Thursday, 14 January 2021

निर्वचन -दिसंबर मानस भारती

 निर्वचन  


                       भव भेज रघुनाथ जस 


भूमण्डलीय महाआपदा कोरोना ने दुनियाँ को अब तक के विदित इतिहास में जैसे नए काया कल्प के लिये बिबश कर छोड़ दिया है । अभी जो नित नवीन और परस्पर प्रतिस्पर्धी व्याधि निरोधक वैक्सीन आ रही हैं उनका असर तो देखना शेष है, किन्तु अब तक के अनुभव ने इतना तो सिखाया ही है कि रोग प्रतिरोधक भारतीय पद्धति और आस्था-विश्वास ने भी जन जीवन को ऊर्जा प्रदान की है । भारतीय चिन्तन में व्याधि के मूल में शरीर (दैहिक) ही कारण न होकर आधिभौतिक और आधिदैविक कारण भी रहते हैं । इस तरह यह समझना किसी के लिये भी कठिन नहीं होगा कि मात्र दवा से और वह भी इतने व्यापक फलक पर, बिना अधिभूत और अधिदैव  के सँवार के संभव नहीं है ।  विश्व और मानव सभ्यता का इतिहास इस प्रकार के अनुभव और प्रमाणों से भरा पड़ा है । 

भारतीय अध्यात्म चेतना की सांस्कृतिक संवाहिका 'तुलसी मानस भारती' ने तुलसी के मानस के दोहे के के पूर्व के चतुरार्ध 'भव भेषज रघुनाथ जस' को इसीलिए इस वार्षिकांक का शीर्ष रखा है । हमें प्रसन्नता है कि राष्ट्रीय ख्याति के शीर्ष चिन्तक, साहित्यकार और आस्थावान् मनीषियों ने इस अनुष्ठान में अपनी मूल्यवान आहुतियाँ पदान कीं । 

इस विशेषांक  के उत्तर ‘महाभाग’ में हम हमारे सम्मान्य हिन्दी साहित्य के सुमेरु डा. देवेंद्र दीपक के सद्य: इंद्रापब्लिशिंग हाउस, भोपाल से प्रकाश्य काव्य नाटक ‘सुषेण-पर्व’ को अविकल प्रकाशित कर रहे हैं । दीपक जी के इस महनीय अनुष्ठान की सार्थक सिद्धि में यहाँ इस नाटक की भूमिका का निम्न महत्वपूर्ण भाग मैं साभार उद्धृत रहा हूँ -  

“सुषेण-पर्व’ स्थापना में नट-नटी के संवाद से प्रारम्भ होता है।

‘स्थापना’ में द्वन्द्व के अनेक आयाम सूत्र रूप में दर्शकों के सामने आते हैं।

साथ ही द्वन्द्व से मुक्त होने की स्थिति में पुरुषार्थ और एतद् द्वारा परमार्थ

संभव है।

प्रथम दृश्य में नागरिकों की युद्ध चर्चा है। यह चर्चा कुछ लम्बी हो गयी है,

लेकिन यह चर्चा युद्ध और उसके कारणों तथा परिणामों को संप्रत्यक्ष करती है।

युद्ध कहीं भी हो, कभी भी हो, अन्ततः उसका दुष्परिणाम नारी को ही भोगना

पड़ता है। नागरिकों में यह चर्चा लक्ष्मण मूच्र्छा की संभावना की ओर भी परोक्ष

संकेत करती है।

दूसरा दृश्य छोटा है- इसमें लक्ष्मण मूच्र्छा में हैं। शक्ति लग चुकी है।

मेघनाद लक्ष्मण को मृत समझ उसे उठाने को कहते हैं। उसके सैनिक लक्ष्मण

को उठा नहीं पाते। मेघनाद भी लक्ष्मण को उठाने का प्रयत्न करता है, लेकिन

उठा नहीं पाता। हनुमान मेघनाद पर व्यंग्य करते हैं और मुच्र्छित लक्ष्मण को

उठाकर ले जाते हैं।

दूसरे दृश्य में तीसरे दृश्य के लिए एक संकेत भी है। हर सेना का अपना

एक चिकित्सा विभाग होता है, जो घायल सैनिकों के स्वास्थ्य और चिकित्सा

सेवा का कार्य करता है। उसका एक प्रमुख होता है जो स्वयं चिकित्सक भी

होता है। राम की सेना में भी एक चिकित्सा प्रमुख है। एक स्वाभाविक प्रक्रिया

के अंतर्गत मूर्छित लक्ष्मण का पहला परीक्षण चिकित्सा प्रमुख करता है और

अपनी असमर्थता प्रकट करने पर ही सुषेण को लाने का प्रस्ताव सामने आता

है। इसी दृश्य में राम का संक्षिप्त विषाद भी है। जामवंत द्वारा सुषेण को लाने

का प्रस्ताव और इसके लिए हनुमान जी का प्रस्थान!

चौथा दृश्य महत्वपूर्ण है। इसमें सूर्या और सुषेण के संवाद महत्वपूर्ण है और 

प्रारम्भ में दी गयी स्थापना को चरितार्थ करते हैं। द्वन्द्व और उसका निरसन इस

दृश्य का मुख्य बिंदु है। सूर्या एक विदुषी और सुधर्मा पत्नी है। सूर्या के चरित्र

के अभाव में यह नाटक खड़ा ही नहीं रह पाता।

पाँचवा दृश्य राम के विषाद से प्रारम्भ होता है। जामवंत का प्रबोधन- ‘डोर

अभी टूटी नहीं है सांकेतिक है।’ विभीषण इस तथ्य का उद्घाटन करते हैं कि

लक्ष्मण मूर्छा का कारण वह स्वयं हैं। शक्ति मुझे लक्षित थी, लक्ष्मण मेरे रक्षार्थ

बीच में आ गए। सुषेण का आगमन। लक्ष्मण का परीक्षण और मृत संजीवनी

बूटी का प्रस्ताव। सुषेण, हनुमान को अलग ले जाकर बूटी आदि की जानकारी

देते हैं। यह एक चिकित्सीय व्यवहार का एक पक्ष है कि वह अपना ‘फार्मूला’

गुप्त रखता है। कुछ नयी बातें भी जोड़ी हैं- वनदेवी की वंदना, औषधि लाने में

सावधानी और समय का प्रतिबंध- खेती को पानी/ और रोगी को औषधि/

समय पर मिले तो लाभ।

छठा दृश्य कथा-कथन है। इस दृश्य में नट-नटी के माध्यम से रावण

कालनेमि सम्पर्क, कालनेमि का मायावी छल, हनुमान का मगरी का हनन,

कपटमुनि का वध, भरत द्वारा हनुमान का आहत होना, हनुमान का लक्ष्मण

मूर्छा की बात बताना। इसमें कौशल्या और सुमित्रा के दो संवाद प्रमुख हैं।

ये संदर्भ मुझे सूरदास जी से मिले। इस दृश्य का विधान मुझे ‘टाईम गैप’

के लिए करना पड़ा। एक दृश्य में मूर्छा और उसके तुरंत बाद हनुमान जी

का संजीवनी के साथ उपस्थित होना, दर्शकों के लिए कुछ अटपटा होता। इस

कथा-कथन में पूरी कथा भी आ गई और दर्शकों को कुछ समय भी मिल

गया। इस कथा-कथन में वनदेवी की स्तुति में श्लोक और वनदेवी द्वारा बूटी

लेने की अनुमति में कुछ प्रतिबंधों की चर्चा है। इसमें एक विशेष बात यह है

कि इस औषधि का व्यावसायिक लाभ के लिए उपयोग नहीं होगा। वापस इन्हें

यहीं पुनःस्थापित करना होगा। रात्रि में वनस्पति न तोड़ने की बात भी वनदेवी

उठातीं हैं, लेकिन हनुमान आपातकाल में मर्यादा को शिथिल करने का औचित्य

भी सामने रखते है।

सातवाँ दृश्य थोड़ा लम्बा है- इसमें चार चरण समाहित हैं- हनुमान के आने

से पूर्व राम का प्रलाप और प्रबोधन; सुषेण द्वारा चिकित्सा; लक्ष्मण की चेतना 

के बाद सुषेण के प्रति कृतज्ञता ज्ञापन; सारी औपचारिकताएँ पूरी करते-करते

सूर्योदय हो गया। सूर्योदय होते ही उल्लासमय वातावरण में जय जयकार! यह

एक प्रकार का रंगोत्सव ही है। अबीर-गुलाल लगाते पात्र! राम, लक्ष्मण, सुषेण,

हनुमान, संजीवनी, गिरिखण्ड, धरतीमाता का मुखर जय-जयकार!

राम के प्रलाप के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण समस्या यह भी है कि राम को

सांत्वना कौन दे? केवल जामवंत में ही पात्रता है। वह यथा सम्भव समय पर

सांत्वना देते भी हैं, लेकिन राम का प्रलाप बड़ा सघन है। मैंने इस अवसर के

लिए दो उद्भावनाएँ की- दशरथ की आत्मा का आकाशवाणी के रूप में राम का

प्रबोधन और सूर्योदय में विलम्ब हो, इसके लिए सूर्यदेवता से अनुरोध! इस प्रसंग

में सूर्य अपनी विवशता प्रकट करते हैं।

सुषेण ने मूर्छित लक्ष्मण के परीक्षण के उपरांत कहा था- साधन और

आराधन दोनों साथ। आराधन के रूप में मैंने महामृत्युंजय मंत्र का निरंतर

जप प्रस्तावित किया। घोर अनिष्ट और मृत्यु-भय के क्षणों में महामृत्युंजय मंत्र

भारतीय मानस के लिए एक तारक मंत्र है। इससे वातावरण में एक सघन

गम्भीरता आएगी। कुछ लोग इस पर आपत्ति उठा सकते हैं- आराधन क्यों?

आप किसी भी अस्पताल में जाएँ। आपको एक उपासना एक स्थल मिलेगा।

आपरेशन थियेटर पर आपको लिखा मिलेगा- वी ट्रीट, ही क्योर्स। डाक्टर

कहता है- हम तो केवल चिकित्सा करते हैं, ठीक तो ईश्वर करता है।

औषधियों के प्रति पूजा-भाव हमारी चिंतन शैली में अंगभूत है। वैदिक

साहित्य में औषधि का मातृरूपेण कहा है। सुषेण पूरे विधि-विधान से चिकित्सा

करते हैं। चिकित्सा प्रारंभ करने से पहले एक मंत्र का सस्वर पाठ करते हैं।

यह मंत्र अष्टांग संग्रह (वाग्भट्ट) का 15वां श्लोक है।

लक्ष्मण के सचेत होने पर सब प्रसन्न होते हैं। राम लक्ष्मण से सुषेण का

परिचय कराते हैं। लक्ष्मण सुषेण के प्रति अभार प्रकट करते हैं। राम सुषेण को

वैद्य राज की उपाधि देते हैं और एक वैद्य की मर्यादाओं की ओर संकेत करते

हैं। भले ही ये वैद्य को सम्बोधित हो, अपितु चिकित्सा-सेवा में लगे पूरे समुदाय

के लिए ये मर्यादाएँ साध्य हैं। ये वैश्विक मर्यादाएँ हैं। राम जी कहते हैं-

सुषेण,

पहले तुम राजवैद्य थे

अब तुम वैद्यराज हो!

