Sunday, 25 August 2019

रामकथाकार श्री राजेंद्रदास जी देवाचार्य

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श्रंखला-रामकथाकार 
साधुत्व और शास्त्र के सुमेरु : श्री राजेंद्रदास जी देवाचार्य

महाराजश्री मलूकपीठाधीश : एक परिचय
भारतवर्ष के प्रदेशों में मध्यप्रदेश व उसका एक क्षेत्र बुंदेलखंड। वहाँ के एक जनपद टीकमगढ़ का एक ग्रामविशेष अचर्रा। पूर्वकाल से ही आचार्यों – सदाचारी वैदिक विप्रों के आवास स्थान का नाम आचार्य शब्द से अचर्रा हो गया। भद्र भाद्रमास जिसमें अवतारी लीला पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण का प्राकट्य होता है, उसी मास की शुक्ल पक्ष पंचमी को ऋषि पंचमी कहते हैं । उस पवित्र तिथि में हमारे पूज्यपाद श्रीमहाराजजी का आविर्भाव सत्परायणा पुण्यसंस्कारशीला माता श्रीमती बृजलता देवीजी की दक्षिण कुक्षि से हुआ । आपके पिता पण्डित श्रीरामस्वरूप पाण्डेय जी वंश परम्परानुसार अति संस्कारी, पुण्यात्मा, सदाचारी, नैष्ठिक धर्मप्राण विद्वान महानुभाव हैं । वैदिक सनातन पद्धति से जातकर्मादि संस्कार सम्पन्न होने के पश्चात विहित दिवस में विधि-विधान पूर्वक श्रीमहाराजजी का जन्म-लक्षणादि के अनुसार नामकरण संस्कार सम्पन्न हुआ। तदनुसार आपका जन्म नाम श्रीराजेंद्र नारायण पाण्डेय हुआ। सुजनश्रेष्ठ सद्गुरु श्रीगणेशदास जी भक्तमाली जी के समर्थ दिव्याशीष से सरलात्मा दंपति श्रीमती बृजलता देवीजी तथा पण्डित श्रीरामस्वरूप पाण्डेय जी नामक माता पिता से भारद्वाज गोत्र पाण्डेय विप्रवंश में भाद्रपद शुक्ल पक्ष पंचमी, ऋषि तिथि को एक तेजस्वी बालक का प्राकट्य हुआ जो नामकरण संस्कार से आयुष्मान राजेंद्र नारायण संज्ञाव।न हुए।
यथा आपके सदगुरुदेव श्रीभक्तमालीजी अपने बचपन में केवल संस्कृत पढ़ने हेतु दो बार चुपके से घर से भाग गए। पहली बार तो वे असफल हुए किंतु दूसरी बार दो तीन साथियों के साथ वे अपने गाँव कुर्सी (नैमिष क्षेत्र) से पैदल वाराणसी आ गए। उसी तरह पाँचवी-छठी कक्षा पढ़ते पढ़ते ग्रामीण विद्यालय में घटना विशेष के कारण विरक्त हो गए। तथा आपने पिताजी से कह दिया कि ‘अब मैं वहाँ पढ़ने नहीं जाऊँगा’। इस स्थिति से आपके पण्डित पिताश्री तथा सम्पूर्ण परिवार अति चिंतित हो गए । किंतु श्रीहरि कृपा से उसी समय वृंदावन से सदगुरुदेव महाराज का पदार्पण हुआ और सारी स्थिति जानकर उन्होंने झट से समाधान किया। 
इससे पूर्व ग्राम निवास की अवधि में भी लगभग एक वर्ष के लिए प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद स्वामी श्रीशरणानंद सरस्वती जी महाराज का पावन सानिध्य प्राप्त हुआ। पूज्य स्वामीजी जगद्गुरु शंकराचार्य ज्योतिषपीठाधीश्वर श्रीब्रह्मानंद सरस्वतीजी महाराज के शिष्य तथा धर्म-सम्राट स्वामी श्रीकरपात्रीजी महाराज के छोटे गुरु-भ्राता थे। पूज्यपाद श्रीशरणानंदजी सन्यास धर्म में पूर्ण परिनिष्ठित एवं कंचन कामिनी के स्पर्श से सर्वथा विमुक्त एक सर्वसंतप्रशस्त महापुरुष थे। 
वहीं अपने शरणागत नव बाल शिष्य को उन्होंने वैष्णवी दीक्षा प्रदान कर विधिवत संस्कार किया। संस्कृत शास्त्र अध्ययन वृंदावन में इनका आरम्भ करवाया। कालांतर में आपके गुरुदेव श्रीगणेशदास भक्तमालीजी ने आपको निकटस्थ खाक चौक के योगिराज सिद्ध सन्त श्रीदेवदास जी महाराज से विरक्त दीक्षा दिलवाई। संस्कारी वैष्णव अध्ययनशील श्रीराजेंद्रदास जी ने क्रमशः नव्य व्याकरण, विशिष्टाद्वैत वेदांत दर्शन तथा साहित्य-शास्त्र में आचार्यत्व उपाधि अर्जित की तथा अनुसंधान कार्य सम्पन्न कर विद्या वाचस्पति (D.Litt) की उपाधि भी प्राप्त की।
(मलूक पीठ की वेबसाइट से साभार)
  
