Sunday, 25 January 2026

 तुलसी मानस प्रतिष्ठान भोपाल की संस्कृति, साहित्य मासिकी तुलसी मानस भारती के संपादकीय वर्ष 2025  

जनवरी 2025

स्वामी रामतीर्थ की 150वीं जन्म जयंती

आदिशंकर, ज्ञानेश्वर और विवेकानंद जी के ज्ञान, वैराग्य और अद्वैत दर्शन की पराभूमि में प्रतिष्ठित स्वामी रामतीर्थ ने भी अल्प आयु मात्र 33 वर्ष में अपना देहोत्सर्ग किया। उनमें इन अन्य तीनों दैदीप्य दिव्यात्माओं की ही भाँति पारगमन, पराप्रवेश और पारंगत सनातन भारतीय मेधा की चमक और मानव मात्र को लोकोत्तर पथ प्रशस्त करने की अलौकिक क्षमता थी। पर सबसे विलग वे जीवन पर्यंत प्रकृति, परमात्मा और जीव की त्रिसत्ता में निर्वाध रूप से प्रतिष्ठित थे

तुलसी मानस प्रतिष्ठान ने एतदर्थ देश की विश्व गुरुत्व की प्रतिष्ठा की संकल्पना प्रकल्प में 2025 का तुलसी मानस भारती का वार्षिकांक इस अवसर विशेष पर इन्हीं 'राम' को समर्पित किया है। जिस महापुरुष ने अपना धाम, शिक्षा, जीवन, परिवार और सम्पूर्ण सांसारिक बोध सर्वथा और सर्वदा 'राम' को ही सौंपकर अपनी पहचान एक शब्द 'राम' की ही सर्वव्याप्ति को समर्पित कर दी हो तो इस प्रतिष्ठान को उसके स्मरण के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प महत्वपूर्ण भी नहीं हो सकता

इसी अभिप्राय से हमारा यह विशेषांक अब हमारी मूल योजना 'विश्व रामायण द्वितीय, शोधसामग्री अंक' पर केन्द्रित नहीं है। इसके लिए अधीत विद्वान् और मनीषियों ने हमें हमारे अनुरोध पर जो सामग्री उपलब्ध कराई उसका उपयोग हम यथासंभव मार्च 2025 में एक अतिरिक्त विशेषांक के रूप प्रकाशित करने की चेष्टा कर रहे हैं। इस तरह इस अंक को मार्च 25 में समाहूत तृतीय विश्व रामायण सम्मेलन में अतिथियों और प्रतिभागियों को सुलभ भी कराया जा सकेगा।

आशा है हमारे सहयोगी बन्धु-बाँधव और पत्रिका के प्रबुद्ध पाठक हमारे इस अनुरोध को मान्य करेंगे।

इस परिवर्तन की महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि यह है कि प्रतिष्ठान ने कुछ माह पूर्व भारत सरकार को प्रतिष्ठान के अपने उद्देश्य और संकल्पना के अनुसार नियमित प्रकाशन, प्रदर्शन और परिसंवाद श्रृंखालाओं से स्वामी राम के सूक्ष्म संदेश को राष्ट्रीय पटल पर परिप्रसारित करने का प्रस्ताव भेजा था। भारत सरकार ने हमारे इस आह्वान को उचित सहायता सहित सहर्ष स्वीकार किया है। इस योजना विषयक योग्य जानकारी इस अंक में यथा स्थान दी जा रही है ताकि हमारा पाठक वर्ग इससे स्वयं जुड़कर अन्य उत्साही जनों को भी हमारे समीप ला सके

स्वामी रामतीर्थ से संबंधित कुछ पुस्तकें हमें ज्ञानतीर्थ सप्रे संग्रहालय प्रमुख श्री विजयदत्तजी के सौजन्य से प्राप्त हुई जिनका यथेष्ट उपयोग कर हम अंक की सामग्री को समृद्ध कर सके हैं। समयाभाव के कारण प्रचुर विषय बोध अन्तर्जाल साधन से भी प्राप्त कर उसका अनुवाद और संश्लिष्टीकरण कर उसे संप्रेषणीय बनाया गया है। इसके लिए स्वामी रामतीर्थ मिशन, गूगल, विकीपीडिया, एआई तथा अन्य सभी संचार माध्यमों के प्रति हमारा परिपूर्ण कृतज्ञता का भाव प्रकटन है

इस अंक का द्वितीय संक्षिप्त प्रभाग हमारी संकल्पना के अनुसार युग तुलसी श्रीरामकिंक जी उपाध्याय के जन्म शताब्दी वर्ष पर उस शो सामग्री का विस्तार है जिसकी घोषणा हम अन मंचों से विगत अवधि में करते रहे हैं।

हमारा विश्वास और अभीप्सा है कि पत्रिक का समग्र पाठक वर्ग इस महायात्रा में सदा के भांति हमारे साथ ही संसरित है चरैवेति चरैवैति

प्रभुदयाल मिश्र प्रधान संपादक 9425079072

 

निर्वचन फरवरी

निर्वचन फरवरी 2025

श्रीकृष्ण का गीता में प्रयुक्त ‘अहं’ पद  

भगवान श्रीकृष्ण  द्वारा गीता में ‘अहं’ पद का कुल 104 बार प्रयोग किया गया है जिसमें अकेले विभूतिपाद अध्याय 10 में  31 बार और अध्याय 9 के श्लोक 16 में इसकी 8 बार आवृत्ति होती है। अध्याय 18 के श्लोक 64 में में वे जब ‘सर्वगुह्तमं’ अपने ‘परम’ वचन का उद्घाटन करते हैं तो श्लोक 65 में कहते हैं कि मुझ पर संपूर्णतया आश्रित रह मेरे प्रति समर्पित रहो - मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु तथा श्लोक 65 में पूर्णतया आश्वस्त करते हुए साधक भक्त को सभी पापों से भी उन्मुक्त कर देने का प्रतिज्ञा कथन करते हैं –

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज

अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयष्यामि मा शुच:  १८/६६

अहम् - हम् के पूर्व अ जोड़ने से बनता है । षट्चक्र योग की दृष्टि से विचार करने पर हम पाते हैं कि आज्ञा चक्र के कमल के तीन पटलों के बीजाक्षर - दायें से बाईं ओर हैं - हं ऊँ क्षं । ये क्रमश: शिव ब्रह्म और शक्ति वाच्य हैं । नाड़ियों की दृष्टि से ये पिंगला सुषुम्ना और इडा हैं जो स्वर संधान का प्रतिनिधित्व करती हैं । शिव स्वरोदय आदि शास्त्र प्रणीत यह पृथक स्वर विज्ञान है । यहाँ हम केवल अहं शब्द पर ही केन्द्रित रहना चाहते हैं । यदि सामान्य भाषा शास्त्रीय दृष्टि से ही विचार करें तो स्पष्ट होगा कि शिव वाच्य हं में क्या हम नकारात्मक '' आदि में जोड़कर सार्वभौम, सर्वकल्याणकर परं सत्ता को एक नकार भाव से अपने अहंकार की शून्यता में ही नहीं समेट लेते हैं? इस स्थिति में तो इसका नकार ही अपनी ‘अहंकार शून्यता’ में हमारे समर्पण का परिचायक हो सकता है ।

यहाँ मूल प्रश्न यही है कि यह कैसे संभव है कि अखिल गुरु भगवान श्रीकृष्ण इतने बार इस अहं का प्रयोग मात्र स्वयं को प्रकाशित करने के लिए कैसे कर रहे हैं

मनीषी महापुरुष इस अहं पद की व्याख्या एक उस सत् रूप में ही करते हैं जिसके अतिरिक्त किसी असत् सत्ता के अस्तित्व की परिकल्पना ही नहीं की जा सकती - नासतो विद्यते भावो न भावो विद्यते सत: । 

ईश्वर अनन्यता के इस भाव को भरत, लक्ष्मण और हनुमान के चरित्र से अच्छी तरह समझा जा सकता है ।जानहुं मात पिता जनि काहू के लक्ष्मण और जनम जनम रति राम पद’ के भरत तथा ‘त्राहि त्राहि भगवंत’ के हनुमान के लिए श्री राम जैसे इसी को परिभाषित करते हुए कहते हैं - मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत् । योग दर्शन में इसी प्रपत्ति भाव को प्रणिधानता कह कर महर्षि पतंजलि ने इसे अष्टांग योग साधना के विकल्प के रूप में प्रस्थानित किया है – ईश्वर प्रणिधानाद्वा ।