सुषेण!

चिकित्सा-सेवा से

रोगी के चेहरे पर लौटी मुस्कान

वैद्य का सौन्दर्यशास्त्र है!

निर्लोभ

निर्भय

निस्संग होना

वैद्य का धर्मशास्त्र है!

भेद मुक्त हो

पूरे विश्व का आरोग्य

वैद्य का समाजशास्त्र है!

सुषेण रामजी से हाथ में ‘जश’ का वरदान माँगते हैं। राम जी उसे अभीष्ट

वरदान देते हैं।

अंतिम चरण जय जयकार का है। सुषेण की जय जयकार में सुधर्मा सूर्या

की जय का भी उल्लेख है। द्रोण पर्वत की जय में औषधियों के भौन (भवन)

की चर्चा है। और संजीवनी की जय में कथित जय है- संजीवनी ने किया

कमाल/ आयुर्वेद का उन्नत भाल। इसी प्रकार धरती माता की जय में एक

कथित जय है- जय भारतीय उपचार की/ जड़ी-बूटी व्यवहार की।

सुषेण-पर्व का एक पक्ष आयुर्वेद की महत्ता भी है।

राम जी के चरित्र में देव-भाव और मानव-भाव दोनों अनुस्यूत !”

आशा है, जिस तरह ‘महाभारत’ के अंत में ‘शांति पर्व’ महाभारत को सर्व ज्ञान की मंजूषा बनाता है, इस विशेषांक का ‘सुषेण पर्व’ वर्तमान वैश्विक महाव्याधि के निदान में हमारा आधिदैविक समाधान सिद्ध होगा । 

                                                 प्रभुदयाल मिश्र 

                                                 प्रधान सपादक      


राम राज्य का वैश्विक परिप्रेक्ष्य

  वैश्विक रामराज्य  

-प्रभुदयाल मिश्र

  ‘राम राज्य के वैश्विक परिवेश’ पर यद्यपि वाल्मीकि की रामायण और तुलसी का रामचरित मानस तो पूर्ण प्रासांगिक हैं ही, हमें वेद, स्मृति ग्रंथ, इतिहास और इस दिशा में अनेक महापुरुषों के योग का भी स्मरण किए जाने की आवश्यकता है । 

सर्वप्रथम तो यजुर्वेद अध्याय 22 के सूक्त 22 का यह मंत्र ही स्मरणीय है जिसमें आदर्श (राम) राज्य की कामना करते हुये प्रजापति ने इसके समाज के सभी वर्गों, उद्योग, आजीविका और सुरक्षा के साधनों तथा प्रकृति के परिपूर्ण सहयोग की कामना की गई है -  

ॐ आ ब्रह्मन् ब्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायताम् ।

अस्मिन राष्ट्रे राजन्य: इषव्य: शूरो महारथो जायताम् ।

दोग्ध्री धेनु: वोढा ऽनडवान् आशु: सप्ति:

पुरन्ध्रि: योषा जिष्णू रथेष्ठा:

सभेयो युवास्य यजमानस्य वीरो जायताम् ।

निकामे निकामे न: पर्जन्यो वर्षतु

फलवत्यो न ओषधय: पच्यन्तां

योगक्षेमो न: कल्पताम् ।।

(यजुर्वेद, अध्याय २२, मंत्र २२, ऋषि- प्रजापति:)

यहाँ सबसे पहले इस प्रश्न का समाधान जैसे बहुत आवश्यक है कि क्या भारत में पूर्व में कभी राम-राज्य स्थापित और प्रवर्तित हुआ ? निश्चित ही इसका समाधान जहां आवश्यक है वहीं उसकी उपलब्धि भी उतनी ही सुलभ है । हम जानते हैं कि ब्रह्मा ने अपने पुत्र स्वयाम्भव मनु को सृष्टि विस्तार का कार्य सौंपा था । हमारे शास्त्र यह भी बताते हैं कि मनु ने राज्य का वैदिक विधि पूर्वक संचालन करते हुये भावी पीढ़ियों के लिए आदर्श राज्य के संचालन के लिए एक संविधान को ‘स्मृति’ के तौर पर तैयार किया था । यहाँ इतना स्मरण रख लेने की और आवश्यकता है कि शाश्वत- सनातन धर्म के मूल वेद संसार, समाज और जीवन व्यवस्था की आधार हैं तथा भारतीय दर्शन की अवधारणा में ईश्वर का अवतार इसी धर्म की निरंतरता को कायम रखने के लिए होता है । भगवान के पूर्ण अवतार श्री राम और कृष्ण त्रेता और कलियुग में प्रत्यक्षता यही कार्य करते हैं जो कि पूर्व में अंशत: नाना अवतारों में वे इसे तात्कालिकता के अनुरूप सम्पन्न कर चुके थे । वे न तो स्वयं कोई धर्म स्थापित करते हैं न ही विधि की परिपाटी शुरू करते हैं क्योंकि जिस प्रकार एक जीवधारी की श्वास के रूप में वह अस्तित्व में आता है ठीक उसी तरह वेद ब्रह्म की श्वास के रूप में ही सृष्टि विकास की क्रिया का प्रथम उन्मीलन हैं – 

यस्य निश्वस्तं वेदो              

    यही मनु जब अपनी चतुर्थावस्था में घोर तप कर भगवान से वरदान मांगते हैं तो उनका अनुरोध यह था – 

‘चाहंहु तुमहि समान सुत, प्रभु सन कबन दुराव’ (रामचरित मानस)

यह आश्चर्य ही है कि इतने कठिन तप के बाद मनु ने इतना सामान्य और लौकिक वरदान ही क्यों मांगा ? इस सम्बन्ध में कुछ विचारकों का मत है कि मनु यह चाहते थे कि उनके बनाए विधान के अनुसार धरती पर आदर्श राज्य केवल भगवान ही कायम कर सकते हैं । इसका प्रमाण हमारे सामने है । भगवान राम ने ग्यारह हजार वर्ष तक धरती में राम राज्य कायम रखा । इसकी उपलब्धियों का बहुत सुंदर वर्णन गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरित मानस के उत्तरकाण्ड के दोहा क्रमांक 19/4 से आरंभ –‘रामराज्य बैठे त्रैलोका’ से आरंभ कर दोहा क्रमांक 31 तक आधिदैविक, आधिभौतिक और आध्यात्मिक प्रगति का दिग्दर्शन कराते हुये यह स्पष्ट किया है कि यह ‘धरती पर स्वर्ग उतारने’ के कथन की सिद्धि थी । रामराज्य का वर्णन करते हुये तुलसीदास जी ने लिखा है – ‘बयरु न कर काहू सन कोई’ । अर्थात राम के राज्य में जीव मात्र में सद्भाव काम करता है । यहाँ तक कि 

खग मृग सहज बयरु बिसराई । सबन्हि परस्पर प्रीति बधाई ।

और 

कूजहि खग मृग नाना वृंदा । अभय चरहि बन करहि अनंदा ।         

यह व्यवस्था पूर्ण जनतान्त्रिक थी । श्री राम द्वारा बुलाई गई उस सामान्य सभा की घोषणा से स्पष्ट हो जाता है जिसका वर्णन उत्तरकाण्ड में दोहा क्रमांक 42 से 47 तक वर्णित है । यहाँ राम ने अपने आपको जैसे अपनी प्रजा के नियंत्रण में छोडते हुये यहाँ तक कह दिया है –

जो अनीति कछु भाखों भाई । तौ मोहि बरजऊ भय बिसराई । उत्तरकाण्ड 42/3 

निश्चित ही रामराज्य की इस परिकल्पना का मूल भारतीय शास्त्र और संहिताओं में विद्यमान है। तुलसी ने जैसे इस सब का समाहार करते हुये ही दोहावली में लिखा –

तुलसी प्रजा सुभाग ते भूप भानु सो होय 

बरसत हरषत लोग सब करखत लखै न कोय । 

अर्थात एक राजा प्रजा से उसी प्रकार ‘कर’ ग्रहण करता है जैसे सूर्य जल का बिना देखे आकर्षण करता है किन्तु लोगों को प्रसन्न करते हुये उसकी परिपूर्ण वर्षा कर देता है । अयोध्याकाण्ड में भरत के लिए राम स्वयं राजा और प्रजा के अन्तःसम्बन्धों की जैविक अविभाज्यता का यही आदर्श प्रस्तुत करते हैं – 

मुखिया मुख सो चाहिए खान पान कंहु एक 

पाले पोसे सकल अंग तुलसी सहित विवेक । अयोध्या- 315 

यहाँ तक कि स्वामी और सेवकों के संबंध का पैमाना भी लगभग इसी समता मूलक समाज का परिचायक है – 

सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिब होइ 

तुलसी प्रीति की रीति सुन सुकवि सराहहिं सोइ । अयोध्या 306 

वाल्मीकि रामायण के अनुसार राम धर्मज्ञ, सत्यनिष्ठ और ‘प्रजानां हिते रत:’ राजा हैं । भरत के चित्रकूट पहुँचते ही विक्षिप्तप्राय भरत को राम राजा के कर्तव्य बोध का बहुत विस्तृत पाठ अपनी प्रश्नाकुलता में अयोध्याकाण्ड के स्कन्ध 100 के 76 श्लोकों में सहसा समझा जाते हैं । इस शिक्षा में राजनीति, कूटनीति, व्यवहार और प्रशासन के अनेक सूत्र विद्यमान हैं । श्लोक 61 में राम के आदर्श में एक राजा को गुरु, वृद्ध, तपस्वी, देवता और अतिथियों की श्रेणी में मार्ग के वृक्ष को भी नमस्कार करना अभीष्ट है !    