जब मैंने पूज्यवर देवाचार्य से तुलसी मानस भवन, भोपाल में ‘रामकथा’ पर व्याख्यान हेतु पधारने का अनुरोध किया तो उन्होने अपने सर्वज्ञात विनम्र भाव में प्रथमत: यही कहा ‘जैसा कि भी आपने कहा है, जहां पूज्य रामकिंकर जी उपाध्याय, राजेश्वरानंद जी महाराज और देवी मंदाकिनी आदि पधारते रहे हैं वहाँ मेरे जैसे रामकथा न कह पाने वाले व्यक्ति का क्या स्थान हो सकता है?’
तब मेरा कहना था कि वाल्मीकि रामायण के इस श्लोक को आपके संदर्भ से मैंने नोट कर रखा है तथा आपकी अपेक्षा के अनुरूप इसके अभिज्ञान के लिए मैं इसे जहां तहां साझा कर रहा हूँ -
‘यश्च रामं न पश्येत्तु यं च रामं न पश्यति
निंदित: सर्वलोकेषु स्वात्माप्येनं विगर्हति । (वाल्मीकि रामायण 2/17/14)
अर्थात जिसने राम को नहीं देखा-जाना और राम ने जिसे नहीं देखा (कृपा दृष्टि से ) वे दोनों तो सर्वत्र निंदा के ही योग्य हैं । उनकी अंतरात्मा उन्हें सदा धिक्कारती ही है !  
देश के शीर्ष शास्त्रज्ञ और वाल्मीकि रामायण के अप्रतिम प्रस्तोता के रूप में आपसे सुने इस कथन कि वाल्मीकि रामायण के इस श्लोक को भारत के घर-घर द्वार पर लिखा जाना चाहिए, क्या सुनकर कोई भुला सकता है ?’  
यह सही है कि देवाचार्य जी के प्रधान प्रियतर विषय भक्तमाल, श्रीमद्भागवत और गोसंरक्षण आदि हैं, किन्तु भारतीय मनीषा का कोई भी विषय उनसे छूटा नहीं है तथा उनकी अनवरत नित्य अध्ययवसायिता उन्हें शास्त्र ज्ञान की सर्वोच्च अधिकारिता प्रदान करती है । यहाँ चूंकि मूल संदर्भ ‘रामकथाकार’ का है, अत: इस सम्बन्ध में उनका इसी रूप में परिचय मेरा प्रकट अभिप्रेत है ।  
कुछ समय पूर्व देवाचार्य ने रामकथा की वेद के प्रत्यक्ष उपब्रह्मण के रूप में अद्भुद व्याख्या की । उनका कहना था कि दशरथ जी के पिता अज थे । ‘अज’ को हम जानते हैं, यह ब्रह्मा जी का नाम है। जिस प्रकार वेद ब्रह्मा के निश्वास हैं, उसी प्रकार दशरथ अज महाराज के आत्मज हैं । गोस्वामी तुलसीदास मानस में उनका यही परिचय देते हैं –
‘अवधपुरी रघुकुलमनि राऊ । बेद विदित बिदित तेहि दसरथ नाऊ ॥‘
जब हम वेद के कथ्य भाग पर आते हैं तो स्पष्ट होता है कि वेद में ज्ञान, उपासना और कर्म – तीन मुख्य प्रभाग हैं । दशरथ जी की तीन महारानियाँ- कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी इन्हीं तीन भूमिकाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं । और जहां तक राम, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न का संबंध है, उनके विषय में गोस्वामी तुलसीदास का यही कहना है – ‘बेद तत्व नृप सुत तव चारी’ (मानस 1/98) । वे मनुष्य के पुरुषार्थ चतुष्टय- मोक्ष, धर्म, धन और काम के प्रतीक हैं । अपनी इस व्यवस्था में महाराज जी विस्तृत व्याख्या पूर्वक यह भी समझाते हैं कि पुरुषार्थ का क्रम प्रचलित रीति -धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष’ के स्थान पर पूर्वोक्त क्रम में ही रखे जाने योग्य है । वास्तव में ‘काम’ से मोक्ष का क्रम तो असंगत है ही, ‘अर्थ’ से भी मोक्ष की प्राप्ति की कल्पना नहीं की जा सकती है । महाराज श्री की स्थापना है कि ‘काम’, अर्थात कामना, इच्छा, अभीप्सा और जीवनाकांक्षा प्रथम पुरुषार्थ है जो संसार में मानव की यात्रा का सर्वथा प्रथम पग  है । इस पुरुषार्थ साधन से मनुष्य अर्थ अर्थात उपकरण, साधन और उपादान तथा धन (अर्थ) संचित करता है । धन की सर्वोत्तम गति दान है जो एक सच्चे पुरुषार्थी को धर्म पथ पर पहुँचाती है । और यही मनुष्य के लिए मोक्ष का द्वार खोलता है ।
आदिकवि वाल्मीकि के ‘शोक से श्लोक’ उत्पन्न होने के लोक विश्रुत सिद्धान्त पर ‘मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगम: शाश्वती समा:/ यत्क्रोंचमिथुनाद्मेकमवधी काममोहितम्’ की देवाचार्य जी व्याख्या अद्भुद हैं । उनके अनुसार इस एक श्लोक मात्र में रामायण के सातों कांडों की कथा का समाहार उपलब्ध हो जाता है । वाल्मीकि जैसे द्रष्टा महाकवि की काव्य प्रक्रिया को एक लोक सरलीकृत धारणा में देखना कदापि उचित नहीं है । यहाँ ऋषि की अंतर्दृष्टि किसी काल या घटना सापेक्ष न होकर वेदानुकूल सृष्टि की रचना और विस्तार क्रम की ही प्रतिपादक है ।     