वेदान्त की दृष्टि से ब्रह्म क् इस अहं में हमारी भी अवस्थिति है । वे इसमें हमारे अप्रकट भाव को ही अभिव्यक्ति दे रहे हैं । उनके इस गीता गान में हम भी उनके साथ एक समस्वरता में इसे गा रहे हैं । यहाँ अंतर केवल यह है कि वे जो हैं उसकी उन्हें संपूर्ण प्रतीति है जबकि हम इसे सुनकर और यत्किंचित समझ के बाद भी इस सार्वकालिक परम दिव्यात्मा दिव्य अनुभूति के प्रति बेसुध बने हुए हैं । उनकी कृपा का यह वेग और परिपूर्णता इतनी परम है कि उनके प्रत्येक स्वर संधान के साथ हमारे उत्कर्ष की भूमिका निर्मित हो रही है । वे हमारे द्वारा निर्मित अनन्त काल और लोक लोकान्तर की दूरी अपने विराट पग से पाटने को तत्पर और हम जैसे 'मैं' की कारा में अपने ही अहंकार में निबद्ध हैं ।

 गीता के अध्याय 15 के श्लोक 15 में भगवान मानवीय चेतना की जागृत, स्वप्न, सुषुप्ति और समाधि आदि चारों अवस्थाओं में अपनी इस परम सत्तात्मक उपस्थिति की इस प्रकीर प्रतीति कराते हैं –

सर्वस्य च अहम् हृदि संनिविष्टः मत्तः स्मृतिः ज्ञानंपोहनं

वेदैश्च सर्वैः अहमेव वेद्यः वेदान्तकृत् वेदविदेववे चाहम्।।

अहंकार चतुष्टय - मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार क्रमोत्तर सूक्ष्म रीति से हमारे बोध की व् परिधियां हैं जो क्रमश: स्वप्न, जागृत, सुषुप्ति और समाधि अवस्था के स्तरों से संबंधित है । श्री कृष्ण गीता के अध्याय १५ के श्लोक १५ में इन्हें ही स्मृति, ज्ञान, अपोहन और च से संकेतित कर यह कह रहे हैं कि वे तो इन सूक्ष्माति सूक्ष्म अवस्थाओं में भी हमारे साथ ही हमारे प्रेक्षक बन कर चल रहे हैं । अर्थात् ऐसा कभी नहीं है जब वे हमारे साथ न हों । 

वेद के चार महावाक्य- तत् त्वम् असि, अहं ब्रह्मास्मि, प्रज्ञानम् ब्रह्म और अयम् आत्मा ब्रह्म छान्दोग्य उपनिषद् के “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” में जैसे इसी परम प्रज्ञा का अनुनाद है ।

इस प्रकार गीता में श्री कृष्ण द्वारा प्रयुक्त ‘अहं’ वाच्य को सर्वनाम न होकर ऐसी परम 'सत्तात्मक 'संज्ञा' है जिसके अतिरिक्त अतिरिक्त ऐसा कोई अस्तित्व ही नहीं है जिसे किसी भेद रूप में दर्शाया अथवा प्रकट किया जा सके ।

प्रभुदयल मिश्र

प्रधान संपादक

निर्वचन मार्च 25

  वागर्थाविव सम्प्रक्तौ

 

महाकवि कालिदास ने महाकाव्य 'रघुवंशम्' के प्रारंभ में शीर्षोक्त श्लोक में वंदना करते हुए शिव और पार्वती को वाणी और अर्थ सायुज्यता में समस्त संसार के पिता और माता के रूप में समाराध्य माना है ।

कविकुल गुरु कालिदास से गोस्वामी तुलसीदास लगभग १५०० वर्ष पश्चात् जन्मे । उनके रामचरितमानस के महानायक स्वयं भगवान् राम ही थे । उनका आविर्भाव भी वैष्णव भक्ति की उस लोक व्यापी धारा के उन्मेष काल में हुआ जिसमें दर्शन की द्वैत, अद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत और अचिन्त्य भेदाभेद की धारायें प्रवाहित थीं । इसके अतिरिक्त प्रकाश और विमर्श रूप कश्मीरी प्रत्यभिज्ञा दर्शन के पराद्वैत शिव और शक्ति का भारत की विचार भूमि में आगमिक प्रवेश भी चुका थे । काशी में षडंग वेद शिक्षा और आद्याचार्य रामानंद परम्परा में स्वामी नर्हर्यानंद से गुरु दीक्षा प्राप्त गोस्वामी तुलसीदास जैसे भारतीय ज्ञान की इस अक्षुण्ण धारा को शिव सायुज्यता की तदाकारता में साक्षात्कार हेतु प्रतिसंकल्पित थे । अत: वे परम स्रष्टा राम और सीता की नित्य संयोग लीला के प्रतीक को कुछ निम्न प्रकार से विस्तार देते हैं -

गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न

बंदउं सीता राम पद जिनहिं परम प्रिय खिन्न । (बालकांड १८)

यहाँ यह विचारणीय है कि अपने आराध्य-आराध्या की यह संयुति आगे उनके विस्तारित मंगलाचरण की पुनरावृत्ति में ही परिलक्षित है क्योंकि वे वाणी और अर्थ के नियामक के रूप में पूर्व में मंगलाचरण के पहले श्लोक में वाणी और विनायक की आराधना कर चुके हैं -

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छंदसामपि

मंगलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणी विनायकौ । (बालकाण्ड 1)

यह स्वाभाविक ही है कि गोस्वामी तुलसीदास कालिदास से शिव और शक्ति की पिता-माता की सायुज्यता के प्रयोग विधि से प्रभावित हुए हों । तथापि उनकी अपनी विशेषता इस वाणी और अर्थ की युति की सिद्धि में सरस्वती और गणेश के समाराधन में प्रयुक्त है जिसकी सिद्धिवत्ता कला साधन और कार्य सिद्धि में परंपरा से भी प्रसिद्ध है । आगे अपने प्रयोजन को उन्होंने रस और छंद के संसाधन (रसानां छंदसामापि) में भी इन देवताओं की सहायता से अधिक संसिद्ध बनाया है । जहां तक वंदना प्रसंग में शिव और शक्ति की परा सायुज्यता का संदर्भ है तो इसे अगले दूसरे श्लोक में ही उन्होंने उपासना भक्ति के विशेष संदर्भ से इसे इस प्रकार जोड़ा है –

भवानीशंकरौ वंदे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ

याभ्यां बिना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वांतस्थमीश्वरम् । (बालकाण्ड 2)  

संस्कृत कविता जगत में कालिदास को काव्योपमा के क्षेत्र में परमोत्कर्ष पर प्रतिष्ठित किया जाता है – उपमा कालिदासस्य.. । निश्चित ही तुलसी भी उपमेय और उपमान की दीर्घ रूपक संकल्पना में सर्वथा अप्रतिम हैं किन्तु यहाँ अनुवर्तनीय तुलसी के द्वारा निगम और आगम सार रूप द्वैत और अद्वैत की समस्वरता ही है । वे आयोध्याकाण्ड के आरंभ के प्रथम् श्लोक – यस्यान्के च विभाति .. , लंकाकाण्ड के द्वितीय मंगल श्लोक – शन्खेन्द्वाभमतीवसुंदरतनुं.. और उत्तरकाण्ड के तीसरे मंगल श्लोक – कुंदइंदुदरगौर.. आदि सभी स्थानों पर शिव-शक्ति की इसी सायुज्यता का दर्शन करते हैं ।

बालकाण्ड के आरंभ (54 1-2) में रामकथा की निगमिक पृष्ठभूमि में भारद्वाज ऋषि याज्ञवल्क्य से यही पूछते हैं –

राम नाम कर अमित प्रभावा । संत पुरान उपनिषद गावा

संतत जपत संभु अविनासी । सिव भगवान ज्ञान गुन रासी (1/46)

किन्तु उनके सामने आरंभिक वंदना प्रसंग (बालकाण्ड 15 2-3) में शिव की लोकाभिमुख आगमिक संज्ञा भी सुस्पष्ट है –

गुरु पितु मातु महेस भवानी । प्रनवऊँ दीनबंधु दिन दानी

सेवक स्वामि सखा सिय पिय के । हित निरुपधि सब बिधि तुलसी के ।

कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा । साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरजा

अनमिल आखर अरथ न जापू । प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू ।

अर्थात् शिव-पार्वती तुलसी के पिता-माता के अतिरिक्त गुरु भी हैं तथा उनके इष्ट श्री राम के सेवक, स्वामी और सखा होने के कारण अहैतुकी उनके मंगल के विधायक हैं ।  