कच्चिद्गुरूंश्च वृद्धान्श्च तापसान्देवतातिथीन्

चैत्यांश्च च सर्वांसिद्धार्थान्ब्राहम्णांश्च नमस्यसि । 

किन्तु राम के पूर्व भी क्या कोई उनके आदर्श राज्य का ‘आदर्श’ है ? इस संबंध में हम भारतीय परंपरा में निम्नलिखित 12 राजाओं का परिगणन सर्वथा उचित मानते हैं –

1.महाराज भरत – श्रीमद्भागवत के पंचम स्कन्ध के विवरण के अनुसार मनु के पुत्र प्रियव्रत, प्रियव्रत के पुत्र अग्नीध, अग्नीध के नाभि, नाभि के ऋषभदेव और ऋषभदेव के पुत्र भरत थे । भागवत स्कन्ध 5 अध्याय 7 के विवरण के अनुसार भरत ने गृहत्याग पूर्व 1 करोड़ वर्ष तक धर्म पूर्वक राज्य किया । इनके पूर्व भारत का नाम अजनाभ था जिसे कालांतर में ‘भारत वर्ष’ के रूप में अभिहित किया गया । (भागवत 5/7/3, विष्णुपुराण 2/1/28, वायु पुराण 33/52, ब्रह्मांड पुराण 2/14/62, अग्निपुराण 107/11-12, मार्कन्डेय पुराण 53/59-42, नरसिंह पुराण 30/7, कूर्म पुराण ब्राह्मी संहिता पूर्व. 40/41) जहां तक कि दुष्यंत पुत्र भरत का प्रसंग है तो यह उल्लेखनीय है कि भरत ‘भरत वंश’ के प्रवर्तक थे, भारत वर्ष के नहीं ।    

2.वैवस्वत मनु 

मानव जाति के प्रणेता व प्रथम पुरुष स्वायंभुव मनु के बाद ये सातवें मनु थे। प्रत्येक मन्वंतर में एक प्रथम पुरुष होता है, जिसे मनु कहते हैं। वर्तमान काल में ववस्वत मन्वन्तर चल रहा है, जिसके प्रथम पुरुष वैवस्वत मनु थे, जिनके नाम पर ही मन्वन्तर का वर्तमान नाम है। भगवान सूर्य का विवाह विश्वकर्मा की पुत्री संज्ञा से हुआ। विवाह के बाद संज्ञा ने वैवस्वत और यम नामक दो पुत्रों और यमुना नामक एक पुत्री को जन्म दिया। यही विवस्वान यानि सूर्य के पुत्र वैवस्वत मनु कहलाये।

वैवस्वत मनु के नेतृत्व में त्रिविष्टप अर्थात तिब्बत या देवलोक से प्रथम पीढ़ी के मानवों (देवों) का मेरु प्रदेश में अवतरण हुआ। वे देव स्वर्ग से अथवा अम्बर (आकाश) से पवित्र वेद भी साथ लाए थे। इसी से श्रुति और स्मृति की परम्परा चलती रही। वैवस्वत मनु के समय ही भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार हुआ जिनकी सहायता से मनु ने महा प्रलयकाल में सभी संग्रहणीय सामग्री सहित मानवता की रक्षा की ।  

3.हरिश्चंद्र – सूर्य वंश में सत्यव्रत के पुत्र हरिश्चंद्र की कथा सर्वविदित है उन्होने सत्य की रक्षा में अपनी पत्नी, एकमात्र पुत्र और स्वयं को भी बेच दिया था । 

4.सुदास –  इनका उल्लेख ऋग्वेद में मिलता है। वे संवरण के विरुद्ध हुये दशराज्ञ युद्ध के विजेता थे जिसका वर्णन ऋग्वेद ७:१८, ७:३३ और ७:८३:४-८ में है। उनका जीवनकाल अलग-अलग स्रोतों में १७०० ईसापूर्व से लेकर ११०० ईसापूर्व के बीच अनुमानित किया जाता है।

5.भगवान राम -पुराणों में यह घोषणा स्पष्ट रूप से इस प्रकार मिलती है _

वेद वेद्ये परे पुंसि जाते दशरथात्मजे 

वेद: प्राचेतसादासीत् साक्षाद्रामायाणात्मना | (लावकुशप्रोक्त मंगलाचरण १३)

अर्थात वेद वेद्य परमात्मा जब दशरथनंदन के रूप में प्रकट हुए तब साक्षात वेद भी रामायण के रूप में महर्षि प्राचेतस (वाल्मीकि) के मुख से अवतीर्ण हुए |  

वाल्मीकि रामायण में ही यह स्पष्ट उल्लेख है कि महर्षि वाल्मीकि ने लव और कुश को वेद का अध्ययन कराकर वेदार्थ के उपबृह्मण के लिए ही रामायण ग्रन्थ उन्हें पढ़ाया –

स तु मेधाविनौ द्रष्ट्वा वेदेषु परिनिष्ठतौ 

वेदोपबृह्णार्थाय तावाग्राह्यत प्रभु: | वा. रा. १/४/६

श्री राम और सीता का चरित्र भारतीय शास्त्र परम्परा में मंत्ररामायण, आनंदरामायण, पूर्वोत्तररामतापनीयोपनिषद्, रामरहस्योपनिषद् तथा मुक्तिकोपनिषद् में स्पष्टता से वर्णित है | सीतोपनिषद में सीता का माहात्म्य प्रतिपादित है | अध्यात्मरामायण, अद्भुतरामायण, महाभारत, पद्मपुराण, स्कन्दपुराण और श्रीमद्भागवत में भी इस कथा का सम्यक समावेश हुआ है |           

6.युधिष्ठिर- महाभारत के केंद्रीय चरित्र युधिष्ठिर धर्म की प्रतिमूर्ति थे । स्वयं भगवान श्री कृष्ण उनकी धर्मरक्षा के लिए प्रतिबद्ध थे । उन्होने महाभारत युद्ध के बाद 36 वर्ष तक राज्य किया । उन्होने राज्यासीन होने के पूर्व शरशैया पर पड़े भीष्म पितामह से महाभारत के शांतिपर्व के अनुसार राज्य व्यवस्था का उत्तम पाठ पढ़ा । 

 7  - चन्द्रगुप्त मौर्य (जन्म ३४० ई॰पू) भारत के महानतम सम्राट थे। इन्होंने मौर्य साम्राज्य की स्थापना की। चन्द्रगुप्त पूरे भारत को एक साम्राज्य के अधीन लाने में सफल रहे। उन्होंने लगभग २४ वर्ष तक शासन किया और इस प्रकार उनके शासन का अन्त प्रायः २९७ ई.पू. में हुआ। चन्द्र गुप्त मौर्य के मार्गदर्शक विष्णुगुप्त चाणक्य का अर्थशास्त्र राजनीति का वर्तमान ऐसा महान ग्रंथ है जिसकी नीति और नय का विश्वव्यापी स्थान है । 

8. सम्राट अशोक – चक्रवर्ती सम्राट अशोक (ईसा पूर्व 304 से ईसा पूर्व 232) विश्वप्रसिद्ध एवं शक्तिशाली भारतीय मौर्य राजवंश के महान सम्राट थे। सम्राट अशोक का पूरा नाम देवानांप्रिय अशोक मौर्य (राजा प्रियदर्शी देवताओं का प्रिय) था। ... सम्राट अशोक ने संपूर्ण एशिया में तथा अन्य आज के सभी महाद्वीपों में भी बौद्ध धर्म धर्म का प्रचार किया।

9. विक्रमादित्य - विक्रमादित्य उज्जैन के राजा थे, जो अपने ज्ञान, वीरता और उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे । सम्राट विक्रमादित्य गर्दभिल्ल वंश  के शासक थे।  सम्राट विक्रमादित्य ने शकों को पराजित किया था। उनके पराक्रम को देखकर ही उन्हें महान सम्राट कहा गया और उनके नाम की उपाधि कुल 14 भारतीय राजाओं को दी गई । "विक्रमादित्य" की उपाधि भारतीय इतिहास में बाद के कई अन्य राजाओं ने प्राप्त की थी, जिनमें गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय और सम्राट हेमचन्द्र विक्रमादित्य (जो हेमु के नाम से प्रसिद्ध हैं) ने भी प्राप्त की । भारतीय पंचांग इनके द्वारा आरंभ संवत्सर पर आधारित है ।   

10.  चन्द्रगुप्त द्वितीय - को चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के नाम से जाना जाता है। वे भारत के महानतम एवं सर्वाधिक शक्तिशाली सम्राट थे। उनका राज्य 375-414 ई. तक चला जिसमें गुप्त राजवंश ने अपना शिखर प्राप्त किया। गुप्त साम्राज्य का वह समय भारत का स्वर्णिम युग भी कहा जाता है। चन्द्रगुप्त द्वितीय महान अपने पूर्व राजा समुद्रगुप्त के पुत्र थे। 

11. हर्षवर्धन-  (590-647 ई.) ने उत्तरी भारत में अपना एक सुदृढ़ साम्राज्य स्थापित किया था। उन्होंने पंजाब छोड़कर शेष समस्त उत्तरी भारत पर राज्य किया। हर्षवर्धन के शासनकाल का इतिहास मगध से प्राप्त दो ताम्रपत्रों, राजतरंगिणी, चीनी यात्री युवान् च्वांग के विवरण और हर्ष एवं बाणभट्ट रचित संस्कृत काव्य ग्रंथों में प्राप्त है। इनका शासनकाल ६०६ से ६४७ ई. है । 

12.  राजा भोज (भोजदेव) का शासनकाल 1010 से 1053 तक रहा। राजा भोज ने अपने काल में कई मंदिर बनवाए। राजा भोज के नाम पर भोपाल के निकट भोजपुर बसा है। धार की भोजशाला का निर्माण भी उन्होंने कराया था। कहते हैं कि उन्होंने ही मध्यप्रदेश की वर्तमान राजधानी भोपाल को बसाया था जिसे पहले 'भोजपाल' कहा जाता था। वे सरस्वती के उपासक थे । उनके द्वारा धार में स्थित अप्रतिम ऐतिहासिक धरोहर भोजशाला इसका प्रमाण है । 

राम राज्य के प्रसंग में मुझे वर्तमान युग के दो महा मनीषी धर्म सम्राट करपात्री और राष्ट्र पिता महात्मा गांधी का संदर्भ उल्लेख भी बहुत आवश्यक प्रतीत होता है । महात्मा गांधी जी ने प्रसिद्ध दांडी मार्च के दौरान अनेक भ्रांतियों के निवारण के लिए  20 मार्च, 1930 को हिन्दी पत्रिका ‘नवजीवन’ में ‘स्वराज्य और रामराज्य’ शीर्षक से एक लेख लिखा था।  इसमें गांधीजी ने कहा था- ‘स्वराज्य के कितने ही अर्थ क्यों न किए जाएं, तो भी मेरे नजदीक तो उसका त्रिकाल सत्य एक ही अर्थ है, और वह है रामराज्य. यदि किसी को रामराज्य शब्द बुरा लगे तो मैं उसे धर्मराज्य कहूंगा. रामराज्य शब्द का भावार्थ यह है कि उसमें गरीबों की संपूर्ण रक्षा होगी, सब कार्य धर्मपूर्वक किए जाएंगे और लोकमत का हमेशा आदर किया जाएगा. ...सच्चा चिंतन तो वही है जिसमें रामराज्य के लिए योग्य साधन का ही उपयोग किया गया हो. यह याद रहे कि रामराज्य स्थापित करने के लिए हमें पाण्डित्य की कोई आवश्यकता नहीं है. जिस गुण की आवश्यकता है, वह तो सभी वर्गों के लोगों- स्त्री, पुरुष, बालक और बूढ़ों- तथा सभी धर्मों के लोगों में आज भी मौजूद है. दुःख मात्र इतना ही है कि सब कोई अभी उस हस्ती को पहचानते ही नहीं हैं. सत्य, अहिंसा, मर्यादा-पालन, वीरता, क्षमा, धैर्य आदि गुणों का हममें से हरेक व्यक्ति यदि वह चाहे तो क्या आज ही परिचय नहीं दे सकता?’