‘भक्ति भक्त भगवंत गुरु चतुर्नाम हैं एक /इनके पद बंदन किए नासहिं विघ्न अनेक’ की भक्तिमाली धारा में ज्ञान, उपासना और सनातन भारतीय जीवन दर्शन का सर्वांगीण समाहार हो सकता है, यह राजेंद्रदास जी की कथा सुनकर ही समझ आता है । हिन्दी साहित्य की संत परंपरा के मध्ययुगीन भक्त कवियों को नाभादास जी की दृष्टि में पिरोकर राष्ट्र के सांस्कृतिक परिष्कार का एक महत्तर प्रयोजन साधा जा सकता है, यह संकल्पना राजेंद्रदास जैसे उक्त परंपरा के वर्तमान और सनातन संस्करण की ही हो सकती है । उन्हें सुनते हुये  मलूकदासजी के संबंध में लोक प्रचलित निश्चेष्टा ( अजगर करें न चाकरी पंछी करें न काम। दास मलूका कहि गए सबके दाता राम) के सिद्धान्त का तो निवारण होता ही है, भक्त रैदास द्वारा काशिराज की उपस्थिति में काशी के पंडितों की पराजय का तुमुलनाद भी सुना जा सकता है ! प्रियादास जी के किसी एक पद को लेकर जब राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात या मध्यदेश के किसी संत के संबंध में किन्हीं चार पंक्तियों पर उनकी कथा का एक सम्पूर्ण सप्ताह (पाँच घंटे प्रतिदिन की अबाध कथा धारा में) अपर्याप्त हो जाता हो तो वाल्मीकि या तुलसी की रामायण की कथा के आरंभ और विश्रांति की सीमा रेखा ही खोजना निरर्थक है ।
राजेन्द्र दास जी स्वर, संगीत, गान, सम्बोधन, उद्बोधन, प्रबोधन और संयोजन की अपार क्षमता रखते हैं । जहां कुछ कथा वाचकों के साथ काफी बड़ी संख्या में – लगभग एक गाँव जैसा – अनुयायी वर्ग चलता है, वैसे ही देवाचार्य जी के साथ विरक्त साधु, महात्माओं और संस्कारवान ग्रहस्थों की जमात चला करती है । यहाँ यह अनुमान किया जा सकता है कि इतनी संख्या के श्रोता मात्र श्रद्धाबश केवल पाठ पुनरावृत्ति के लिए प्रेरित होकर उपस्थित नहीं हो सकते हैं । इन श्रोताओं के लिए निश्चित ही यह आश्चर्य का विषय होगा कि उनसे आयु में इतने कनिष्ठ  (महाराजश्री का जन्म वर्ष 1971 है) इस वक्ता के पास इतने शास्त्र, साधना, अध्यवसाय और सत्संग से इतने अल्पकाल में उपार्जित यह अतुलनीय संपदा दैवी प्रसाद ही हो सकती है ।  
इस अवसर पर मुझे श्री राजेंद्रदास जी के पूर्व आश्रम के पूज्य पिता श्री रामस्वरूप दास जी पाण्डेय की एक पुस्तक की समीक्षा करते हुये लिखी अपनी निम्न पंक्तियों का स्मरण आ रहा है –
‘यह महज संयोग ही नहीं है कि श्री रामस्वरूप दास जी पांडे मलूक पीठाधीश्वर राजेंद्रदासजी देवाचार्य के पूर्व आश्रम के पिताश्री हैं।  श्री राजेन्द्र दासजी वर्तमान समय के देश के शीर्षतम शास्त्रवेत्ता साधु हैं।  विद्वता की उनकी पराकाष्ठा अतुलनीय है।  जिस प्रकार कपिल महाराज से देवहूति और ऋषि कर्दम धन्यता को प्राप्त हुए वही भाग्य श्री पांडेजी का भी है।  राजेंद्रदासजी अपने विश्वव्यापी स्वर संधान से गोरक्षा के जिस अप्रतिम संकल्प साधन में निरत हैं, वह उनकी सनातन भारतीय भूमिका को पुनराख्यापित करता है ।‘
देवाचार्य जी की रामकथा का वह प्रसंग जब राम ‘निश्चर वध’ की दृढ़ प्रतिज्ञा करते हैं, प्रकारांतर से अनेक बार उभरता है । रामचरित मानस में तो इसकी पृष्ठभूमि में तुलसीदास जी ने राम का राक्षसों के द्वारा मारे गए मुनियों के ‘अस्थि समूह’ देखना बताया है । वाल्मीकि की सीता राम की इस दृढ़ प्रतिज्ञा पर औचित्य का प्रश्न उत्पन्न करती हैं । उनका कहना है कि निश्चरों ने राम का कुछ अहित नहीं किया है, उनसे उनकी कोई शत्रुता भी नहीं है, अत; राम जैसे धर्मज्ञ और नीतिवान को अकारण उनके विनाश की प्रतिज्ञा करना कहाँ तक सही है ? वाल्मीकि जी के राम इस सम्बन्ध में इतने दृढ़ प्रतिज्ञ हैं कि इसके कारण को लेकर तो वे सीता और लक्ष्मण का भी परित्याग कर सकते हैं –
अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम्
न तु प्रतिज्ञां सन्श्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषत: ।
आशय यह कि ब्राह्मणों के प्रति की गई प्रतिज्ञा राम के लिए अपरिहार्य है । सारत: ब्राह्मण, गाय और सनातन धर्म के सिद्धान्त और दर्शन का विधि और निषेध रीति से पूरी तरह से परिपालन देवाचार्य का स्थिर संदेश है । यह प्रश्न उठाया जा सकता है कि शास्त्रों की भी अनेकश: व्याख्या हुई है तथा आधुनिक संदर्भों में समाज को पश्चिम की वैज्ञानिक शिक्षा और संदेश को भी ध्यान में रखना विधेय हो सकता है । किन्तु साधु परंपरा, सनातन शास्त्र दर्शन और भारतीय जीवन दृष्टि में आकंठ निमग्न मलूक पीठाधीश्वर से भिन्न धारणा की अपेक्षा भी नहीं की जा सकती । इसमें यह आश्चर्य भी कोई स्थान नहीं रखता कि जिस तिलक, चोटी, नित्य पूजा अनुष्ठान और सम्पूर्ण धर्म निष्ठा ने स्वयं उनकी अपनी कठिन साधनापूर्ण जीवन यात्रा में पग-पग पर परीक्षा ली, उनके सार्वभौम संदेश का वही आग्रह भी है । ज्ञान, साधना, अनुभव और दृष्टि की यह एकनिष्ठता उनके विरल व्यक्तित्व की विशेष पहचान बनती है ।
यहाँ नूतन और समसामयिक विषयों में से एक पर्यावरण पर श्री राजेंद्रदास की अत्यंत प्रभावी दृष्टि का उल्लेख करना आवश्यक लगता है । 5 जून 2019 को टीकमगढ़ में समायोजित  अपनी रामकथा में उन्होने विश्व पर्यावरण दिवस के संदर्भ में राम द्वारा चित्रकूट में भरत को पर्यावरण की सुरक्षा की आवश्यकता के संदेश को आधार बनाया । देवाचार्य का कहना था कि पर्यावरण में हम प्रकृति के पाँच तत्त्व – पृथिवी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को ही सम्मिलित कर अपनी अपूर्ण चेष्टाओं में खो जाते हैं । उनके अनुसार गीता में भगवान श्री कृष्ण ने प्रकृति को ‘अष्टधा’ कहा है । इसमें इन पाँच के अतिरिक्त मन, बुद्धि और अहंकार की भी महत्वपूर्ण स्थिति है । पूर्वोक्त पाँच जहां स्थूल प्रकृति के प्रतीक हैं वहीं उक्त तीन सूक्ष्म प्रकृति के परिचायक हैं । हम पर्यावरण की रक्षा में आज इसलिए सफल नहीं हो पा रहे हैं क्योंकि हमारी वर्तमान सारी चेष्टाएँ स्थूल तत्वों के स्तर तक ही सीमित हैं । इस सिद्धान्त को हम अपने जीवन में घटित करते हुये भी अच्छी तरह से समझ सकते हैं । हमारे अपने स्वास्थ्य, रूपान्तरण और परिष्कार का कार्य केवल भौतिक स्तर पर चेष्टा करने से संपादित नहीं होता। इसके लिए यदि हम सूक्ष्म स्तरों -मन, बुद्धि और अहंकार के स्तर पर – चेष्टा करते हैं तो भौतिक स्थिति स्वत: प्रभावी रीति से परिवर्तित होती है । यही स्थित पर्यावरण में सुधार को लेकर भी ध्यान में दी जाना आवश्यक है । यदि आज की मानवीय चेतना के धरातल पर भारतीय विज्ञान के इस सिद्धान्त और दर्शन को स्वीकार कर लिया जाता है तो इतने विश्व व्यापी चिंता के प्रश्न पर हमें आसान और स्थाई समाधान प्राप्त हो सकता है । 
यह कोई आश्चर्य नहीं कि जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी इस विभूति को देश के राष्ट्रपति के द्वारा अपने विश्वविद्यालय से डी लिट उपाधि प्रदान करते हैं, ज्योतिष्पीठाधीश्वर स्वरूपानन्द जन्मदिन की शुभकामना मलूक पीठ पहुँचकर प्रदान करते हैं तथा इनकी जन्मस्थली समारोह में अचर्रा पहुँचकर पुरी पीठाधीश्वर श्री निश्चलानन्द जी महाराज कहते हैं - मैं इन पर लट्टू इसलिए हूँ क्योंकि ये ज्ञान के पुंज होने के साथ ही साथ साधुत्व की पराकाष्ठा हैं । रामकथाकार मुरारी बापू इनके आमंत्रण पर रामधाम ओरछा में कथा करते हैं, नृत्यगोपालदास अयोध्या में रामकथा सुनते हैं तथा रेवतीरमण, पथमेड़ा महाराज, श्री मृदुलकृष्ण गोस्वामी, श्री कृष्णचन्द्र शास्त्री ठाकुर जी, बाबा रामदेव आदि इनके परम प्रशंसक हैं ।
अध्यक्ष, महर्षि अगस्त्य वैदिक संस्थानम्, 35 ईडन गार्डन, चूनाभट्टी, कोलार रोड भोपाल (9425079072)  