इससे यही स्पष्ट होता है कि गोस्वामी तुलसीदास परंपरा के नैरंतर्य में ही नहीं ज्ञान की धारा की शाश्वतता का भी वह प्रतिमान स्थापित करते हैं जो प्रत्यभिज्ञा के रूप में सनातन भारतीय दर्शन और विमर्श का निकष तथा लोकातीत परा प्रतीति का प्रकर्ष कही जा सकता है । इस प्रकार तुलसी की वाणी के अक्षर-अक्षर को आर्ष गिरा की संज्ञा दी जाना ही परम विधेय है ।

 

 

          


निर्वचन अप्रैल 2025                          

 क्रिया शक्ति कैकेयी

इच्छा, ज्ञान और क्रिया मनुष्य के पुरुषार्थ साधन के प्रधान पक्ष हैं। महाराज दशरथ के जीवन में कौशल्या ज्ञान, सुमित्रा उपासना (इच्छा) और कैकेयी क्रिया शक्ति की परिचायक हैं । तुलसीदास जी की स्थापना है कि महाराज दशरथ अपने चार पुत्रों के रूप में पुरुषार्थ चतुष्टय रूपी चार फल ही प्राप्त करते हैं –

जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि । (बा. 325)

ज्ञान, भक्ति और दर्शन की परंपरा के देवाचार्य राजेंद्रदास जी का कहना है कि शास्त्र विहित क्रिया का आदर्श प्रस्तुत करने वाले महापुरुष अत्यल्प ही होते हैं । भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को अपने स्वयं के जीवन का आदर्श प्रस्तुत करने के स्थान पर कार्य और अकार्य का शस्त्र प्रतिपादित आचरण करने का ही परामर्श देते हैं – तसमाच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्य व्यवस्थितौ (गीता 16/24)

आचार्य जी का यहाँ यह कहना है कि शास्त्र अर्थात् वेद विहित आचरण प्रथम धर्म है – आचारो हि प्रथमो धर्म: । इसके आगे की व्यवस्था में निष्काम कर्म का आचरण ही पाण्डित्य की सही परिभाषा है- य: क्रियावान स्: पंडित: । इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण की परिभाषा में एक निष्काम कर्म योगी ही सही अर्थ में पंडित है ।

यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि जो निष्काम है उसे क्या भगवान की भक्ति और समर्पण की आवश्यकता नहीं है ? यदि ऐसा होता तो भगवान अपने ‘सर्वगुह्यतं’ और ‘परम’ कथन के रूप में सभी ‘धर्म’ (कर्तव्य-अकर्तव्य) को छोड़कर मात्र उनकी ‘शरण’ में आ जाने का ही परामर्श क्यों देते? इस संबंध में उनके कथन के प्रकाश में सत्य यही है कि प्रेमास्पद परमात्मा के प्रति एक जीव की निर्भरता ही अपने आप में उसकी परिपूर्णता है।    

प्रपन्नता की इस क्रिया शक्ति की महाराज्ञी कैकेयी के संबंध में यह विचार और अनुमान सर्वथा भ्रमात्मक ही है कि उन्हें यह पूर्वानुमान नहीं था कि दशरथ जी से राम के लिए वनवास मांगने का परिणाम राम से विरह, पति से वियोग और भरत से मातृत्व संताप होगा । किन्तु जिस प्रकार श्री राम की अपेक्षा के लिए भरत चित्रकूट से उन्हें बिना लौटाए चले आए उसी प्रकार कैकेयी ने भी राम की प्रसन्नता के लिए ही तीनों ईषणाएँ (पुत्र, वित्त और लोक) का न केवल परित्याग किया अपितु श्री राम की प्रसन्नता के लिए लोक गर्हिता की दारुण यंत्रणा भी स्वीकार की । श्री राम इसे जानते थे इसीलिए उन्होंने न केवल भरत वल्कि वाल्मीकि रामायण के अनुसार महाराज दशरथ से भी रावण वध के बाद उनके स्वर्ग से प्रकट होने पर उनसे कैकेयी का  अपरित्याग करने का आश्वासन प्राप्त किया था ।

यह तो रामचरित मानस से स्पष्ट ही है कि सरस्वती में कैकेयी की बुद्धि को प्रभावित करने का साहस नहीं था इसीलिए उन्होंने कुटिल मति मंथरा को उनकी मंत्रणा का माध्यम बनाया । एक महाकाव्य की कथावस्तु में द्वन्द्वात्मक परिस्थितियों के निर्माण में यह युक्तियुक्त प्रतीत होता है । परंतु जैसा कि वाल्मीकि रामायण और अध्यात्म रामायण से स्पष्ट है, कैकेयी ने दशरथ से राम के लिए दंडक वन प्रवास स्पष्टतः मांगा था –

नव पञ्च च वर्षाणि दण्डकारण्यमाश्रिता (वाल्मीकि रामायण आयोध्याकाण्ड 11/26)

अपरेण वरेणासु रामोगच्छतु दंडकान् । (अध्यात्म रामायण, आयोध्याकाण्ड 3/18)

इससे तो यही प्रतीत होता है कि कैकेयी जी का श्री राम को अभिशप्त रावण के प्रभाव क्षेत्र दण्डकारण्य भेजना ही उनका अभीष्ट था !     

रामचरित मानस में श्री राम चित्रकूट की विचार सभा में भरत को समझाते हुए स्पष्ट कहते हैं –

दोसु देहिं जननिह जड़ तेई । जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई । (2/263)

कहते हैं कि वनवास से लौटने के बाद जब राम ने देखा कि भरत का कैकेयी के प्रति आक्रोश दूर नहीं हुआ है तो उन्होंने भरत को सम्पूर्ण रहस्य प्रकट कर पूछा कि तुम कैकेयी से बात क्यों नहीं करते तो उन्होंने अत्यंत क्षोभ व्यक्त करते हुए यही कहा कि आप की प्रिय माता को इतना कष्ट पहुंचा कर तो मैं उन्हें मुंह दिखाने का ही पात्र नहीं रह जाता !

क्या अब वह अवसर हमारे सामने ही प्रकट नहीं है जब हम अपनी सभी विगत पीढ़ियों सहित माता कैकेयी के प्रति अब तक प्रकट अपनी लांछना के लिए पश्चाताप करें ?

प्रभुदयाल मिश्र

प्रधान संपादक तुलसी मानस भारती 

           

     

 

निर्वचन मई 2025

                       जानकीस की कृपा ....

 

गोस्वामी तुलसीदास की विनयपत्रिका के पद 74 का आरंभ शीर्षोक्त पंक्ति से इस प्रकार होता है-

जानकीसकी कृपा जगावती सुजान जीव,
जागि त्यागि मूढ़ताऽनुरागु श्रीहरे ।

राग विभास में निबद्ध यह पद स्वभावत: प्रातःकालीन है और भगवद् भक्तों को ब्राह्म वेला में दिव्य जागरण की अनुभूति का प्रत्यक्ष प्रबोध कराता है। इसकी व्याख्या करने वाले भक्तों, महात्माओं और साधु पुरुषों का यही मत है कि यह गोस्वामी तुलसीदास की स्वयं की भाव- समाधि का ही लेखांकन है । इसका शब्द-शिल्प, बिम्ब विधान और अर्थ निष्पत्ति इस दृष्टि से असाधारण है कि इसका पाठ करते हुए कोई भी भाव समाधि में पहुंचकर स्वयं दैवी धरातल में प्रवेश कर जाता है । अपनी तुरीय चेतना में तुलसी द्वारा चैतन्न्य के साक्षात्कार की इस प्रक्रिया का यह निदर्शन देव-दुर्लभ ही प्रतीत होता है ।

इस पद के चार चरण जैसे चेतना के जागरण, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय अस्थाओं का अभिचित्रण हैं । बुद्धि प्रधान पहली जागृत अवस्था के लिए तुलसी अज्ञान जनित असत् संसार के स्थान् पर प्रभु श्री राम की प्रकट कृपा का अनुभव करने को कहते हैं । दूसरे चरण में वे कल्पित काल और लोक में मन के द्वारा स्वप्न में रचे गए इसी नाम रूपात्मक असत् के विस्तार से अपने वास्तविक स्वरूप को भूल जाने का अनुभव कराते हैं                    

-    मोहमय कुहु-निसा बिसाल काल बिपुल सोयो,
खोयो सो अनूप रूप सुपन जू परे ।

प्रत्यूष वेला में सूर्य रूपी शुद्ध ज्ञान से अज्ञान जनित अंधकार रूप  वासना, राग, मोह द्वेश आदि वृत्तियां कैसे विसर्जित हो जाती हैं इसका विवरण आगे की इन पंक्तियों में प्रकट होता है-