800 से भी अधिक पृष्ठों की करपात्री जी की पुस्तक ‘साम्यवाद और रामराज्य’ में स्वामी जी ने बहुत विस्तार से विश्व की विचार यात्रा में राज्य और राजधर्म की विकास यात्रा का विश्लेषण किया है । निश्चित ही जब साम्यवाद अपनी भौतिक शक्ति के बूते विश्व-मानव मस्तिष्क पर सम्पूर्ण नियंत्रण की एक सदी की यात्रा पूरी कर चुका है तब सहस्राब्दियों पुरानी भारतीय रामराज्य की अवधारणा की प्रासांगिकता कहीं और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है । यहाँ मैं स्वामीजी के अंतिम निष्कर्ष भाग का ही एक अंश यहाँ उद्धृत कर रहा हूँ –

“ मार्क्स निश्चित ही निरीश्वरवादी है, फिर उसकी दृष्टि से कर्मों का ईश्वर को समर्पित करना, फल की आकांक्षा बिना ईश्वराधन बुद्धि से शास्त्रोक्त कर्मों का अनुष्ठान (गीता दर्शन संदर्भ) आदि सब बातें व्यर्थ हैं । धन को ही सर्वस्व मानने वाले भौतिकवादी के लिए हानि-लाभ, जय पराजय को समान समझना कहाँ तक संभव है? किसी दांभिक के दंभ के भंडाफोड़ होने से किसी युक्तिशास्त्र सम्मत सिद्धान्त का अपलाप नहीं किया जा सकता ।“  

‘सीय राममय सब जग जानी’ के भाव और बुद्धि बोध में विकसित भारतीय मनीषा वैयक्तिक, सामाजिक, राजनीतिक और वैश्विक संदर्भ में भी समान शुचिता की समर्थक है । इस संदर्भ में ध्यान देने पर स्पष्ट होगा कि भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का 26 सितंबर (2020) को संयुक्त राष्ट्र संघ की 75वीं सामान्य सभा का सम्बोधन राष्ट्राध्यक्षों की बंधी बंधाई शैली, शब्दावली और राजनैक रटंत से सर्वथा पृथक और विशिष्ट था । मोदी जी ने विश्व संगठन के इतिहास, चुनौतियों और उनके परिहार की जिन विडंबनाओं को अपने सम्बोधन में रेखांकित किया उसे समझने के लिए विश्व विरादरी को अपनी समझ को और पैना करने की जरूरत समझी जा सकती है । मूल मानव संरचना के भारतीय दार्शनिक अंतर्बोध में पगा यह दिशा दर्शन उन्हें कैसे भा सकता है जो भौतिकता, शक्ति, संघर्ष और व्यक्तियों तथा देशों के तात्कालिक सतही रिश्तों में ही परम सत्य देखा करते हैं ! वास्तव में राम की भाषा परशुराम और समुद्र को तथा हनुमान और अंगद की भाषा रावण को समझने में आखिर कितना समय नहीं लग जाता है ! प्रकारांतर से यह साम्यवादी व्यवस्था के स्वयंभू चीन के द्वारा भारत के सुरक्षा परिषद में प्रवेश और पाकिस्तान से पोषित अंतर्राष्ट्रीय राष्ट्रीय आतंकवादियों के संरक्षण में अपने वीटो के प्रयोग पर विश्व विरादरी की असमर्थता का ही उजागर किया जाना है । 

आइये हम आशा करें कि सत् और असत् के इस चिरंतन संघर्ष की कड़ी में सत् की प्रतीक भारतीय आदर्श व्यवस्था ‘राम राज्य’ भारत में ही नहीं समग्र भूमंडल में शीघ्र प्रतफलित होगा । 

-अध्यक्ष महर्षि अगस्त्य वैदिक संस्थानम्, 35 ईडन गार्डन चूनाभट्टी, कोलार रोड भोपाल -462016. Email -vishwatm@hotmail.com (लेखक भोपाल से प्रकाशित तुलसी मानस भारती, सांस्कृतिक मासिक पत्रिका के प्रधान संपादक हैं।)         

  

     

  

 

Wednesday, 23 September 2020

निर्वचन-मानस भारती /समपादकीय

 निर्वचन (माह जून 2020)


      कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविशेत् शतं सम:.... 


पुण्यश्लोक श्री नन्नूलाल जी खंडेलवाल को लेकर मुझे ईशावाश्योपनिषद् का यह महावाक्य सदा याद आता रहा । मेरी इस अभीप्सा में तुलसी मानस प्रतिष्ठान में देश विदेश के पधारे मूर्धन्य भक्त और विद्वान तथा रामभद्र के चरणों में प्रीति रखने वाले ‘तुलसी मानस भारती’ परिवार के हजारों श्रद्धा सम्पन्न महानुभाव भी सदा सम्मिलित रहे । हमारा यह विश्वास इस तथ्य से भी प्राय: पुष्ट ही रहा कि वे कुछ महीनों से हड्डी की चोट के कारण अस्वस्थ्य होते हुये भी पूर्ण चैतन्य अवस्था में लगातार मानस भवन और ‘तुलसी मानस भारती’ के सम्पादन का कार्य अंतिम क्षण तक कर रहे थे । इस तरह ‘काम करते हुये सौ वर्ष जीने’ की अभिज्ञा से वे जैसे पाँच कदम पहले, 95 वर्ष की अवस्था में साकेतधाम प्रस्थान कर गये । अब ऐसा तो धर्मराज युधिष्ठिर के साथ भी नहीं हुआ कि वे चलते हुये ही स्वर्गारोहण करते । अत: श्री खंडेलवाल जी की राम से यह सायुज्यता हमारे शोक नहीं, उनके रामानुराग की फलान्विति की परिसिद्धि की ही परिचायक होनी चाहिए । 

विगत तीन महीनों से मनुष्य मात्र की बुद्धि, ज्ञान, विज्ञान और आस्था को चुनौती दे रही इस भुवन-भेदी महामारी का हम जैसे अब सीधा सामना करने के लिए मैदान में ही खड़े हो गए हैं । इतने दिनों तक जब हवा, पानी, बादल और समय अपनी गति से बराबर चलते रहे हों तो हम भी अपने थम जाने को लेकर पूर्ण आश्वस्त नहीं रह सकते थे । ‘तुलसी मानस भारती’ के भी आगे नियमित प्रकाशन की इसी सुचेष्टा में हम अब पुन: सन्नद्ध हैं ।  स्वभावत: हमारा यह अंक ‘तुलसी मानस भारती’ के पूर्व प्रधान संपादक और तुलसी मानस प्रतिष्ठान के पूर्व सचिव श्री एन एल खंडेलवाल जी पर ही केन्द्रित और उनकी स्मृति को समर्पित है । यह हमारी आज की विडम्बना ही है कि पूरे देश और दुनिया को अपनी ‘कारा’ में कैद करने वाली इस कराल ‘कौरोना’ ने हमें पत्रिका और प्रतिष्ठान के बहुसंख्य रामानुरागियों से इस संबंध में यथेष्ट संपर्क का पर्याप्त अवसर नहीं दिया । अत: इस संबंध में आगे भी प्राप्त होने वाली योग्य सामग्री और प्रतिक्रियाओं का हम यथा योग्य समावेश करेंगे । 

यह हमारा अपना सौभाग्य और परम आश्वस्ति है कि हम उस साधन के साध्य हैं जिसकी खोज में आज पूरा मानव समाज प्रायः असहाय ही दिखाई पड़ता है । गोस्वामी तुलसीदास ने यह समाधान संभवत: इसीलियी इतने पूर्व हमें प्रदान किया था – ‘रामकथा कलि पन्नग भरनी’। अर्थात् राम की यह कथा इस कलियुग के नाग के लिए जैसे मोरनी है ! अब हम यह विश्वास क्यों न करें कि इस विषाणु की महौषधि सदा से हमारे कितने निकट नहीं है !

‘तुलसी मानस भारती’ विगत लगभग आधी सदी से इस ‘राम रसायन’ की प्रयोगशाला का काम कर रही है । हम कामना करते हैं कि ‘विराट विश्व’ के उर प्रदेश को छीलते इस ‘रावण रोग’ को दूर करने के लिए परम ‘रसायनी समीर-सूनु’ श्री हनुमानजी महाराज की शीघ्र ही मानव समाज पर कृपा- वृष्टि होगी ।        

                                                       प्रभुदयाल मिश्र 

                                                      प्रधान संपादक  


निर्वचन

(सितंबर 20)


                     राम धामदा पुरी सुहावन

धरती की शोभायमान पुरी ‘अयोध्या’ राम के सालोक्य वास को प्रदान करने वाली है – यह गोस्वामी तुलसीदास रामचरित मानस की रचना की संकल्पना की भूमिका में ही लिख देते हैं । उनका कहना है कि सभी चार प्रकार के जीवधारी-  अण्डज, स्वेदज, उद्भिज और जरायुज, कोई भी हो उनके यहाँ देह त्याग करने के बाद उसे धरती पर वापिस लौटने की आवश्यकता नहीं पड़ती । यह मान्यता तो जन मानस में सुस्थापित है ही कि श्री राम ने स्वधाम गमन करते हुये इच्छुक सभी अयोध्या वासियों को अपने साथ ही साकेत धाम के लिए ले लिया था । अत: स्वभावत: ही तुलसी ने ऐसी मनोहर, सिद्धिदायक और मांगलिक नगरी में बैठकर ही रामचरित मानस के ‘कथारम्भ’ का निश्चय किया था – आज से 446 वर्ष पूर्व । लगभग पंद्रह सौ वर्ष पहले आदिशंकर ने भी ‘सौन्दर्यलहरी’ में अयोध्या को त्रिपुरसुंदरी की आँखों की तरह ‘विशाल, मंगलकारी, प्रस्फुटित कमल जैसी तथा अपराजेय’ कहा था । किन्तु काल की कराल कला में विकास और लय का क्रम किसी सामान्य ज्ञान और अनुमान का विषय नहीं बनता। शायद इसीलिए सूर्य-कुल भूषण रामलला को इस बार अपने मणि खचित जन्म स्थान  से लगभग पांच सौ वर्ष के दूसरे निर्वासन को पूर्ण कर 5 अगस्त को अपने जन्मस्थल पर विराजमान होने का अवसर आया है । इस इतिहास और घटना के साक्षी हम सब का यह धन्यभाग है कि कलियुग में ‘त्रेता’ के इस युगांतर को हमने अपनी आँखों से भरपूर देखा है । 

अयोध्या में निर्माणाधीन भगवान राम के विशालतम मंदिर की शिला-स्थापन के समारोह पर देश के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी का सम्बोधन श्रद्धा, भक्ति, गवेषणा, उत्साह और सम्प्रेरणा की दृष्टि से अप्रतिम था। अतः इसे एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ के रूप में हम इस अंक में इस पत्रिका की शीर्ष संचिति के रूप में सँजो रहे हैं ताकि भविष्य में यह रामानुरागियों और रामकथा, रामायण और राम से संबन्धित शोध, अध्ययन, सांस्कृतिक परिष्कार के व्यापक विश्वहित की विचार भूमिका का कार्य कर सके। हमने अपने रंगीन पृष्ठ पर उन 12 डाक टिकिटों को भी स्थान दिया है जिनमें रामकथा के अनेक आयामों को लेकर भारत सरकार ने इस अवसर पर परिप्रसारित किया है ।