Tuesday, 21 May 2019

ऋतम्भरा




भूमिका





                             ऋतंभरा

कविता मनुष्य की तीसरी आँख है –  कल्याण की विधात्री (शिवेतरक्षतये- मम्मट) और परादर्शी (ऋतंभरा प्रज्ञा -योगदर्शन)। आचार्य मम्मट ने काव्य के प्रयोजनों पर चर्चा करते हुये इसे लोक कल्याण का विधायक इसीलिए कहा है क्योंकि शिव का तीसरा नेत्र अनिष्ट का शमन करने की सर्वाधिक सामर्थ्य तो रखता ही है, इसकी महत्ता इसकी वह परादृष्टि ही है जिसे योगदर्शन में महर्षि पतंजलि ‘ऋतंभरा प्रज्ञा’ से उपहित करते हैं । ऋत, अर्थात सर्वथा सम्पूर्ण सत्य, प्रकृति के सार्वभौम सिद्धान्त की तरह अपरिहार्य । योग के अनुसार आज्ञा चक्र में स्थित यह ‘आँख’ सदाशिव की प्रत्यक्षानुभूति ही है । इस प्रकार संसार और समाज में विचरण करने वाले मनुष्यों में अतिविशेष की यह पहचान उस व्यक्ति के आत्मसाक्षात्कार के वृत्त से किसी प्रकार कम नहीं है ।

अनीता श्रीवास्तव की ‘जीवन वीणा’ काव्यकृति कुछ ऐसी ही साधना और सिद्धि का परिणाम होगी, ऐसा मेरा अनुमान कहता है । जीवन को वीणा मानकर चलने वाले साधना के पथिक की सबसे बड़ी चुनौती इस ‘असाध्य’ को साधने जैसी ही है । इसके सदा कंपित रहने वाले तारों को तो उसे संभाले रखना है ही, इनकी मौन झंकार की भी उसे अनदेखी नहीं करनी है । अस्तु यह कोई स्वप्न का जागरण न होकर जागरण का ही स्वप्न है- सुषुप्ति और तुरीय अवस्थाओं के परे, जैसा कि यजुर्वेद के द्रष्टा कवि का उद्घोष है –

‘जागरण में दूर जाता जो बहुत

और उतना ही चला करता जब हम सुप्त होते

ज्योंतियों की ज्योति जो है एक

मेरा मन !

सदा शिव संकल्पकारी हो ।“

(तन्मे मन: शिव संकलमस्तु )

अपने ‘प्यारे पापा’ की स्मृति को समर्पित इस संग्रह की कविताओं का केंद्रीय स्वर कवयित्री की गहन आंतरिक संवेदनाओं को सिलसिलेवार आकार देता जैसे उस रिक्ति की पूर्ति में ही सचेष्ट है जिसकी चुनौती उसने स्वीकार कर उसे पाट देने की प्रतिज्ञा ले रखी है । इसलिए जब वह अपने पापा को अपने में ‘जिंदा’ देखती है तो उसका यह तर्क अकाट्य हो जाता है –

“मेरे चेहरे में चेहरा उनका

मेरे बोली में लहजा उनका

मेरे आँखों में उनकी चितवन”

और जब इस निरंतरता को झंकार भी मिल रही हो –

“जीवन-वीणा के तारों को सुर की साध लिए कसती हो

लाड़ डांट व ठाट लिए तुम घर के हर कोने बसती हो

माँ तुम अपने आप बसाई भरी-भरी पूरी बस्ती हो !”