अब प्रभात प्रगट ग्यान-भानुके प्रकाश,
बासना, सराग मोह-द्वेष निबिड़ तम टरे ॥ २

सुषुप्ति की तीसरी अवस्था मन और बुद्धि के परे अस्तित्व बोध ‘अहं’ में सीमित रहती है किन्तु भागवत चेतना में यह मुक्ति का ही मार्ग प्रशस्त करती है जिसका प्रकाशन गोस्वामी जी इन शब्दों में करते हैं-
भागे मद-मान चोर भोर जानि जातुधान
काम-कोह-लोभ-छोभ-निकर अपडरे ।
देखत रघुबर-प्रताप, बीते संताप-पाप,
ताप त्रिबध प्रेम-आप दूर ही करे ॥ ३

तुरीय, जो इन तीनों के परे है तथा जिसमें सीर्वभौम चैतन्न्य मात्र की परिपूर्ण अवस्थिति है, परमात्मा की व्याप्ति का प्रकटीकरण इस प्रकार से करती है –

श्रवण सुनि गिरा गँभीर, जागे अति धीर बीर,
बर बिराग-तोष सकल संत आदरे ।
तुलसिदास प्रभु कृपालु, निरखि जीव जन बिहालु,
भंज्यो भव-जाल परम मंगलाचरे ॥ ४

चाहे ज्ञानमार्ग का मोक्ष हो, योग का परम पुरुषार्थ हो अथवा भक्त की सायुज्य प्रपन्नता हो, तुलसी इस चतुर्थ पाद में सभी के समन्वित स्वरूप वर्णन कर देते हैं ।

गीता के अध्याय १५ के श्लोक १५ के इंद्रवज्रा छंद के द्वतीय पाद में प्रयुक्त “स्मृति ज्ञान अपोहनं च” की विद्वान महात्मा चेतना की इन चार अवस्थाओं का ही व्यंजक बताते हैं । भगवान् श्री कृष्ण यहां यह स्पष्ट करते हैं कि इन सभी अवस्थाओं के प्रकाशक और इनमें सर्वथा विद्यमान मात्र वही हैं । गीता का यह भाव भारतीय ज्ञान धारा का प्रतिनिधि दर्शन है ।

गोस्वामी तुलसीदास जैसे महात्मा का यह प्रकट सत्य साक्षात्कार रामानुरागियों का कितना बडा संबल नहीं है!

प्रभुदयाल मिश्र, प्रधान संपादक

 

  निर्वचन जून 2025

                                  वहन्ती सिंदूरम्

वाल्मीकि रामायण और रामचरित मानस के अनुसार जब हनुमानजी सीताजी की खोज में सौ योजन के महासागर को पार करने की छलांग लगाते हैं तो उसमें स्थित मैनाक पर्वत एक द्वीप के रूप में उभरकर उन्हें इस दुर्गम अभियान में कुछ विश्राम देने का प्रस्ताव करता है । तुलसी के मानस के अनुसार मैनाक को यह प्रेरणा स्वयं समुद्र ने दी –

जलनिधि रघुपति दूत बिचारी । तैं मैनाक होहि श्रमहारी । 1/ 4

अर्थात् समुद्र ने यह विचार करते हुए कि राम के दूत को अपनी दीर्घ यात्रा में कुछ विश्राम मिले, इस आशय से उसने मैनाक पर्वत को इस कार्य हेतु प्रेरित किया । हनुमान जी भी पर्वत का स्पर्श मात्र कर यह कहते हुए आगे बढ़ गए कि बिना राम के कार्य को पूर्ण किए उनकी किसी विश्राम की कोई स्थिति ही उत्पन्न नहीं होती –

हनुमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रणाम

राम काजु कीन्हैं बिनु मोहि कहाँ बिश्राम ।

वाल्मीकि जी ने इस प्रसंग में मैनाक के इस कथन में भारतीय सनातन धर्म के शाश्वत स्वरूप का परम आदर्श ही प्रस्तुत कर दिया है -  

कृते च प्रतिकर्तव्यं एष धर्म सनातन:

सोsयं तत् प्रतीकारार्थी त्वत्त: सम्मानमर्हति । 5/1/114

अर्थात् कर्तृत्व, उपकार के प्रति उपकृति भाव एक सनातन धर्म तत्व है । इसलिए हे हनुमान आप मेरे द्वारा सर्वथा सम्मान किए जाने योग्य हैं ।

मैनाक पर्वत हनुमान के पिता वायु के द्वारा पूर्व में उसके प्रति किए गए उपकार के कारण उनकी सेवा अपने एक प्रतिकर्तव्य के रूप में देखता है । पुराण प्रसिद्ध इस क्षेपक कथा से भी भिन्न यह स्वभाविक ही है कि वायु ने अपने वेग से कभी मैनाक पर्वत को किसी उपगृह या पृथिवी से टकराकर नष्ट होने से बचा समुद्र में गिराकर उसकी सहायता की थी । अर्थात् भारतीय अवधारणा में कर्तव्य और प्रतिकर्तव्य की प्रक्रिया की यह सनातनता एक ऐसा ऋत बोध है जो जड़ और चेतन में भी काम करता है । इस प्रकार भारतीय जीवन की अवधारणा में इस सिद्धांत की सनातनता का सूत्र समय, स्थान, व्यक्ति और पदार्थ सभी में समान रूप से अवस्थित देखा जा सकता है ।

  

दूसरी ओर जब हम मानव सभ्यता के वर्तमान भारतीय इतिहास की ओर ही मुड़कर देखते हैं तो भारत आने वाले बाह्य आक्रान्ताओं को इस आधारभूत मानवीय धर्म का तिरस्कार करते हुए ही पाते है। मोहम्मद बिन कासिम, महमूद ग़ज़नवी, मोहम्मद गोरी, अलाउद्दीन खिलजी, तैमूर लंग, बाबर और औरंगज़ेब आदि की यही  इतिहास प्रसिद्धि है । ईसवी 1193 में बख्तियार खिलजी ने उस नालंदा विश्वविद्यालय को छह माह की धधकती ज्वाला में छोड़ा जिसके भेषज आचार्य राहुल भद्र ने उसे रोग मुक्त कर जीवन दान दिया था!

भारत शिव (कल्याण) के साथ-साथ सदा ‘शक्ति’ की आराधना करता रहा है । आदिशंकर ने अपने लोक प्रसिद्ध स्तोत्र ‘सौन्दर्यलहरी’ में शक्ति की सघन अलकावली के मध्य उनकी प्रवल सिंदूर सिक्त मांग का स्मरण किया है । यह पहलगाम की नृशंसता के प्रतिशोध में भारतीय सेना के ‘सिंदूर अभियान’ की एक सार्थकता और सिद्धि की पर्याय ही हो जाती है-

वहन्ती सिंदूरं प्रबल-कबरीभार-तिमिर-

द्विषां वृंदैर्बंदीकृतमिव नवीनार्क-किरणम् ।

तनोतु क्षेमं नस्तव वदन-सौन्दर्य-लहरी –

परीवाह-स्रोत: सरणिरिव सीमंत- सरणि: ।। 44 ।।

अर्थात् महाशक्ति के श्याम केश समूह की सुंदरता और मुख कमल की रुचिरता से प्रवाहित केशों की प्रवल  सिंदूर भरी अरुणाभ मांग हमारी कुशलता का आधार बने ।

सनातन पंथियों के लिए भारत-माता अपने सौभाग्य में देवी पार्वती और भगवती सीता की ही पर्याय है । रामचारित मानस में श्रीराम द्वारा विवाह के अवसर पर सीता के सिर की मांग में सेंदुर भरने का एक अदभुद काव्यात्मक बिम्ब इस प्रकार वर्णित किया गया है –

राम सीय सिर सेंदुर देहीं । सोभा कहि न जात बिधि केहीं।

अरुन पराग जलजु भर नीकें ।  ससिहि भूष अहि लोभ अमी के । बाल. 325

अर्थात् तुलसी कहते हैं कि राम के द्वारा सीता को सिंदूर देने की शोभा का वर्णन करने में अपने आप को मैं किसी भी रीति से समर्थ ही नहीं पा रहा हूँ। अत: मैं इसका बिम्ब कुछ इस प्रकार ही वर्णन कर रहा हूँ कि श्रीराम अपने हस्त कमल में लाल पराग भर कर सीता जी के मुख रूपी चंद्रमा के अमृतत्व की प्राप्ति की चेष्टा कर रहे हैं !  

