह ऋग्वेद मण्डल 10 के 71वें ज्ञान सूक्त की पहली ऋचा है। इसके द्रष्टा ऋषि ब्रहस्पति हैं । इसका मेरी चेष्टा का काव्यानुवाद इस प्रकार है –

बोलते आरम्भ में शिशु नाम देकर वस्तुओं को नए जिससे

हे बृहस्पति !

वह गिरा निष्कलुष निश्छल

आदिवाणी की प्रथम अभिव्यक्ति

होती प्रकट ऋत-स्नेह

छुपी जो उर की गुहा रहती 

यह इसलिए भी कि राजरानी जी इस कृति को अपनी पहली किताब कहती हैं । संभव है इसका उन्मीलन इसी सूक्त के इस दूसरे मंत्र की प्रक्रिया में हुआ हो –

सक्तुमिव तितउना पुनंतो यत्र धीरा मनसा वाचमक्रत

अत्रा सखायः सख्यानि जानते भाद्रैषां लक्ष्मीर्निहिताधि वाचि ।  २ ।

-

छानकर ज्यों एक चलनी से कभी सत्तू

किया जाता अधिक निर्मल

बुद्धि से वैसे तराशी

बोलते विद्वान हैं जब

प्रेम, मैत्री में पगी वाणी

कीर्ति, श्री, श्रेयस्

सभी उसमें बसे होते ।   

 

वैदिक वाङ्मय में स्त्री’, आदि शंकर की परदुख कातरता और रामकथा के श्रेयस तथा व्रज और व्रजांगनाओं, उपालंभ काव्य, दिनकर की उर्वशी, सुगंध सार, वसंत और शिरीश के प्रेयस के समानातर तटों में वहती यह धारा, भारतीय मनीषा के प्रखर प्रज्ञा पुरुष विद्यानिवास मिश्र की परंपरा में स्नान और निमज्जन, दोनों का सुख देने के लिए है । यहाँ बस एक बार और मुझे ज्ञान सूक्त के एक दूसरे संदर्भ की ओर लौटना है जिसके इस काव्यानुवाद पर आचार्यपाद ने स्वयं दृष्टिपात भी किया था –

अक्षन्वंतः कर्णवन्त: सखायो मनोज्वेश्वसमा बभूवुः

आदघ्नास उपकक्षास उ त्वे हृदा इव स्रात्वा उ त्वे ददृशे । ७ ।

-

आँख वाले, कान वाले मित्र सब जैसे

नहीं हैं एक जैसे कल्पना, मन से

सरोवर जिस तरह जल का

कभी कटि, कभी मुख

स्नान डुबकी का कभी आनंद देता है।

 

यहाँ लोक और वेद की सरयू (सरजू नाम सुमंगल मूला । लोक बेद मत मंजुल कूला ) के इन किनारों से सत्यं परं की अवधारणा से सुसंकल्पित राजरानी जी इस आभासीय संसार में विश्वमय होकर भी विश्वोतीर्ण होने की संभावना का भान कराने में समर्थ प्रतीत होती हैं । यह सब मैं इस पुस्तक के उदाहरणों से प्रकट कर सकता हूँ, पर यह समीक्षा का प्रसंग नहीं है । अस्तु ।

कठोपनिषद् के यमराज स्पष्ट घोषणा करते हैं कि श्रेयस और प्रेयस में चयन का निर्णय व्यक्ति का अपना है । ये मार्ग तो उसके पास स्वयं ही चलकर पहुँच जाते हैं –

श्रेयश्च प्रेयश्च मनुष्यमेतस्तौ सम्परीत्य विविनक्ति धीरः।
श्रेयो हि धीरोऽभि प्रेयसो वृणीते प्रेयो मन्दो योगक्शेमाद्‌वृणीते ॥

 सुदीर्घ अध्ययन, अध्यापन और अध्यवसाय के बाद एक विचारशील व्यक्तित्व के लिए आत्मोपाख्यान हेतु गद्य विधा उपयुक्त माध्यम है । कविता की अपनी सीमाएं तो विदित रहती ही हैं । कविता, अर्थात् एक अल्प विराम की विश्रांति ! महाकाव्य, अवश्य दीर्घतर है, पर इसके लिए एक पूरे जीवन की तैयारी और समर्पण जो जरूरी है! और इसके आगे यह दायित्व बोध भी –

 कविर्मनीषी परिभूः स्वयम्भूर्याथातथ्यतोऽर्थान्

 व्यदधाच्छाश्वतीम्यः समाभ्यः ।

(मनीषी, कवि

श्रेष्ठतम सबसे

स्वयं ही उत्पन्न

सब कुछ जो जहां जैसा

बनाया है उसी ने

सदा से

सबके लिए आगे ।  यजुर्वेद 40/8)