यह बहुत विचारणीय है कि स्मृति का यह विस्तार जब स्थूल शरीर में इतना प्रखर और परिपूर्ण है- पीड़ी दर पीड़ी और इस तरह वास्तव में सनातन तौर पर ही – तो मन के सूक्ष्म तंतुओं में उसकी मौजूदगी कितनी मौजूं नहीं होगी !

अपने पति और परिवार के सरोकारों के अतिरिक्त अनीता समाज, राष्ट्र, भाषा, बच्चों और सभी सम सामयिकताओं की पूरी खबर रखती हैं । इनके प्रति उनकी कवि दृष्टि की आवश्यक संवेदना तो है ही, उसमें समुचित तटस्थता, पैनापन और विषमताओं का योग्य समाधान भी है, जिसके लिए मैं उन्हें बधाई देना चाहता हूँ।  

मैं साहित्य और सुधी समाज द्वारा इस रचना के सम्यक समादर की अभीप्सा करता हूँ ।



प्रभुदयाल मिश्र, अध्यक्ष महर्षि अगस्त्य वैदिक संस्थानम्,

उपाध्यक्ष, मध्य प्रदेश लेखक संघ, भोपाल      

(भोपाल, 22 मई 2019)           

           

Saturday, 4 March 2017

संतोष चौबे की 'अकवि समय' पुस्तक की समीक्षा

समीक्षा- इस अकवि समय में/संतोष चैबे/मेधा बुक्स दिल्ली
       एक असंवेदी युग में कवित्व की संभावनाओं का उद्घोष
                                                   प्रभुदयाल मिश्र

        श्री संतोष चैबे की काव्य कृति इस अ-कवि समय में कविता की उस सार्वभौम शक्ति की उद्घोषणा है जो वस्तुतः काल को उसके अस्तित्व का बोध कराती है । अर्थात् कविता के लिए कवि को भाव अथवा भूमिका की तलाश में भटकने की आवश्यकता नहीं रहती । वह भी ठीक आदमी की आत्मा अथवा ब्रह्म की ही भाँति (तेरा साईं तुज्झ में कहना कुछ और भी निकट होगा) उसके बहुत ही करीब लगातार उसके साथ ही चलती रहती है । श्री चौबे को बखूबी उसकी अच्छी पहचान है । अतः वे समय को चुनौती देने में जैसे समर्थ हैं ।
        यूं श्री संतोष यह बखूबी समझते हैं कि कम से कम दुनियां के दूसरे लोगों के वास्ते ही सही, उन्हें समय का चुनाव कर लेना चाहिए । जाहिर है इसके लिए पहले उन्हें ऐसी तमाम स्थितियों का मुआयना कर लेना होगा जो उनके चैतन्य न रह पाने से उनके विरोध में खड़ी हो जाती हैं । इसके लिए वे अपने में अतीन्द्रिय सामर्थ्य भी खोजने लगते हैं-
 इतना हल्का /कि उड़ सकूं/पूरे आकाश में
 इतना पवित्र/कि जुड़ सकूं/पूरी पृथ्वी से
इतना विशाल /कि समेट लूं /पूरा विश्व अपने में -पृ.14/15
    अब प्रश्न यही रहता है कि इस कवि की कविता उसे कितने दूर ले जाती है/ले गई है-
फिसलते /नेत्र फिसलते दृष्य/फिसलती /गति फिसलते सत्य
आदमी /की नीयत में खोट
सतह /के नीचे के विस्फोट- पृ. 92
-कोई सीमा नहीं है, कोई हद नहीं है । वह कहीं भी/किधर को भी चल पड़ता है । यह हद यदि अपने आपको बचा रखती है, तो बचाले,  कवि तो कितनी भी लम्बी रेखा खींच लेने का माद्दा रखता है !