असत् से सत्, अंधकार से प्रकाश और मृत्यु से अमृत की सनातन यात्रा का यह पथ भारत का ‘सिंदूर अभियान’ वह रक्ताभ रेखा है जिसे भारत ने आतंक और सभी प्रतिघात के लिए भविष्य की निर्धारक दिशा के रूप में अब चिह्नित ही कर दिया है !

यह हमारा सौभाग्य है कि आज हम इतिहास के जिस लोकांतरणकारी पल के साक्षी हैं वह हमारी सत् संस्कृति की सनातनता का जय घोष ही है । 

प्रभुदयाल मिश्र

प्रधान संपादक, तुलसी मानस भारती, (अर्धसदी पुरानी सांस्कृतिक मासिकी), भोपाल        

 

"सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम् ।

प्रियं च नानृतम् ब्रूयात्, एष धर्मः सनातन: ।।"

 

सत्य बोलें, प्रिय बोलें । अप्रिय सत्य न बोलें । ऐसा प्रिय भी न बोलें जो अनृत अर्थात् शाश्वत सत्य नहीं है । यही सनातन धर्म है ।   

 

   

 

 

 

 

निर्वचन जुलाई 2025

 

                        धर्म तें विरति जोग तें ग्याना

रामचरित मानस में श्रीराम के पंचवटी में पहुँचने पर गोस्वामी तुलसीदास एक अदभुद् ज्ञान-सत्र का समुल्लेख करते हैं । इसे प्रायः “लक्ष्मण गीता” के नाम से जाना जाता है । इसमें वक्ता श्रीराम और शिष्य-श्रोता लक्ष्मण जी हैं । यह प्रसंग दोहा क्रमांक 14 से 16 के अंतर्गत है । लक्ष्मण जी के सभी पाँच प्रश्न अध्यात्म तत्त्व का सार सर्वस्व तो हैं ही, वे गीता में अर्जुन के द्वारा अध्याय 8 में पूछे गए ब्रह्म और जीव संबंधी प्रश्नों से भी मेल खाते हैं जिनमें अर्जुन ने ब्रह्म, अध्यात्म, कर्म, अधिभूत, अधिदैव, अधियज्ञ के अतिरिक्त मृत्यु के समय मुक्ति के मार्ग की युक्ति चाही थी । लक्ष्मण जी यहाँ ज्ञान, वैराग्य, माया, भक्ति की परिभाषाओं के साथ ईश्वर और जीव की सत्ता का ज्ञान इस आशय से प्राप्त करना चाहते हैं जिससे उनका मोह और भ्रम दूर होकर उनकी श्रीराम के चरणों में अनुरक्ति हो सके ।

यहाँ शीर्षोक्त योग, ज्ञान और वैराग्य विषयों पर ही एक संक्षिप्त विचार का प्रसंग है । एक योग्य शिष्य और गुरु के संवाद की ये सुदृढ़ भूमिकाएँ तो हैं ही, योग्य साधक के जीवनानुभव का प्रकाश भी इसमें है । भगवान श्रीराम यहाँ ज्ञान तक पहुँचने की 3 सीढ़ियों- धर्म, वैराग्य और योग का उल्लेख करते हैं । यह प्रश्न हो सकता है कि धर्म की यह सीढी श्रीराम अपनी ओर से क्यों जोड़ रहे हैं? इसका कारण यह है कि सनातन भारतीय वैदिक व्यवस्था में ‘धर्म’ ऋत् और सत्य के सिद्धांतों पर आधारित जीवन लक्ष्य की सिद्धि का प्रशस्त पथ है - ऋ॒तं च॑ स॒त्यं चा॒भी॑द्धा॒त्तप॒सोऽध्य॑जायत (ऋग्वेद 10/190/1)। यह व्यक्ति ही नहीं जैसे सम्पूर्ण मानव जाति की रक्षा का वितान है –

धर्मेणैव प्रजाः सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम्॥महाभारत शांति पर्व -59-14॥

इस प्रकार धर्म प्रकृति सापेक्ष समन्वय ही नहीं वल्कि मानवीय अधिकार और कर्तव्य का भी अदभुद संतुलन है। यह तप, त्याग और परमार्थ की ऐसी त्रिवेणी है जो लोक से परलोक का पथ प्रशस्त कर पाप फलाशा आदि पवर्ग से ईश्वर सान्निध्य की ओर ले जाती है ।

त्याग और वैराग्य की निष्ठा कहीं मनुष्य को पुरुषार्थ हीन न बना दे, इसीलिए सनातन व्यवस्था के षड्दर्शन में योग मार्ग का अनुसंधान है। यह पतंजलि योगदर्शन के समाधिपद के दूसरे ही सूत्र के अनुसार आत्मसाक्षात्कार कराता है – तदा द्रष्टतु स्वरूपे अवस्थानम् । भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के अध्याय 4 के श्लोक 33 से श्लोक 37 तक ज्ञान की महिमा का वर्णन कर श्लोक 38 में ज्ञान प्राप्ति का योग-मार्ग ही प्रशस्त प्रतिपादित किया है –

नहि ज्ञानेन सदृशं  पवित्रमिह विद्यते

तत्स्वयं योगसंसिद्ध: कालेनात्मनि विंदति ।

अर्थात् इस संसार में मनुष्य को पवित्र बनाने के लिए ज्ञान की तुलना में अन्य कुछ श्रेष्ठतर नहीं है । इसे योग के आलंबन से मनुष्य अपने-आप ही प्राप्त कर लेता है ।

भगवान श्रीराम लक्ष्मण जी को ज्ञान का साक्षात्कार कराने के लिए इसी उदात्त मार्ग –‘जोग ते ग्याना’ की प्रतिष्ठा कर कहते हैं-

धर्म तें विरति जोग तें ग्याना । ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना ।।

यहाँ योग और वेदांत दर्शन का अदभुद समन्वय हो जाता है । यह रामायण और गीता के संदेश का भी समन्वय है । अतिरिक्त इसके यह भारतीय संस्कृति का वह सार संदेश है जो सार्वलौकिक, सार्वकालिक और सर्व सनातन है ।

 

प्रभुदयाल मिश्र

प्रधान संपादक

 

       


निर्वचन अगस्त 2025

सम प्रकास तम पाख दुहुं 

रामचरितमानस मानस के बालकांड में गोस्वामी तुलसी संतों के साथ खलों की वंदना करने के पश्चात् गुण और अवगुण से सने गुणात्मक संसार के सम्मिलित स्वरूप का तात्त्विक विवेचन करते हैं  वे यह भी कहते हैं कि इसके विस्तार में जाना अगाध समुद्र के तल को छूने जैसा कार्य है  किन्तु इस विश्लेषण में वे जो अनेक उदाहरण देते हैं उनमें एक चन्द्रमा का है जिसके दोनों पक्षों में यद्यपि प्रकाश की कुल मात्रा समान है किन्तु एककृष्ण पक्ष शोषण और दूसरा - शुक्ल पक्ष इसका पोषक होने के कारण अपयश और यशवान ठहराये जाते हैं  द्वैत के इतनी प्रबलता युक्त संसार में मनुष्य की नीर क्षीर विवेकी हंस की तरह चेष्टा होनी आवश्यक है  इसके लिए विवेक और साधु संग ही प्रशस्त पथ ठहरते हैं ।वास्तव में सृष्टि संचना का घालमेल इतना दुरूह है कि प्रकाश और अमृत भी दुस्संग से घनांधकार और विषतुल्य हो जाते हैं  इस संदर्भ में वेद-वेदांग सम्मत ज्योतिष और आयुर्वेद तथा विज्ञान सम्मत रसायन और भौतिक शास्त्र पर आधारित तुलसी का यह दोहा जीवन का आधार दर्शन कहा जा सकता है - 

ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग

होंहि कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग  बाल७-  

इसके अगले ही दोहे में चन्द्र की कलाओं पर आधारित शीर्षोक्त संदर्भित दोहा इस प्रकार है - 

सम प्रकास तम पाख दुहुं नाम भेद बिधि कीन्ह 

ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह  

स्कन्द पुराण के प्रभास खंड में भगवान शंकर भगवती पार्वती  को सागर मंथन के समय विष के अनंतर औषधि रूप चन्द्र के प्रकट होने की बात बताते हैं जो उनके मस्तक पर स्थित रह उनके कंठ के दाह को नियंत्रित करता है  