ऋग्वेद में भगवान विष्णु की आराधना करते हुये वेद के द्रष्टा ऋषि दीर्घतमा प्राथना करते हैं – ता वां वास्तून्युश्मसि गमध्यै

 यत्र गावो भूरिशृंङ्गा  अयास: । (ऋग्वेद 1/154/6)

अर्थात् हे महाविष्णु ! हम आपके रहने के लिए एक ऐसा भवन बनाना चाहते हैं जहां ऊंचे सींग वाली गायें आराम से चरन-विचरण कर सकें । 

श्री राम मंदिर की विशालता का यह आयाम हमारे लिए भौतिक ही नहीं है यह हमारा सांस्कृतिक और मानवता के वैश्विक जीवन मूल्यों का भी परमादर्श है । रामराज्य का वर्णन करते हुये तुलसीदास जी ने लिखा है – ‘बयरु न कर काहू सन कोई’ । अर्थात राम के राज्य में जीव मात्र में सद्भाव काम करता है । यहाँ तक कि 

खग मृग सहज बयरु बिसराई । सबन्हि परस्पर प्रीति बधाई ।

और 

कूजहि खग मृग नाना वृंदा । अभय चरहि बन करहि अनंदा ।                                                      

जिस राम राज्य में पशु-पक्षियों में भी इतना सद्भाव काम करता है उसकी अनुवर्तिनी आज की बुद्धिमान, विवेकी और संवेदनशील युवा हो रही इक्कीसवीं सदी की समग्र मानव पीढ़ी से इसके आदर्शों के समादर की हमारी स्वाभाविक अपेक्षा है । हमारा विश्वास भी कहता है कि हमारे देश का वर्तमान नेतृत्व जिसमें अटूट क्षमता और पूर्ण वैराग्य का अद्भुद समन्वय है, इस दर्शन और दृष्टि को अवश्य दिशा प्रदान करेगा ।    

प्रभुदयाल मिश्र

प्रधान संपादक, तुलसी मानस भारती 

Wednesday, 1 January 2020

धर्मनिरपेक्षता का रचना संसार


समीक्ष्य कृति – जिन्हें जुर्म-ए -इस्क पे नाज़ था
उपन्यासकार- पंकज सुबीर
प्रकाशन- शिवना प्रकाशन, सीहोर
मूल्य – 200 रुपए

धर्मनिरपेक्षता का रचना-संसार
-प्रभुदयाल मिश्र

सामाजिक सौहार्द्य के बहुआयामी भारतीय समाज में सूत्रबद्धता को सहेजने की चेष्टा में लिखे पंकज सुबीर के उपन्यास जिन्हें जुर्म-ए -इस्क पे नाज़ था को ऐसे सभी साहित्य प्रेमियों को पढ़ना चाहिए जो प्रचलित धर्मों की ऐतिहासिक वस्तुनिष्ठता के साहसिक अन्वीक्षण में प्रवृत्त होना चाहते हैं । इतिहास, समाज, और वर्तमान की अनेक धाराओं की दकियानूसी का ऐसा सटीक विवरण बिना अतिरिक्त लेखकीय जागरूकता के असंभवप्राय ही है । निश्चित ही सुबीर को समय की नब्ज की इतनी सही पहचान और पड्ताल के लिए व्यापक जन समर्थन मिलेगा, ऐसा मेरा अनुमान है।  
महात्मा गांधी की 150 वीं जन्म जयंती वर्ष में उनके सहज मानवीय और विश्ववन्धुत्व के आदर्श को साकार करती यह कृति विशेष रूप से सराही जानी चाहिए क्योंकि इसमें लेखक ने अपनी कुशल कल्पनाशीलता (फांतासी) से स्वयं गांधीजी द्वारा उन सारे प्रश्नों के बहुत सटीक समाधान प्रस्तुत करा दिये हैं जिनको लेकर या तो गांधीजी की हत्या ही करदी गई अथवा आज भी उनकी तुलना में जिन्ना को कहीं अधिक धर्मनिरपेक्ष ठहरा दिया जाता है। एक कस्बाई दंगे की प्रायः अनुमान की जा सकने वाली सामान्य प्रष्ठभूमि में लेखक ने संचार की विधा में जिस कलात्मकता से नाथूराम गोडसे, महात्मा गांधी अथवा मुहम्मद अली जिन्ना को प्रत्यक्ष ला खड़ा किया है वह उसके विश्वास, अनुमान और सत्य के प्रत्यक्षीकरण का अतिप्राकृत विधान कहा जा सकता है । यह बात दूसरी है कि www.vishwatm.com गांधीगिरि के बाद इस विधा का प्रयोग शायद आगे अब उनके ही नसीब में ही आए जो सुनी अथवा अनसुनी आवाज को कैद कर पाने का माद्दा रखते हों !
288 पन्नों के इस उपन्यास की कथावस्तु एक अनाम कस्बे की पूरी रात की दंगे की वारदात पर केन्द्रित है। इसका मुख्य किरदार रामेश्वर है जिसने शायद पिछ्ली सदी के 60-70 की दशक की महाविद्यालयीन संस्कृति से प्रेरित होकर अपने उपनाम को तिलांजलि दे रखी है । बहुत अच्छी नौकरी तो उसके नसीब में हो भी नहीं सकती थी, अतः उसने गणित में स्नातकोत्तर करने के कारण एक कोचिंग संस्थान खोला । शाहनवाज़ रामेश्वर के बचपन के शिक्षा साथी शमीम का बेटा है जिसे उसके पिता ने सही रास्ते पर ले जाने के लिए उसे इस संस्थान में छोड़ा तथा वह आशा के मुताबिक रामेश्वर का सबसे विश्वस्त, तटस्थ और ज़िम्मेवार सहायक का दायित्व निभाने लगता है । शाहनवाज़ के नए मुस्लिम वहुल खैरपुर के पड़ोस में हनुमानजी के मंदिर निर्माण को लेकर दंगे की स्थिति बनती है। शाहनवाज़ की गर्भवती पत्नी को इसी रात प्रसव पीड़ा होनी है, इत्यादि ।
लेखक रामेश्वर की स्वयं से दूरी रखते हुये उसे साहित्यकार तो नहीं बनाता किन्तु उसे उत्तम अध्येता, विचारवान, विश्लेषक तथा नई पीढ़ी के अफसर और आंदोलनकारियों का आदर्श गुरु एवं मार्गदर्शक बना देता है । इसी वजह से कलक्टर, एस पी और पुलिस मुख्यालय से आई फोर्स के नायक भारत यादव सहित रामेश्वर आंदोलन कर्ताओं के सूत्रधारों का भी सूत्रधार बन जाता है । कहानी में मुख्य कथ्य लेखक का विश्व के ज्ञात इतिहास से लेकर भारत के वर्तमान राजनीतिक फ़लक पर वेबाक टिप्पणी और कटाक्ष हो जाता है । इस प्रकार सारे जमाने की बदनामी ओड़ लेने वाले आज के धर्म पर स्वयं महात्मा गांधी का यह परमादेश न मानने की बेफरमानी क्या किसी के बूते की बात हो सकती है –
“धर्म जब तक समाज के लिए होता है, तब तक तो वो अहिंसक होता है । लेकिन जब राजनीति की तरफ झुकता है, सत्ता की तरफ झुकता है, तो वही धर्म हिंसक हो जाता है । धर्म को राजनीति के लिए नहीं बनाया है, वह तो इंसान के लिए बनाया है । उसे तो लोगों के बीच में रहकर काम करना है । जब वह गलत रास्ते पर मुड़ता है तो वह धर्म नहीं रहता, वह तो कुछ और ही हो जाता है। जो राजनीति तरफ चला जाता, वह तो धर्म नहीं होता है। उसको तो धर्म नहीं ही कहना चाहिए।“ (पृष्ठ 244)
इस पुस्तक का आरंभ और अंत तथा इसे यदि इसकी केंद्रीय धारा कहा जाय तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी । जिस प्रकार वैशाली की नगर बधू का शिष्य बीजगुप्त और महाराज पाप क्या है?’ से पाप और पुण्य की तह में जाना चाहता है, इस उपन्यास का शाहनवाज़ भी धर्म का कुछ ऐसा ही पाठ रामेश्वर से पहले ही पन्ने में इस प्रकार गृहण करता है-
“ मैं एक ऐसी दुनिया की कल्पना करता हूँ, जहां धर्म का कोई अस्तित्व नहीं होगा। जहां इंसान केवल इंसान के रूप में ही होगा । कोई धर्म नहीं, कोई जात नहीं ।“ (पृष्ठ 8)
यहाँ उस बौद्धिकता का कोई प्रसंग नहीं है जिस स्थिति में सामरसेट मौम के उपन्यास रेजर्स एज का मैं वह उदाहरण जुटाता जिसमें इसका कथानायक लेरी यह भविष्य कथन करता है कि आगे आने वाली बुद्धिजीवी पीढ़ी किसी ऐसे ईश्वर में भरोसा कतई नहीं करेगी जिसे जिंदा रखने के लिए घी के दिए, अगरबत्ती अथवा इसी तरह के अन्य प्रसाधनों या वफादारी की कसमों आवश्यकता पड़ती हो !
सुबीर जिस साहस और निश्शंकता से आज की दुनिया के धर्मेतिहास की जो पड़ताल करते हैं, वह निश्चित ही काबिलेतारीफ है। इसका यहाँ कुछ उल्लेख जरूरी भी है ।
“अगर दुनिया के तीन प्रमुख धर्मों यहूदी, ईसाई और इस्लाम की बात करें, तो तीनों ही इब्राहीम को अपना पितामह मानते हैं । ... तीनों धर्म जो आज एक दूसरे के खून के पियासे हैं । (पृष्ठ 10) जाहिर है, लेखक हिंदुओं को वैदिक काल में अनुपस्थित मानकर बाहर से आए आर्यों को वेदों का रचनाकार मानते हुये पुराण आदि को ही हिंदुओं के धर्म का आधार पाकर धर्म की इस प्रतिस्पर्धा में हिंदुओं को खड़ा करता है । इस संबंध उसने यह एक अत्यंत विवादास्पद निष्कर्ष भी निकाल लिया है – “ऋग्वेद तो असल में हिंदुओं की किताब है ही नहीं, वह तो आर्यों की किताब है । “ (पृष्ठ 13) इस तरह लेखक जहां पग-पग पर यूरोप और अंग्रेजों को हिंदुओं और मुसलमानों के बीच विभेद की खाई खोदने के लिए कोसता है, वहीं उसे उनके द्वारा भारत में आर्य और अनार्यों का कूटनीतिक विभाजन स्वीकार है ! ऐतिहासिक बोध की यह परादृष्टि एक शदी पूर्व के उस पश्चिमी तत्त्वबोध पर केन्द्रित है जिसके अनुसार आर्य पश्चिम के किसी अदृश्य लोक से वेद-ज्ञान की गठरी लेकर भारत आए और उसे यहाँ खोलकर कहीं सहसा अदृश्य हो गए । इसके पहले वे जहां थे न तो उन्होने वहाँ अथवा भारत के इस नवजागरण के बाद अपने मूल भूभाग में लौटकर ज्ञान का यह दिव्य प्रकाश दोबारा विखेरने की कभी कोई आवश्यकता महसूस की ! लेखक पंकज सुबीर आर्य, जो सनातन अवधारणा में श्रेष्ठता बोधक सम्बोधन का प्रायः एक विशेषण मात्र है, को न केवल उत्तर-दक्षिण और श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ वल्कि आर्य और हिन्दू वर्ग विभाजन में भी बांटते नज़र आते हैं –
“हिन्दू तो अभी तय ही नहीं कर पा रहा है कि वह क्या है ? वह आर्य है कि अनार्य ? क्योंकि अगर आर्य है तो वेदों को मानना होगा और अगर वेदों को मानना है तो मूर्ति पूजा छोडनी होगी ।“ (पृष्ठ 18)
वैदिक ज्ञान का यह तत्त्वबोध ज़ाकिर नाईक जैसे द्रष्टाओं का परमधन है जो यजुर्वेद के एक मंत्र न तस्य प्रतिमा अस्ति (32/3) को आधार बनाकर वेद में मूर्ति पूजा का निषेध प्रतिपादित करते हैं । वस्तुत; सुबीर ने इस पुस्तक में ही ऋग्वेद के जिन देवताओं अग्नि, इंद्र, मित्र, वरुण, मरुत आदि का उल्लेख किया है, वैदिक ऋषि उनका रूपाकार स्तुति गान ही करते हैं । अब इन देवताओं की स्तुतियों को चाहे वे प्राकृतिक शक्तियों के मानवीकरण के रूप में की गई हों अथवा यह बहुदेवोपासना हो, वैदिक व्याख्याकारों के अनुसार यह उस एकेश्वर का ही अनुचिंतन है जो पुरुष सूक्त (ऋग्वेद 10/90), नासदीय सूक्त (10/129), हिरण्यगर्भ सूक्त (10/121) आदि का प्रधान कथ्य है ।
लेखक ने इसी कोटि की एक भ्रांति गीता के संदेश को लेकर भी प्रकट की है जिसका प्रतिवाद आवश्यक है । लेखक पुस्तक पृष्ठ 223 में गीता के दूसरे अध्याय के श्लोक 31 के उत्तरार्ध – धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोsन्यात्क्षत्रियस्य न विद्यते की व्याख्या इस प्रकार करता है –
“उसे (अर्जुन को) एक बार फिर से (युद्ध में) झोंक देने के लिए ईश्वर को सामने आकार ज्ञान देना पड़ता है । ईश्वर स्वयं आकार कहता है कि हिंसा करो।“
पहली तो सीधी बात इतनी कि कृष्ण ने गीता में कहीं नहीं कहा कि हिंसा करो । दूसरे अध्याय में अर्जुन की युद्ध से परांगमुख होने की चेष्टा में उसके इस अनुरोध पर कि कृष्ण अपना शिष्य मानकर उसे श्रेयस्कर पाठ प्रशस्त करें, कृष्ण सबसे पहले वेदान्त के अद्वैत दर्शन को ही प्रतिपादित करते हैं जिसमें किसी के भी मरने या दूसरे को मार पाने की निरर्थकता ही सिद्ध है । इससे कुछ नीचे के व्यावहारिक धरातल पर वे जन्म और पुनर्जन्म को मानने की स्थिति में उसे अपरिहार्य मृत्यु का सामना करने को कहते हैं । लेखक ने यहाँ जो संदर्भ लिया है वह सामाजिक चेतना का तीसरा धरातल है जिसमें प्रत्येक व्यक्ति के लिए निर्धारित कर्तव्य की भूमिका- स्वधर्मपि चावेक्ष्य (2/30) का निर्वाह आवश्यक है। इस प्रकार कृष्ण अर्जुन को एक सिपाही की भांति यहाँ केवल अपने कर्तव्य निर्वाह की सलाह मात्र दे रहे हैं । यह परामर्श किसी आदेश के रूप में कदापि नहीं है ।
एक अर्थ में इस पुस्तक को धर्म का नया समाजशास्त्र कहा जा सकता है । अत: स्वाभाविक रूप से लेखक की परिदृष्टि के ही अनुरूप गीता में व्यवहृत धर्म का किंचित उल्लेख प्रसंगेतर नहीं है । गीता में 29 बार धर्म शब्द का उल्लेख हुआ है । धर्म शब्द से ही आरंभ हुई गीता के पहले, दूसरे और 18वें अध्याय में 5-5 बार, तीसरे अध्याय में 4 बार, चौथे अध्याय में 2 बार, सातवें में 1 बार, नवें में 3 बार और 1-12-14वें में 1-1 बार धर्म शब्द की आवृत्ति हुई है।  इस शब्द की विस्तृत अध्यात्मपरक व्याख्या का यह कोई प्रसंग नहीं है। गीता में प्रायः इसका प्रयोग स्वभाव, प्रकृति तथा वर्ण और आश्रम व्यवस्था के सामाजिक दायित्व के संदर्भ अथवा व्यापक विराट व्यवस्था के रूप में हुआ है। अर्जुन चूंकि क्षत्रिय, एक प्रतिरक्षक और सैनिक है, अत: युद्ध की स्थित आने पर उसमें उसका प्रवृत्त होना उसका प्रधान सामाजिक कर्तव्य है । एक सिपाही अपने देश या राष्ट्र की संरक्षा में शत्रु देश या आक्रांता के सिपाही का स्वयं कोई शत्रु नहीं होता । उसका शत्रु सैनिक के प्रति कोई शत्रुता अथवा हिंसा का भी भाव नहीं होता । श्री कृष्ण अर्जुन को एक सैनिक के इसी कर्तव्य का यहाँ बोध करा रहे हैं । अतः गीता के अंत में वे अपनी बात अर्जुन से यही कहते हुये समाप्त करते हैं – यथेच्छसि तथा कुरु ( 18/63 ) इस प्रकार गीता के इस संदेश को भगवान द्वारा प्रदत्त हिंसा का आदेश मानना एक पूर्वाग्रह के अतिरिक्त कुछ और नहीं है।
धर्म के इस संदर्भ में एक अंतिम बात इसके आध्यात्मिक पक्ष पर भी विचारणीय और आवश्यक हो जाती है । लेखक ने हिन्दू शब्द की भूगोली ऐतिहासिकता पर काफी विचार किया है, (पृष्ठ 14) । उसके अनुसार बहुआयामी सनातन धर्म के वर्तमान प्रचलन का यह हिन्दू संस्करण ही उसकी वास्तविक पहचान है । वेदों के आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक विचार पक्ष अथवा इसके व्यवहार के कर्म, उपासना और ज्ञान पथ याकि सनातन धर्म के न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, योग, सांख्य तथा वेदान्त के दर्शन पक्ष को विचार परिधि में रखे बिना भारतीय मनीषा और इसकी जीवन धारा को चूंकि समझा ही नहीं जा सकता अतः इस असंग आनुषंगिकता में इसकी तुलना और यह समाकलन सदोष है ।
पुस्तक का मुद्रण, टंकण, प्रकाशन सभी मानक कोटि के हैं । इसकी इस दृष्टि से त्रुटिहीन बनाने की भरपूर प्रकाशकीय चेष्टा स्पष्ट है । तथापि पृष्ठ 165 में अभी की आवृत्ति, पृष्ठ 249 में मेर नाम’, पृष्ठ 88 में भारत पूछा था तथा मोहम्मद को जन्म की ओर मैं आगे परिष्कार के लिए ध्यान आकृष्ट करना चाहता हूँ ।