  अच्छा हो समय को दी गई इस चुनौती को हम समय के सुपुर्द कर यह प्रतीक्षा करें कि कल -(- करीब एक चौथाई दशक का समय) कवि को क्या जबाब लेकर आता है!                                                                                        35, ईडन गार्डन, भोपाल, १६ 

Thursday, 16 February 2017

सत्यं परं धीमहि

कृति -  शाश्वत सत्य /रचनाकार – रामनिवास खंडेलवाल
सम्पादन- डा. स्वाति तिवारी/प्रकाशन- परम्परा प्रकाशन, साईं कृपा कोलोनी, इंदौर  
                      सत्यं परं धीमहि
                                  प्रभुदयाल मिश्र
श्री रामनिवास खंडेलवाल द्वारा अपने प्रियजनों को लिखे शताधिक पत्रों से सुप्रसिद्ध लेखिका डा. स्वाति तिवारी ‘शाश्वत सत्य’ का साक्षात्कार करते हुए उसे इस कृति के पाठकों को भी परिचित कराते हुए चुनौतीपूर्ण कार्य किया है. इस तरह का महान संकल्प द्वापर युग में भागवत की रचना करते हुए भगवान् वेदव्यास ही कभी सामने लेकर आये थे जिन्होंने इस महापुराण के आरम्भ में यह प्रतिज्ञा कथन किया कि मैं ‘परम सत्य के अनुसंधान में प्रवृत्त हुआ हूँ – सत्यं परम धीमहि ! यहाँ प्रश्न यह उठता है कि परम अर्थात शाश्वत सत्य के साक्षात्कार की विधा क्या हो सकती है – ध्यान, तप, उपासना, कविता या कि पत्र ? इस सम्बन्ध में सामान्य सहमति न भी बने तब भी यह कहा जा सकता है कि एक विशुद्ध रचनाधर्मिता निश्चित ही इस महत कार्य की भूमिका हो सकती है. और स्वातिजी की स्वधर्मिता जब इसका साक्ष्य दे रही होती है तो इस पर संदेह की गुंजायश प्रायः नहीं बचती.
‘शब्दों’ के शिलालेख’, ‘विद्वानों की बात’, ‘ज्ञानवाणी’, ’जीवन अनंत है’ और ‘किताबें’ आदि संश्लिष्ट शीर्षों में पिरोये इन पत्रों के सार भाग को ही संग्रहीत किया गया है. दुनिया की अनेक भाषाओं में पत्र शैली में कालजयी कथा साहित्य, उपन्यास और संस्मरण साहित्य की रचना हुई है. किन्तु इन्हें पढ़ते हुए पाठक जैसे इस मूलभूत अविश्वास को सदा दवाकर रखता है कि ये पत्र वास्तव में तो नहीं ही लिखे गए हैं तथा यह कि वे केवल कल्पना की उड़ान भर हैं. किन्तु यहाँ वैसा बिलकुल नहीं है. इन पत्रों के लेखक श्री खंडेलवाल का आत्मसंघर्ष, जिजीविषा और अपने प्रियजनों- विशेषकर पुत्री और दौहित्र आदि के कल्याण का भाव लेखक को लेकर उत्कृष्ट पारिवारिक, सामाजिक, संस्कृत और लोक चेतना का परिचायक है.
वर्तमान युग में मुद्रण, प्रकाशन और संचार के साधन सुगमता से उपलब्ध हैं. यदि आज के रामनिवास खंडेलवाल अपने पूर्वोक्त दायित्व के भाव को लेकर चलते हैं तो वे, ट्वीटर, फेसबुक, इन्स्ताग्राम,जीप्लस,लिंक्डइन,व्हात्सप आदि नाना माध्यमों को साधकर भी इतना लिख और प्रकाशित नहीं करा सकते थे. आज के माध्यमों की सीमा यह है कि संक्षेप और सीमा की शर्त उसमें रचनाधर्मी को पंख फैलाने की फुर्सत नहीं देती. इस अर्थ में यह किताब हाल में ही बीत गए उस युग की सलामती का दस्तावेज हो जाती है जो हमारे हाथ से लगातार खिसकता जा रहा है.
एक प्रश्न यह भी प्रायः उठता है कि ‘शब्दों के ये शिलालेख’ इतिहास – साहित्य, संवाद, परिवार, समाज और संस्कृति की धारा में कितनी दूर तलक ठहरेंगे ? यह बहुत ही स्वाभाविक है कि यह ललक शब्द शिल्पी में ही नहीं, प्रत्येक व्यक्ति में ही होती है कि वह स्वयं न होते हुए भी अपने शब्द, क्रिया और सम्बन्ध की भूमिका में बहुत दूर तक जिए. किन्तु ‘कविहिं अरथ आखर बल साँचा’- एक शब्द शिल्पी, रचना कार की अपने बल की सत्यता पर निर्भरता कहीं बहुत अधिक होती है. इस पुस्तक के लोकार्पण के समय डा. स्वाति तिवारी ने शब्द ब्रह्म की सत्ता का उल्लेख किया था. गीता में ‘अक्षरं ब्रह्म परमं’ कहा गया है. तुलसीदास जी ने रामायण में ‘वर्णानाम् अर्थसंघानाम्’ की बात कही है. दार्शनिक दृष्टि से ‘शब्द’ आकाश की तन्मात्रा है. आकाश स्वयं में परम व्याप्ति है. अतः यह परम, शाश्वत सत्य ही है कि शब्द का आश्रय अपनी व्याप्ति में आकाश के समानांतर पहुंचाता है. अस्तु इति शम् .   
३५, ईडन गार्डन, चूनाभट्टी, कोलार रोड भोपाल १६ -०४२५०७९०७२             
       pdmishrabpl67@hotmail.com