कहते हैं आरम्भ में चन्द्र तो पूर्ण सर्वकाल  प्रकाशमान थे  दक्ष प्रजापति ने उनकी सुंदरता से प्रभवित होकर उन्हें अपनी नक्षत्र रूपा २७ कन्यायें एक साथ व्याह दीं -

या राजन् सोमपत्न्यस्तु दक्षप्राचेतसो ददौ 

सर्वा नक्षत्रनाम्न्यस्ता ज्योतिषे परिकीर्तिता हरिवंश पुराण //३६ 

अर्थात् प्राचेतस दक्ष ने नक्षत्र नाम धारी अपनी सभी (२७कन्यायें चन्द्रमा को प्रदान कीं  

चन्द्रमा की नक्षत्र मालिका सहित इस शोभा को श्रीकृष्ण अपनी विभूति युक्त मानकर ही गीता में घोषणा करते हैं कि वे नक्षत्रों में चन्द्रमा हैं - 

नक्षत्राणामहं शशी ( गीता १०/२०

आगे पौराणिक आख्यान के अनुसार दक्ष पुत्रियों ने अपने पिता को शिकायत की कि चन्द्रमा चतुर्थ नक्षत्र  क्रम की रोहिणी से इतने आसक्त हैं कि शेष सभी बहनों की उपेक्षा हो रही है  इस पर दक्ष ने चन्द्रमा को यक्षमा से पीड़ित कर उनको पूर्णतया म्लान कर दिया  पश्चात् भगवान भोलेनाथ ने चन्द्रमा की आराधना से प्रसन्न हो उन्हें कृष्णपक्ष में क्रमशक्षीण होते हुए शुक्लपक्ष में पूर्णमासी के दिन रोगमुक्त होने का वरदान दिया ।यहां तक कि  शुक्लपक्ष की द्वितीया के चन्द्र को उन्होंने अपने मस्तक पर ही धारण कर उसे सर्वत्र वंदनीय ही बना दिया- 

यमाश्रितो हि वक्रोपि चन्द्रः सर्वत्र वन्दते । ( मानस मंगलाचरण श्लोक २)

तुलसीदास जी चन्द्रमा की प्रकाशवत्ता की दोनों पक्षों में समानता की बात करते हुए इस स्वरूप भेद को केवल नामात्मक धारणा ही बताते हैं, स्वरूपात्मक नहीं । इस प्रकार वे यहां अद्वैत और अभेदता के उस ज्ञानात्मक सत्य को उद्घाटित करते हैं जिसमें अन्ततः अभेद देखकर एक व्यक्ति सर्वत्र परमेश्वर की व्याप्ति के बोध का अनुभव करने लगता है । पर यह उनकी अपनी विशेषता है कि वे इस तत्त्वज्ञान को विनयशील भक्ति के विज्ञान की चासनी में पगा कर प्रस्तुत करते हैं जिससे वह व्यवहार्य हो जाता है-

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राम मय जानि

वन्दउँ सबके पद कमल सदा जोरि जुग पानि । बाल. 7-ग         

 

  प्रभुदयाल मिश्र, प्रधान संपादक                 

 

 

निर्वचन, तुलसी मानस भारती, माह सितंवर 2025                              

                                     राष्ट्र ऋषि और भाषा

भारत की संस्कृति, शिक्षा और भाषाई एकता को सुदृढ़ करने में ऐसे ऋषियों और आध्यात्मिक गुरुओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है, जिन्होंने परोक्ष या अपरोक्ष रूप से राष्ट्रीयता की भावना को संवर्धित किया। इनमें कुछ उल्लेखनीय नाम हैं- स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद सरस्वती, रवींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, स्वामी रामतीर्थ, श्री अरविंद आदि । योगिराज अरविन्द ने अपने वेद विषयक ग्रंथ में तमिल और संस्कृत भाषा के मूल तथा संबद्धता का प्रामाणिक परिचय देते हुए कहा है - भाषाविदों ने भाषाई अंतरों के आधार पर भारतीय राष्ट्रीयता को उत्तर आर्य जाति और दक्षिण द्रविड़ में विभाजित किया है, लेकिन ध्यानपूर्वक अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि पूरे भारत में, कन्याकुमारी से अफगानिस्तान तक, एक ही रचना प्रकार है जिसमें भिन्नताएँ अत्यल्प हैं। प्राचीन ऋषियों में महर्षि अगस्त्य ने संस्कृत भाषा के साथ-साथ द्रविड़ भाषाओं के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तमिल साहित्य में उन्हें प्रथम संगम युग के शीर्ष के रूप में मान्यता प्राप्त है, और तमिल व्याकरण ग्रंथ "अगस्त्यम्" उनसे जुड़ा हुआ जाना जाता है। महर्षि विश्वामित्र ने ऋग्वेद मण्डल 3 के मुख्य द्रष्टा ऋषि के रूप में  ज्ञान की अधिष्ठात्री गायत्री मंत्र का साक्षात्कार किया । वे जब दक्षिण यात्रा से लौट रहे थे तब उन्होंने मार्ग में मिली सतलज और व्यास नदियों को नमित कर उनसे मार्ग प्राप्त किया और यह कामना की कि नदियों का जल सम्पूर्ण राष्ट्र में राष्ट्र रक्षक होने की भूमिका का निर्वाह करे

रक्षति ब्रह्मेदं भारतं जनम्  -ऋग्वेद 3/53/12

      मध्यकालीन आदि शंकराचार्य ने पूरे भारत में यात्रा करके चार प्रमुख मठों (श्रृंगेरी, द्वारका, पुरी और बद्रीनाथ) की स्थापना की। तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में जन्मे श्री  रामानुजाचार्य ने अद्वैत वेदांत के मायावादी दृष्टिकोण का खंडन करते हुए दक्षिण भारत में भक्ति आंदोलन को एक नई दिशा दी। उनके शिष्य हर वर्ग और पृष्ठभूमि से थे, जिससे सामाजिक समरसता बढ़ी।कर्नाटक में जन्मे  मध्वाचार्य ने द्वैत सिद्धांत प्रस्तुत किया तथा निम्बार्काचार्य ने द्वैताद्वैत सिद्धांत प्रतिपादित किया।   आंध्र के चमपारण्य में जन्मे  श्री वल्लभाचार्य  ने शुद्धाद्वैत सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसे 'पुष्टिमार्ग' के नाम से भी जाना जाता है। कश्मीर के अभिनवगुप्त शैवागम ने शिव को परम तत्व माना। इस दर्शन ने विशेष रूप से कश्मीर, कर्नाटक, तमिलनाडु  जैसे क्षेत्रों में अपनी गहरी जड़ें जमाईं और इन क्षेत्रों की सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को आकार दिया। श्री रामानंद जी  ने दक्षिण भारत के भक्ति विचारों को उत्तर में प्रसारित किया। वे रामभक्ति शाखा के एक आद्याचार्य थे।

संत ज्ञानेश्वर महाराज  ने 13वीं शताब्दी ई में मराठी भाषा में भगवद्गीता पर विस्तृत भाष्य 'ज्ञानेश्वरी' (भावार्थ दीपिका) लिखा।  महाराष्ट्र के ही संत नामदेव जी  जो वारकरी संत थे, बाद में पंजाब गए और सिख धर्म में गहरा प्रभाव छोड़ा। उनके कुछ पद गुरु ग्रंथ साहिब में भी संकलित हैं। कबीर दास ने साखी, सबद और रमैनी के माध्यम से सामाजिक कुरीतियों, पाखंड और धार्मिक संकीर्णता का खंडन किया। संत रामानंद जी के शिष्य रविदास ने अपनी बानियों और दोहों के माध्यम से मानव समानता और आंतरिक शुद्धता पर जोर दिया। इस परंपरा में तुलसी, सूर और मीराबाई का स्मरण तो अविस्मरणीय है ही । गोस्वामी तुलसी दास द्वारा रामचरित मानस के आदि और अंत में निगम, आगम और पुराणों के सार संचय के रूप में हिन्दी में रची रामायण की भाषाबद्धता का संकल्प तो हमारा एक सार्वभौमिक प्रतिज्ञा कथन ही कहा जा सकता है ।       

अत: विश्व की आदि और सर्वाधिक शब्द सम्पन्न संस्कृत से निष्पन्न तथा संवर्धित हिन्दी का देश के कुछ क्षेत्रों में सत्ता लोलुपों के विरोध के बीच 14 सितंवर को मध्य प्रदेश के माधवराव सप्रे संग्राहलय प्रमुख श्री विजयदत्त श्रीधर द्वारा ‘मातृ भाषा संकल्प’ दिवस के रूप में समादृत करने के अवसर पर राष्ट्र ऋषियों की इस महान विरासत को उक्तानुसार स्मरण किया जाना सर्वथा स्वागतेय हो जाता है ।    