35, ईडन गार्डन, चूनाभट्टी, कोलार रोड भोपाल 462016 (9425079072)                                                
                          

वायु पुरुष महाकाव्य की समीक्षा


समीक्षा
कृति – वायु पुरुष
कवि- उपेंद्र कुमार
प्रकाशन- भारतीय ज्ञानपीठ, दिल्ली
मूल्य- रुपए 250


        पुराकथाओं के वार्मिंग वायु पुरुष
-    प्रभुदयाल मिश्र 

कवि श्री उपेंद्र कुमार का 127 पृष्ठ के 11 सर्गों वाले महाकाव्य वायु पुरुष इस पुस्तक के फ्लेप के अनुसार पुराकथाओं से हमारी यात्रा को उस समकालीन वैश्विक संकट और चुनौती के सामने ला खड़ा करता है जो प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग, पर्यावरण और पारिस्थितिकी के क्षय से जुड़ा है और जो समस्त सृष्टि के प्राण का संकट बन गया है। किन्तु यथार्थ में इस रचना के द्सवें सर्ग का निम्न यह रेखांकन इसका भरतवाक्य नहीं है –
बना तो न पाएंगे बेहतर कुछ भी
परंतु नासमझी में खाते और खोते रहेंगे
प्राकृतिक संसाधनों को
पयस्विनी प्रकृति का करेंगे
अविवेकी दोहन ऐसा। (पृष्ठ 113) 
यथार्थत: यह धीरोदात्त देवता नायक वाय पुरुष के उस उद्दाम आवेग की वह कथा है जो ऋग्वेद के पुरुष, नासदीय और हिरण्यगर्भ सूक्त से आरंभ होती है –
हिरण्यगर्भ ने किया निवास पूरे एक वर्ष तक उसी
अंड में
फिर किए उसके दो भाग
एक का नाम द्यलोक हुआ और दूसरे का भूलोक (पृष्ठ 28)
किन्तु वीर और शृंगार के बिना किसी महाकाव्य का रस परिपाक कहाँ, अस्तु
पर्वत हिल उठते हैं
चट्टानें हिम शिखरों से
टूटकर गिरने लगती हैं
तूफान पसारता चला जाता है
पहाड़ियों पर, घाटियों में
सब कुछ मिटाता, पैरों तले रौंदता (पृष्ठ 44)
और (शृंगार)
वायु आवेश में
अपनी प्रेमिका को भर लेते हैं-
अभी-अभी स्नान करके निकली थी
वस्त्र विन्यास, शृंगार-पठार अभी होना बाकी था। ( पृष्ठ 86, कुंती प्रसंग)
तथा
मोह से अंधे हो उठे वायुदेव
काम का एक ज्वार-सा जागा तन-मन में
हो गया एकाग्र चित्त उनका अंजना में ही । (पृष्ठ 99)  
अपने चरित नायक से प्रायः तादात्मीकृत कवि उसके उद्भव और विकास में उसके समानान्तर उन वाक् धाराओं और शब्द बिंबों में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है जो चेतना की जागृत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाओं में समावर्तित हैं । कवि की परा चेतना की यह अंतर्यात्रा उसे इस आदि पुरुष को  नाना रूप और नामों में अभिव्यक्ति देने की असाधारण क्षमता प्रदान करती है । अतः कोई विस्मय नहीं यदि धीरप्रशांत बना यह धीरोदात्त वायु पुरुष अगले ही क्षण धीरोद्धत्त भी बन जाता है –
शायद समय आने ही वाला है
बाढ़ों को तोड़ गिराने का
सीमाओं से पत्थरों को हटा फेंकने का
बीजों और ताजा दूर्वा के गट्ठरों को फैला देने का
पृथिवी की महाविशाल परिधि पर । (पृष्ठ 70)
यह स्वाभाविक ही है कि कवि श्री उपेंद्र कुमार अपनी इस कृति के उपसंहार में इसे वेद के उन ऋषियों को समर्पित करता है जिन्होने इस अदृश्य वायु पुरुष को अवश्य देखा है (पृष्ठ 120 )। वेद के ऐसे परम द्रष्टा ऋषि अगस्त्य के कया शुभी सूक्त (ऋग्वेद मण्डल 1/165/15) का यहाँ स्मरण मुझे निम्न उद्धरण सहित मौजूं प्रतीत होता है –
एषः वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः
एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीर्दानुम् ।     