 

राजरानी जी इसलिए बहुत सोच विचार के बाद अपने विचार-लालित्य के प्रकाशन में प्रवृत्त हुई हैं । उन्हें डा. हजारी प्रसाद द्विवेदी और डा. विद्यानिवास मिश्र के इस क्षेत्र के अवदान और परंपरा का सम्यक् बोध है । यह उनकी अपनी श्रद्धा का भी धरातल है । अत; इस संग्रह के अधिकांश निबंध इसी संश्लिष्ट परंपरा को समृद्धतर बनाते प्रकट होते हैं । धरातल की इस समानता में उनकी संस्कृत और हिन्दी की पृष्ठभूमि के साथ उनमें जन्मना व्रज-रज की वह रस सिक्तता भी है जो जीवन-आह्लाद को नित्यता प्रदान करती है । ब्रजराज, व्रज और व्रजांगनायें’, उपालंभ काव्य और ब्रज गोपिकायें’, रस रहस्य का रसगीत कदंब आदि विनिबंध इसी सत्य के परिचायक हैं –

प्रतीत होता है कि कृष्णावतार का संत है कदम्ब ....!अनुरागी चित्त सा ब्रह्मरसलीन सा !

जगर मगर  करते सत्वोद्रेक स्नात गोल -गोल मुदित मन की कहानी सी कहते मोदक पुष्पों के गुच्छे लिये ऐसा सजा खड़ा है मानो कोई अभिसारिका प्रिय की प्रतीक्षा में हो आकुल -व्याकुल सी नेहनिमग्ना सी अपनी मनोभूमि में लीन मिलनोत्कंठा से ऊभ -चूभ ! (रस रहस्य का रसगीत कदंब)

यह स्पष्ट है कि एक निबंधकार संदर्भगत मनःस्थितियों, भावबोध और अभिव्यंजना के आयामों की बहुलता में विषय विशेष केन्द्रित नहीं रह सकता है, किन्तु अपने शिल्प और अवधारणा की केन्द्रिकता में उसे सर्वथा प्रत्यक्ष और परिपूर्णता में देखा जाना चाहिए । अत: इस संग्रह में जहां व्रजराज की बांसुरी और रणरंग धीर की धनुष टंकार सुनी जा सकती ही है, वहीं नए युग के समस्त सरोकार भी जीवन व्यवहार के नवरस परिपाक में संसिक्त देखे और समझे जा सकते हैं । एक और उदाहरण अथातो आनंदलोक जिज्ञासा, ग्रहस्थ रस के वीतरागी शांत रस का इस प्रकार है –

एक रस और है जो अभी नव रस में बचा है और वह है शांत रस...! ग्रहस्थ रस की झिलमिली में यह रस तब प्रकट होता है जब बेटे को बहू और बेटी को दामाद उड़ा ले जाते हैं फिर चाहे देश में ले जाएँ या विदेश में ....!क्या फर्क पड़ता है ! तोता मैना की कहानी तो फिर उसी अकेली शाख से शुरू होने लगती है, पर सुर बदले-बदले से ..। फिर उसके बाद के नौ रस शांत रस में ढल जाते हैं.... अक्षत पात्र को देहरी पर उढका कर आनेवाली नायिका की रग-रग अक्षतगरिमा में ढल जाती है । लौकी, तुरई का शांत रस रसोई में उतरता है तो दवाओं के चमचमाते पत्तों की बारात शयनकक्ष में ।

                              

मैं नहीं समझता कि जीवन के स्थायी भाव की इस निर्वेद पराकाष्ठा में पहुंचाकर इस पुस्तक की भूमिका में मुझे कुछ और कहना शेष रहता है । अस्तु सभी सुधी पाठकों, समीक्षकों और जिज्ञासु जनों का समादर पूर्वक मैं इस महद् द्वार में प्रवेश पूर्व अभिवादन करता हूँ । शुभमस्तु ते पंथान: । 

प्रभुदयाल मिश्र, भोपाल

 

P.D Mishra President, Maharshi Agastya Vedic Sansthanam, Bhopal; Facebook- Prabhu Mishra, blogspot.com-Vishwatm, web-www.vishwatm.com, Twitter-@PDMishra, YouTube/Academiya.edu- Prabhu Dayal Mishra, LinkedIn-pdmishrabpl67@hotmail.com, Speakingtree-Prabhu Dayal Mishra ‘Vishwatm’.