प्रभुदयाल मिश्र,

प्रधान संपादक

 

 

निर्वचन अक्टूवर २०२५    

 

                      भगवत्  साक्षात्कार

 

       मैंने कृत्रिम मेधा पटल (ए आइ ) से पूछा कि हे ‘सर्वज्ञ!’ आपके ज्ञान में भगवत् साक्षात्कार करने वाले व्यक्तियों के नाम हों तो प्रकट करें । ‘महाज्ञानी’ ने मुझे निम्न सूची प्रदान की -आदि शंकराचार्य, संत ज्ञानेश्वर, श्री रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि आगे यह भी कहा -इनके अलावा भी कई संत और योगी हुए हैं, जिनके जीवन को भगवत् साक्षात्कार का प्रमाण माना जाता है। इनमें कबीरदास, गुरु नानक, मीराबाई, चैतन्य महाप्रभु और तुकाराम जैसे नाम शामिल हैं।

      इस पर मैंने आगे पूछा कि इस सूची में तुलसीदास का नाम मैं नहीं देख रहा हूँ तब ‘प्रज्ञावान’ ने कहा -

‘इसके लिए मैं क्षमा प्रार्थी हूँ। वास्तव में, गोस्वामी तुलसीदास जी का नाम भी उन महान संतों में सर्वोपरि है, जिन्हें भगवत् साक्षात्कार हुआ था। उनका जीवन और उनका महाकाव्य 'श्रीरामचरितमानस' इस बात का सबसे बड़ा प्रमाण हैं।

माना जाता है कि उन्हें अपने आराध्य, भगवान श्रीराम का प्रत्यक्ष दर्शन हुआ था। उन्हें चित्रकूट में भगवान राम ने स्वयं आकर दर्शन दिए थे और उनके मस्तक पर तिलक लगाया था। इसके अलावा, हनुमान जी के आशीर्वाद से भी उन्हें कई बार प्रभु की उपस्थिति का अनुभव हुआ।‘

यहाँ ईश्वर के ‘निर्गुण’ और सगुण स्वरूप पर विचार करते हुए आगे यह भी पूछा जा सकता है कि यह ईश्वर का यह साक्षात्कार सगुण रूप का है अथवा निर्गुण का ? इस संबंध में मुझे वर्तमान समय के विद्वत् वरेण्य संत श्री राजेंद्रदास देवाचार्य का निम्न कथन स्मरण आता है -

‘मध्यकाल के भक्त कवियों को हिन्दी साहित्य समीक्षकों ने निर्गुण और सगुण भक्ति में बांटकर भारतीय मेधा की अभेद- अखंड-धारा को ही विभक्त कर दिया है । वास्तव में  हमारी ज्ञान परंपरा में निर्गुण का आशय गुणत्रय -सत, रज और तम के परे होने वाले ईश्वर से है । इसी तरह सगुण “असंख्येय गुण-गण-कल्याण- निलय निखिल हेय प्रत्यनीक” भगवान है । इस प्रकार कबीर, सूर, तुलसी, मलूकदास, रविदास आदि कवियों के इष्ट राम-कृष्ण सगुण और निर्गुण दोनों है ।‘

विश्व ज्ञान की अखंड परंपरा के आदि श्रोत ऋग्वेद से ही प्रकट ईश्वर की शोध में आर्तता, जिज्ञासा, अर्थार्थ और ज्ञान पिपासा चार कारण प्रकट रहे  हैं ।  गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को इसे इस प्रकार व्यक्त करते हैं -

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन । आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥

 

हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! उत्तम कर्म करनेवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी - ऐसे चार प्रकारके भक्तजन मुझको भजते हैं ॥७/ १६ ॥

 

। तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मे प्रियः ॥

 

उनमें नित्य मुझमें एकीभावसे स्थित अनन्य प्रेमभक्तिवाला ज्ञानी भक्त अति उत्तम है, क्योंकि मुझको तत्त्वसे जाननेवाले ज्ञानीको मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह ज्ञानी मुझे अत्यन्त प्रिय है ॥७/ १७ ॥

इस प्रकार भारत में भगवान की प्राप्ति में भक्ति और ज्ञान का जहां अद्भुत समन्वय हुआ है वहीं इन धाराओं का वैश्विक परिप्रेक्ष्य में गहन शोध और विवेचन भी हुआ है । यहाँ  भगवान को भक्त उसके प्रति समर्पण से अधिक प्राणी मात्र में भगवत्ता के साक्षात्कार के कारण उसे पहचानता है । अत: वेद जिसे ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ (छान्दोग्य उपनिषद्- ३/१४) कहते हैं उसे ही गोस्वामी तुलसीदास भगवान राम से हनुमान जी को जीवन आदर्श के रूप में इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं –

       सो अनन्य जाकें असि मति न टरइ हनुमंत

      मैं सेवक सचराचर रूप स्वामि भगवंत । किष्किन्धाकाण्ड-३   

 

प्रभुदयाल मिश्र

प्रधान संपादक

 

 

निर्वचन नवंवर २०२५   

                         गाँधीत्वः एक सहयात्रा

महात्मा गांधी की भाव भूमिका में ईशावास्य उपनिषद का यह मंत्र सर्वथा स्मरण योग्य है-

ॐ ईशा वास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।

तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा मा गृधः कस्यस्विद्धनम्॥

-यह समस्त जगत अपनी गतिशीलता पूर्वक ईश्वर परिव्याप्त है। इसलिए, त्याग की भावना से इसका उपभोग किया जाना योग्य है। किसी वस्तु का लोभ मत करो, क्योंकि यह समस्त संपदा ईश्वर की ही है।

जेल में विनोवा भावे के साथ रहते हुए महात्मा गाँधी जी ने उनसे ईशावास्य उपनिषद समझा था और इसके ट्रस्टीशिप के बोध को प्रसिद्ध अमरीकी विचारक थोरो के विचार के परिष्करण पूर्वक उन्होंने अपने राष्ट्र दर्शन की आधार भूमिका प्रदान की थी ।  

जिस प्रकार बाली ने श्री राम द्वारा उसे अमरत्व प्रदान करने के आश्वासन के बाद भी अपने अंतकाल में राम का  स्मरण ही वरेण्य पाया,  बापू के इसी भाव की पृष्ठभूमि में उनकी परम गति का दुर्लभ दृष्टांत हमारे सामने आज भी प्रत्यक्ष ही है । इसके पूर्वाभास संबंधी उन्होंने कल्याण,गीता प्रेस गोरखपुर के तत्कालीन संपादक हनुमान प्रसाद पोद्दार को इसके पूर्व लिखे अपने पत्र में लिखा था- कि राम नाम तो मेरी नित्य, निरंतर खुराक है । अत: मृत्यु के भय से मेरे राम नाम के जप का परामर्श प्रासांगिक नहीं रह जाता ।‘   

गीता में भी ८ वें अध्याय के श्लोक ५ में भगवान कृष्ण कहते हैं - 

अन्तकाले च मामेव स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम्

यः प्रयाति स मद्भावं याति नास्त्यत्र संशयः ।

-जो पुरुष अन्तकालमें मुझको ही स्मरण करता हुआ शरीरको त्याग कर जाता है, वह मेरे ही भाव को  प्राप्त होता है- इसमें कुछ भी संशय नहीं है ।

बापू की राम नाम निष्ठा का एक और प्रसंग बहुधा स्मरण में आता है । मैथिली शरण जी गुप्त के ‘उर्मिला’ महाकाव्य की पृष्ठभूमि में किसी समालोचक के ‘कवियों की उर्मिला विषयक उदासीनता’ का प्रायः उल्लेख किया जाता है । इसी भाव भूमिका में जब ‘राष्ट्र कवि’ ने उर्मिला पुस्तक गांधी जी को भेज कर उनकी टिप्पणी चाही तो उन्होंने इस महाकाव्य की तुलसी की रामायण से तुलना के प्रस्ताव को ही जैसे खारिज कर दिया ।