तुम्हें अर्पित हमारी यह प्रार्थना मरुतो,
तुम्हें अर्पित हमारी यह वाक्
आनन्दकर, हम करें अब सम्प्राप्त
पोषण अन्न,  बल,  जय सर्वदा इस लोक में । १५ ।

35 ईडन गार्ड, चूनाभट्टी, कोलार रोड भोपाल 462016 (9425079072)  
                      
      

Sunday, 25 August 2019

रामकथाकार श्री राजेंद्रदास जी देवाचार्य

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श्रंखला-रामकथाकार 
साधुत्व और शास्त्र के सुमेरु : श्री राजेंद्रदास जी देवाचार्य

महाराजश्री मलूकपीठाधीश : एक परिचय
भारतवर्ष के प्रदेशों में मध्यप्रदेश व उसका एक क्षेत्र बुंदेलखंड। वहाँ के एक जनपद टीकमगढ़ का एक ग्रामविशेष अचर्रा। पूर्वकाल से ही आचार्यों – सदाचारी वैदिक विप्रों के आवास स्थान का नाम आचार्य शब्द से अचर्रा हो गया। भद्र भाद्रमास जिसमें अवतारी लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण का प्राकट्य होता है, उसी मास की शुक्ल पक्ष पंचमी को ऋषि पंचमी कहते हैं । उस पवित्र तिथि में हमारे पूज्यपाद श्रीमहाराजजी का आविर्भाव सत्परायणा पुण्यसंस्कारशीला माता श्रीमती बृजलता देवीजी की दक्षिण कुक्षि से हुआ । आपके पिता पण्डित श्रीरामस्वरूप पाण्डेय जी वंश परम्परानुसार अति संस्कारी, पुण्यात्मा, सदाचारी, नैष्ठिक धर्मप्राण विद्वान महानुभाव हैं । वैदिक सनातन पद्धति से जातकर्मादि संस्कार सम्पन्न होने के पश्चात विहित दिवस में विधि-विधान पूर्वक श्रीमहाराजजी का जन्म-लक्षणादि के अनुसार नामकरण संस्कार सम्पन्न हुआ। तदनुसार आपका जन्म नाम श्रीराजेंद्र नारायण पाण्डेय हुआ। सुजनश्रेष्ठ सद्गुरु श्रीगणेशदास जी भक्तमाली जी के समर्थ दिव्याशीष से सरलात्मा दंपति श्रीमती बृजलता देवीजी तथा पण्डित श्रीरामस्वरूप पाण्डेय जी नामक माता पिता से भारद्वाज गोत्र पाण्डेय विप्रवंश में भाद्रपद शुक्ल पक्ष पंचमी, ऋषि तिथि को एक तेजस्वी बालक का प्राकट्य हुआ जो नामकरण संस्कार से आयुष्मान राजेंद्र नारायण संज्ञाव।न हुए।
यथा आपके सदगुरुदेव श्रीभक्तमालीजी अपने बचपन में केवल संस्कृत पढ़ने हेतु दो बार चुपके से घर से भाग गए। पहली बार तो वे असफल हुए किंतु दूसरी बार दो तीन साथियों के साथ वे अपने गाँव कुर्सी (नैमिष क्षेत्र) से पैदल वाराणसी आ गए। उसी तरह पाँचवी-छठी कक्षा पढ़ते पढ़ते ग्रामीण विद्यालय में घटना विशेष के कारण विरक्त हो गए। तथा आपने पिताजी से कह दिया कि ‘अब मैं वहाँ पढ़ने नहीं जाऊँगा’। इस स्थिति से आपके पण्डित पिताश्री तथा सम्पूर्ण परिवार अति चिंतित हो गए । किंतु श्रीहरि कृपा से उसी समय वृंदावन से सदगुरुदेव महाराज का पदार्पण हुआ और सारी स्थिति जानकर उन्होंने झट से समाधान किया। 
इससे पूर्व ग्राम निवास की अवधि में भी लगभग एक वर्ष के लिए प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद स्वामी श्रीशरणानंद सरस्वती जी महाराज का पावन सानिध्य प्राप्त हुआ। पूज्य स्वामीजी जगद्गुरु शंकराचार्य ज्योतिषपीठाधीश्वर श्रीब्रह्मानंद सरस्वतीजी महाराज के शिष्य तथा धर्म-सम्राट स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराज के छोटे गुरु-भ्राता थे। पूज्यपाद श्रीशरणानंदजी सन्यास धर्म में पूर्ण परिनिष्ठित एवं कंचन कामिनी के स्पर्श से सर्वथा विमुक्त एक सर्वसंतप्रशस्त महापुरुष थे। 
वहीं अपने शरणागत नव बाल शिष्य को उन्होंने वैष्णवी दीक्षा प्रदान कर विधिवत संस्कार किया। संस्कृत शास्त्र अध्ययन वृंदावन में इनका आरम्भ करवाया। कालांतर में आपके गुरुदेव श्रीगणेशदास भक्तमालीजी ने आपको निकटस्थ खाक चौक के योगिराज सिद्ध सन्त श्रीदेवदास जी महाराज से विरक्त दीक्षा दिलवाई। संस्कारी वैष्णव अध्ययनशील श्रीराजेंद्रदास जी ने क्रमशः नव्य व्याकरण, विशिष्टाद्वैत वेदांत दर्शन तथा साहित्य-शास्त्र में आचार्यत्व उपाधि अर्जित की तथा अनुसंधान कार्य सम्पन्न कर विद्या वाचस्पति (D.Litt) की उपाधि भी प्राप्त की।
(मलूक पीठ की वेबसाइट से साभार)
  