महात्मा गांधी की आलोचना की यत्र तत्र अनेक भूमिकाएँ बनती और बिगड़ती रही हैं । इतिहास को खोद कुरेद कर कालांतर की घटनाओं से गांधी जी की अतिआग्रहशीलता और उनकी एकोन्मुखता की आलोचना की जाती है । यह पूछा जाता है कि वे अपने स्वयं के विश्वास, निष्ठा और प्रतीति को परिवार, समाज, देश और मानव मात्र पर कैसे आरोपित कर सकते थे ? यदि हम इसे गांधी जी की संनिष्ठा या सत्य-निष्ठा कहते हैं तो इसे काल सापेक्ष मान कर जैसे एक भूल ही करते हैं । इतिहास और काल एक तात्कालिक सत्य की गवाही देता है, वह जैसे निर्णयकर्ता नहीं है । व्यक्ति, इतिहास और समय सापेक्ष सत्य शाश्वत फिर भी नहीं हैं । एक  संघर्षशील महापुरुष मूल्यों के लिए स्वयं को प्रायः दांव पर लगाता चलता है । कभी-कभी तो वह ऐसा करते हुए इस परीक्षा से भी चूक जाता है कि ये मूल्य कितने निरपेक्ष और टिकाऊ हैं । हमारे देश में अनादि काल से ही शास्त्रार्थ की परंपरा है। पराजित शास्त्रज्ञ विजेता के शिष्यत्व को भी प्रस्तुत हो जाता है । इसमें महत्वपूर्ण बात शास्त्र, वेद के प्राधान्य की रहती है । इसका परिणाम इसलिए उचित कहा जा सकता है क्योंकि इससे व्यक्ति के स्थान पर संस्था, शास्त्र (वर्तमान संदर्भ में इसे हम संविधान कह् सकते हैं) की प्राथमिकता प्रकट होती है । इस विचार प्रक्रिया का उपसंहार महाभारत के इस श्लोक से करना उचित प्रतीत होता है -

  कालो ह्ययं निरवधिर्विपुला च पृथिवी।

 भुवि धर्मश्च धर्मज्ञ तस्मान्नात्यन्तमाचरेत्॥

अर्थात् हे धर्मज्ञ (युधिष्ठिर)! यह काल असीम है और पृथ्वी अपार है। धरती पर धर्म भी विद्यमान है। इसलिए मनुष्य को किसी भी बात में अति, अतिरेक और आग्रहशीलता से नहीं चलना चाहिए।

 प्रभुदयाल मिश्र

प्रधान संपादक        

 

निर्वचन दिसंवर 2025

     अद्वैत और प्रत्यभिज्ञा दर्शन काअभिनवशैव-संगम

श्रुति के स्मृति संप्रस्थान में पञ्च देवगणेश, सूर्य, शिव, पार्वती और विष्णु भारतीय उपासना के आधारभूत देवता हैं जो लोक और परलोक की सिद्धि में सहायक हैं । इस लोक मूलक उपासना के समानांतर ही उपनिषदों से आरंभ तत्त्व ज्ञान सृष्टि और स्रष्टा के गहन और सूक्ष्मतर स्तरों की पड़ताल हुई है । भगवान वादरायण, गौड़पाद, गोविंदपाद आदि की भूमिका में आचार्य शंकर ने ब्रह्मसूत्र, भगवद्गीता और ईशादि प्रमुख एकादश उपनिषदों के भाष्य द्वारा षड्दर्शन के योग, सांख्य, पूर्व मीमांषा, न्याय और वैशेषिक के परे वेदांत को ज्ञान की परमोत्कृष्टता में प्रतिष्ठित किया

"ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या" निरालम्बोपनिषद् (श्लोक 35) पर आधारित आदिशंकर केब्रह्मज्ञानवलीमालाके निम्न श्लोक का प्राय: उनके ही उद्घोष के रूप में सर्वत्र स्मरण किया जाता है

ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव नापरः।

अनेन वेद्यं सच्छास्त्रमिति वेदान्तडिण्डिमः ॥ २०॥

भारतीय ज्ञान धारणा की इसव्यतिरेकअनुसंधान प्रक्रिया में छान्दोग्य उपनिषद की भीअन्वयउद्घोषणा - "सर्वं खल्विदं ब्रह्म":(छान्दोग्य उपनिषद् 3.14.1) को विस्मृत नहीं किया जा सकता जो अंतत: एक दूसरे के पूरक ही हैं । भगवान् वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत के प्रथम श्लोक के प्रथम पद मेंपरम सत्यके अन्वीक्षण में इसीलिए कहा है- यतोsन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञ: स्वराट्। अर्थात् जो अन्वय के इतर (व्यतिरेक) आदि प्रक्रिया के भी परे स्वप्रकाश में संपूर्ण परमब्रह्म है !

आदिशंकर की स्मार्त पञ्चदेवोपासना में समयाचार शैव पक्ष प्रत्यभिज्ञा दर्शन के सर्वदा सन्निकट है । अपने प्रसिद्ध दक्षिणामूर्ति स्तोत्र में वे गुरु द्वारा शिष्य को परम शिवत्व के प्रत्यभिज्ञान की क्षमता प्रदान कराते हुए कहते हैं –

राहुग्रस्तदिवाकरेन्दुसदृशो मायासमाच्छादनात्।

सन्मात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत्सुषुप्तः पुमान् ॥

प्रागस्वाप्समिति प्रबोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते।

तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये ॥ ६

अर्थात् जो (परमात्मा), माया के आवरण से ढंका होने के कारण राहु ग्रस्त सूर्य और चन्द्रमा के समान आवृत हो जाता है, और इन्द्रियों तथा वृत्तियों के लीन हो जाने से सुषुप्ति में केवल 'सन्मात्र' (सत्-रूप) पुरुष बनकर रहता है, तथा जो जागने के समय 'मैं सोया था' इस प्रकार 'प्रत्यभिज्ञायते' (पहचाना जाता है), उन श्रीगुरुमूर्ति दक्षिणामूर्ति को यह मेरा नमस्कार है।

कश्मीरी शैव दर्शन के ही अनुरूप वे शिव और शक्ति की परमेश्वरता में अपनी सौन्दर्यलहरी में तंत्र और सौन्दर्य की अभिव्यंजना का अदभुद रसायन इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं –

गतास्ते मञ्चत्वं दुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः शिवःस्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः ।

त्वदीयानांभासां प्रतिफलनरागारुणतया शरीरी श्रृंगारो रस इव दृशां दोग्धि कुतुकम् ॥ ९२ ॥

-है मंच तुम्हारा ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर

निर्मल-आभा शंकर हैं इसके माया-पट

तेरी अरुणिम-द्युति से प्रतिबिम्बित होकर ज्यों

दृग मूतिमंत रसपति का कौतुक करते। (काव्यानुवाद)

अनंतर अभिनवगुप्त का अभिदान भारतीय चिंतनधारा का वह सेतु है जो तंत्र और वेदांत, सौंदर्य और साधना, तर्क और अनुभूति को जोड़ता है वे उस परंपरा के प्रतिनिधि हैं जिसमें ज्ञान केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि आत्मानुभूति है।

काव्यशास्त्र को हुए अभिनवगुप्त के अवदान के संदर्भ में भी यहाँ इतना कथन योग्य है कि उन्होंने अपने लगभग एक सदी पूर्व के काव्य शास्त्र के आचार्य आनंद वर्धन के ध्वन्यालोक पर ध्वन्यालोचन टीका में पूर्वाचार्य के सिद्धांतों की व्याख्या और विस्तार का कार्य किया अभिनवगुप्त ने ध्वनि सिद्धांत को रसानुभूति से जोड़ा जिसके अनुसार काव्य का चरम लक्ष्य रसास्वादन है। उन्होंने ध्वनि के 44 भेदों की भी चर्चा की, जो आनन्दवर्धन की अपेक्षा अधिक विश्लेषणात्मक है। इस प्रकार ध्वन्यालोक पर अभिनवगुप्त की लोचन-टीका केवल आनन्दवर्धन के अभिव्यंजनावाद को दार्शनिक गहराई प्रदान करती है, अपितु रस-सिद्धान्त को प्रत्यभिज्ञा के आलोक में प्रतिष्ठित करती है। यह टीका काव्य के रहस्य को केवल व्याख्यायित नहीं करती, अपितु साधक को रसास्वादन के माध्यम से आत्मानुभूति की ओर उन्मुख करती है।

भारतीय सनातन प्रज्ञा के प्रतिनिधि आचार्य महामाहेश्वर अभिनव गुप्त के ध्वन्यालोचन को विगत वर्ष ही विश्व धरोहर में स्थान प्रदान किया गया है।  यह भारत की उद्भट ज्ञान परंपरा की सार्वलौकिक स्वीकृति का ही प्रमाण है ।

प्रभुदयाल मिश्र, प्रधान संपादक