जब मैंने पूज्यवर देवाचार्य से तुलसी मानस भवन, भोपाल में रामकथा पर व्याख्यान हेतु पधारने का अनुरोध किया तो उन्होने अपने सर्वज्ञात विनम्र भाव में प्रथमत: यही कहा जैसा कि भी आपने कहा है, जहां पूज्य रामकिंकर जी उपाध्याय, राजेश्वरानंद जी महाराज और देवी मंदाकिनी आदि पधारते रहे हैं वहाँ मेरे जैसे रामकथा न कह पाने वाले व्यक्ति का क्या स्थान हो सकता है?’
तब मेरा कहना था कि वाल्मीकि रामायण के इस श्लोक को आपके संदर्भ से मैंने नोट कर रखा है तथा आपकी अपेक्षा के अनुरूप इसके अभिज्ञान के लिए मैं इसे जहां तहां साझा कर रहा हूँ -
यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामं न पश्यति
निंदित: सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हति । (वाल्मीकि रामायण 2/17/14)
अर्थात जिसने राम को नहीं देखा-जाना और राम ने जिसे नहीं देखा (कृपा दृष्टि से ) वे दोनों तो सर्वत्र निंदा के ही योग्य हैं । उनकी अंतरात्मा उन्हें सदा धिक्कारती ही है !  
देश के शीर्ष शास्त्रज्ञ और वाल्मीकि रामायण के अप्रतिम प्रस्तोता के रूप में आपसे सुने इस कथन कि वाल्मीकि रामायण के इस श्लोक को भारत के घर-घर द्वार पर लिखा जाना चाहिए, क्या सुनकर कोई भुला सकता है ?’  
यह सही है कि देवाचार्य जी के प्रधान प्रियतर विषय भक्तमाल, श्रीमद्भागवत और गोसंरक्षण आदि हैं, किन्तु भारतीय मनीषा का कोई भी विषय उनसे छूटा नहीं है तथा उनकी अनवरत नित्य अध्ययवसायिता उन्हें शास्त्र ज्ञान की सर्वोच्च अधिकारिता प्रदान करती है । यहाँ चूंकि मूल संदर्भ रामकथाकार का है, अत: इस सम्बन्ध में उनका इसी रूप में परिचय मेरा प्रकट अभिप्रेत है ।  
कुछ समय पूर्व देवाचार्य ने रामकथा की वेद के प्रत्यक्ष उपब्रहमण के रूप में अद्भुद व्याख्या की । उनका कहना था कि दशरथ जी के पिता अज थे । अज को हम जानते हैं, यह ब्रह्मा जी का नाम है। जिस प्रकार वेद ब्रह्मा के निश्वास हैं, उसी प्रकार दशरथ अज महाराज के आत्मज हैं । गोस्वामी तुलसीदास मानस में उनका यही परिचय देते हैं –
अवधपुरी रघुकुलमनि राऊ । बेद विदित बिदित तेहि दसरथ नाऊ ॥
जब हम वेद के कथ्य भाग पर आते हैं तो स्पष्ट होता है कि वेद में ज्ञान, उपासना और कर्म – तीन मुख्य प्रभाग हैं । दशरथ जी की तीन महारानियाँ- कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी इन्हीं तीन भूमिकाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं । और जहां तक राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का संबंध है, उनके विषय में गोस्वामी तुलसीदास का यही कहना है – बेद तत्व नृप सुत तव चारी (मानस 1/98) । वे मनुष्य के पुरुषार्थ चतुष्टय- मोक्ष, धर्म, धन और काम के प्रतीक हैं । अपनी इस व्यवस्था में महाराज जी विस्तृत व्याख्या पूर्वक यह भी समझाते हैं कि पुरुषार्थ का क्रम प्रचलित रीति -धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के स्थान पर पूर्वोक्त क्रम में ही रखे जाने योग्य है । वास्तव में काम से मोक्ष का क्रम तो असंगत है ही, अर्थ से भी मोक्ष की प्राप्ति की कल्पना नहीं की जा सकती है । महाराज श्री की स्थापना है कि काम’, अर्थात कामना, इच्छा, अभीप्सा और जीवनाकांक्षा प्रथम पुरुषार्थ है जो संसार में मानव की यात्रा का सर्वथा प्रथम पग  है । इस पुरुषार्थ साधन से मनुष्य अर्थ अर्थात उपकरण, साधन और उपादान तथा धन (अर्थ) संचित करता है । धन की सर्वोत्तम गति दान है जो एक सच्चे पुरुषार्थी को धर्म पथ पर पहुँचाती है । और यही मनुष्य के लिए मोक्ष का द्वार खोलता है ।
आदिकवि वाल्मीकि के शोक से श्लोक उत्पन्न होने के लोक विश्रुत सिद्धान्त पर मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती समा:/ यत्क्रोंचमिथुनाद्मेकमवधी काममोहितम् की देवाचार्य जी व्याख्या अद्भुद हैं । उनके अनुसार इस एक श्लोक मात्र में रामायण के सातों कांडों की कथा का समाहार उपलब्ध हो जाता है । वाल्मीकि जैसे द्रष्टा महाकवि की काव्य प्रक्रिया को एक लोक सरलीकृत धारणा में देखना कदापि उचित नहीं है । यहाँ ऋषि की अंतर्दृष्टि किसी काल या घटना सापेक्ष न होकर वेदानुकूल सृष्टि की रचना और विस्तार क्रम की ही प्रतिपादक है ।     
भक्ति भक्त भगवंत गुरु चतुर्नाम हैं एक /इनके पद बंदन किए नासहिं विघ्न अनेक की भक्तिमाली धारा में ज्ञान, उपासना और सनातन भारतीय जीवन दर्शन का सर्वांगीण समाहार हो सकता है, यह राजेंद्रदास जी की कथा सुनकर ही समझ आता है । हिन्दी साहित्य की संत परंपरा के मध्ययुगीन भक्त कवियों को नाभादास जी की दृष्टि में पिरोकर राष्ट्र के सांस्कृतिक परिष्कार का एक महत्तर प्रयोजन साधा जा सकता है, यह संकल्पना राजेंद्रदास जैसे उक्त परंपरा के वर्तमान और सनातन संस्करण की ही हो सकती है । उन्हें सुनते हुये  मलूकदासजी के संबंध में लोक प्रचलित निश्चेष्टा ( अजगर करें न चाकरी पंछी करें न काम। दास मलूका कहि गए सबके दाता राम) के सिद्धान्त का तो निवारण होता ही है, भक्त रैदास द्वारा काशिराज की उपस्थिति में काशी के पंडितों की पराजय का तुमुलनाद भी सुना जा सकता है ! प्रियादास जी के किसी एक पद को लेकर जब राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात या मध्यदेश के किसी संत के संबंध में किन्हीं चार पंक्तियों पर उनकी कथा का एक सम्पूर्ण सप्ताह (पाँच घंटे प्रतिदिन की अबाध कथा धारा में) अपर्याप्त हो जाता हो तो वाल्मीकि या तुलसी की रामायण की कथा के आरंभ और विश्रांति की सीमा रेखा ही खोजना निरर्थक है ।
राजेन्द्र दास जी स्वर, संगीत, गान, सम्बोधन, उद्बोधन, प्रबोधन और संयोजन की अपार क्षमता रखते हैं । जहां कुछ कथा वाचकों के साथ काफी बड़ी संख्या में – लगभग एक गाँव जैसा – अनुयायी वर्ग चलता है, वैसे ही देवाचार्य जी के साथ विरक्त साधु, महात्माओं और संस्कारवान ग्रहस्थों की जमात चला करती है । यहाँ यह अनुमान किया जा सकता है कि इतनी संख्या के श्रोता मात्र श्रद्धाबश केवल पाठ पुनरावृत्ति के लिए प्रेरित होकर उपस्थित नहीं हो सकते हैं । इन श्रोताओं के लिए निश्चित ही यह आश्चर्य का विषय होगा कि उनसे आयु में इतने कनिष्ठ  (महाराजश्री का जन्म वर्ष 1971 है) इस वक्ता के पास इतने शास्त्र, साधना, अध्यवसाय और सत्संग से इतने अल्पकाल में उपार्जित यह अतुलनीय संपदा दैवी प्रसाद ही हो सकती है ।  
इस अवसर पर मुझे श्री राजेंद्रदास जी के पूर्व आश्रम के पूज्य पिता श्री रामस्वरूप दास जी पाण्डेय की एक पुस्तक की समीक्षा करते हुये लिखी अपनी निम्न पंक्तियों का स्मरण आ रहा है –
यह महज संयोग ही नहीं है कि श्री रामस्वरूप दास जी पांडे मलूक पीठाधीश्वर राजेंद्रदासजी देवाचार्य के पूर्व आश्रम के पिताश्री हैं।  श्री राजेन्द्र दासजी वर्तमान समय के देश के शीर्षतम शास्त्रवेत्ता साधु हैं।  विद्वता की उनकी पराकाष्ठा अतुलनीय है।  जिस प्रकार कपिल महाराज से देवहूति और ऋषि कर्दम धन्यता को प्राप्त हुए वही भाग्य श्री पांडेजी का भी है।  राजेंद्रदासजी अपने विश्वव्यापी स्वर संधान से गोरक्षा के जिस अप्रतिम संकल्प साधन में निरत हैं, वह उनकी सनातन भारतीय भूमिका को पुनराख्यापित करता है ।
देवाचार्य जी की रामकथा का वह प्रसंग जब राम निश्चर वध की दृढ़ प्रतिज्ञा करते हैं, प्रकारांतर से अनेक बार उभरता है । रामचरित मानस में तो इसकी पृष्ठभूमि में तुलसीदास जी ने राम का राक्षसों के द्वारा मारे गए मुनियों के अस्थि समूह देखना बताया है । वाल्मीकि की सीता राम की इस दृढ़ प्रतिज्ञा पर औचित्य का प्रश्न उत्पन्न करती हैं । उनका कहना है कि निश्चरों ने राम का कुछ अहित नहीं किया है, उनसे उनकी कोई शत्रुता भी नहीं है, अत; राम जैसे धर्मज्ञ और नीतिवान को अकारण उनके विनाश की प्रतिज्ञा करना कहाँ तक सही है ? वाल्मीकि जी के राम इस सम्बन्ध में इतने दृढ़ प्रतिज्ञ हैं कि इसके कारण को लेकर तो वे सीता और लक्ष्मण का भी परित्याग कर सकते हैं –
अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम्
न तु प्रतिज्ञां सन्श्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषत: ।
आशय यह कि ब्राह्मणों के प्रति की गई प्रतिज्ञा राम के लिए अपरिहार्य है । सारत: ब्राह्मण, गाय और सनातन धर्म के सिद्धान्त और दर्शन का विधि और निषेध रीति से पूरी तरह से परिपालन देवाचार्य का स्थिर संदेश है । यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि शास्त्रों की भी अनेकश: व्याख्या हुई है तथा आधुनिक संदर्भों में समाज को पश्चिम की वैज्ञानिक शिक्षा और संदेश को भी ध्यान में रखना विधेय हो सकता है । किन्तु साधु परंपरा, सनातन शास्त्र दर्शन और भारतीय जीवन दृष्टि में आकंठ निमग्न मलूक पीठाधीश्वर से भिन्न धारणा की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती । इसमें यह आश्चर्य भी कोई स्थान नहीं रखता कि जिस तिलक, चोटी, नित्य पूजा अनुष्ठान और सम्पूर्ण धर्म निष्ठा ने स्वयं उनकी अपनी कठिन साधनापूर्ण जीवन यात्रा में पग-पग पर परीक्षा ली, उनके सार्वभौम संदेश का वही आग्रह भी है । ज्ञान, साधना, अनुभव और दृष्टि की यह एकनिष्ठता उनके विरल व्यक्तित्व की विशेष पहचान बनती है ।
यहाँ नूतन और समसामयिक विषयों में से एक पर्यावरण पर श्री राजेंद्रदास की अत्यंत प्रभावी दृष्टि का उल्लेख करना आवश्यक लगता है । 5 जून 2019 को टीकमगढ़ में समायोजित  अपनी रामकथा में उन्होने विश्व पर्यावरण दिवस के संदर्भ में राम द्वारा चित्रकूट में भरत को पर्यावरण की सुरक्षा की आवश्यकता के संदेश को आधार बनाया । देवाचार्य का कहना था कि पर्यावरण में हम प्रकृति के पाँच तत्त्व – पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को ही सम्मिलित कर अपनी अपूर्ण चेष्टाओं में खो जाते हैं । उनके अनुसार गीता में भगवान श्री कृष्ण ने प्रकृति को अष्टधा कहा है । इसमें इन पाँच के अतिरिक्त मन, बुद्धि और अहंकार की भी महत्वपूर्ण स्थिति है । पूर्वोक्त पाँच जहां स्थूल प्रकृति के प्रतीक हैं वहीं उक्त तीन सूक्ष्म प्रकृति के परिचायक हैं । हम पर्यावरण की रक्षा में आज इसलिए सफल नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि हमारी वर्तमान सारी चेष्टाएँ स्थूल तत्वों के स्तर तक ही सीमित हैं । इस सिद्धान्त को हम अपने जीवन में घटित करते हुये भी अच्छी तरह से समझ सकते हैं । हमारे अपने स्वास्थ्य, रूपान्तरण और परिष्कार का कार्य केवल भौतिक स्तर पर चेष्टा करने से संपादित नहीं होता। इसके लिए यदि हम सूक्ष्म स्तरों -मन, बुद्धि और अहंकार के स्तर पर – चेष्टा करते हैं तो भौतिक स्थिति स्वत: प्रभावी रीति से परिवर्तित होती है । यही स्थित पर्यावरण में सुधार को लेकर भी ध्यान में दी जाना आवश्यक है । यदि आज की मानवीय चेतना के धरातल पर भारतीय विज्ञान के इस सिद्धान्त और दर्शन को स्वीकार कर लिया जाता है तो इतने विश्व व्यापी चिंता के प्रश्न पर हमें आसान और स्थाई समाधान प्राप्त हो सकता है । 
यह कोई आश्चर्य नहीं कि जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी इस विभूति को देश के राष्ट्रपति के द्वारा अपने विश्वविद्यालय से डी लिट उपाधि प्रदान करते हैं, ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वरूपानन्द जन्मदिन की शुभकामना मलूक पीठ पहुँचकर प्रदान करते हैं तथा इनकी जन्मस्थली समारोह में अचर्रा पहुँचकर पुरी पीठाधीश्वर श्री निश्चलानन्द जी महाराज कहते हैं - मैं इन पर लट्टू इसलिए हूँ क्योंकि ये ज्ञान के पुंज होने के साथ ही साथ साधुत्व की पराकाष्ठा हैं । रामकथाकार मुरारी बापू इनके आमंत्रण पर रामधाम ओरछा में कथा करते हैं, नृत्यगोपालदास अयोध्या में रामकथा सुनते हैं तथा रेवतीरमण, पथमेड़ा महाराज, श्री मृदुलकृष्ण गोस्वामी, श्री कृष्णचन्द्र शास्त्री ठाकुर जी, बाबा रामदेव आदि इनके परम प्रशंसक हैं ।
अध्यक्ष, महर्षि अगस्त्य वैदिक संस्थानम्, 35 ईडन गार्डन, चूनाभट्टी, कोलार रोड भोपाल (9425079072)