Saturday, 21 January 2017

The Gita For All - Introduction

HOW THIS BOOK HAS COME TO BE WRITTEN

I have not intended any commentary or attempted exhaustive notes on either the philosophy or the teachings of the Gita after the manner of the philosophers and scholars of India and abroad. This book has just come up strangely from a small Sanskrit text which I carried with me during my visit in the summer 1989 to the erstwhile USSR, where, to my knowledge and understanding, talking about God or religion would have been an offense. I was not even confident enough there while sharing in a closed room the unsuppressed enthusiasm of a Tajik gentleman Hakim Shah who wondered if people would some day move in the streets of Dushanbey, the Capital of Tajikistan (A Republic of the then USSR), chanting ‘Hare Krishna’. It was, therefore, not a surprise to me that I was asked to put down the ‘Message of the Gita on Yoga in Everyday Life’ for the local newspapers after lecturing on different aspects of Yoga at the ‘Iroda’ Yoga Centre there. It was during the course of these lectures that I was required to give a detailed background of the Indian Yoga system and the practices advocated by various exponents of it through the ages. I believe, a quotation from an article published in ‘Communist Tajikistan’ (a Russian daily of Tajikistan) would be of quite some interest for the readers:
“YOGA is one of the six systems of Indian philosophy.1 According to these ancient systems and theories, Indian seers of past have tried to explain the purpose of life, the world and the overall design of God and nature. Yoga, among them, lays much greater emphasis on human capabilities. According to it, it is not important whether there is a God or not, but it is desirable that a man realizes his potential in accordance with his conception of Godhood. The founder of this science was PATANJALI whose theory has been propounded in his famous work YOGADARSHANA (The Science of Yoga).2 Yogadarshana explains in detail that there are eight steps of yoga practice. They are YAMA (mental discipline), NIYAMA (adherence to certain rules), ASANA (physical postures ), PRANAYAMA (breathing exercises), PRATYAHARA (making mind introspective), DHARANA (contempolation), Dhyana (mediation) and SAMADHI (realization). In brief, physical and mental preparation is necessary for one to tread the higher paths of YOGA.
Another famous exponent of the Yoga system is Lord Krishna. Krishna’s classic conversation with his friend and disciple Arjuna is recorded in a unique book called the BHAGVAT GITA. Krishna does not talk much about theories in it since Arjuna is facing a mighty army in the battlefield and he wishes to have an immediate and practical solution of his doubts concerning the propriety of killing his close relatives assembled in the battlefield. Krishna first explains that every living being has an immortal and a mortal part and to believe him to be dying is a mistaken notion. He further points out to Arjuna that when a man becomes yogi his actions are transformed into KARMAYOGA (skilled actions). In such actions there is invariably such an added efficiency that they do not follow the causal sequence.
This science of yoga remained confined to the monks and mendicants for centuries. It is now a highly acclaimed feature of modern advanced age and the peoples’ conscience all over the world is all influenced by it now. Tilak and Mahatma Gandhi were first such modern Indians who put this knowledge into practice for the liberation of India from the British Rule. In 1893, Swami Vivekananda startled the whole world by demonstrating the splendor of Yoga in the Parliament of World Religions in Chicago (USA). His teachings of Rajayoga have been immensely popular ever since. There are numerous institutions run after his teachings of Yoga. They, are rendering many constructive humanitarian services to the society in India and abroad.
Broadly, yoga in India has two main branches: Hatha Yoga (Yoga of physical exercises) and Dhyana Yoga (the Yoga of meditation). Further divisions like Bhakti Yoga (the Yoga of devotion), Karma Yoga (the Yoga of action), Gyana Yoga (the Yoga of knowledge), and Rajayoga (Yoga the  Supreme ), fall under the second category. I had accompanied Maharshi Mahesh Yogi during 1968-69 to All India Institute of Medical Sciences, New Delhi, when experiments on the efficacy of his ‘transcendental meditation’ were being conducted. According to this system, meditation effectively releases people from the stress and strain and fills them with an added energy, intelligence and happiness.
An absolutely authentic record of the  splendor  of yoga is available in the biography of Yoganand Paramhansa called ‘An Autobiography of a Yogi’. This yogi died in 1950, but his dead body was certified by eminent physicians as intact even after 24 days of his passing away. We find the first hand record of this Yogi describing how he met his teacher Yukteswara in the Regent Hotel of Bombay at 3 p.m. on 6th June, 1939, after 99 days of his departure from the world. He had a three hour long discussion with his departed guru while receiving advance courses on this science. He has provided a photograph of Mahavatara Baba also who was his great grand teacher and who, according to him is alive for more than 3500 years.
Late Shri Shivananda Saraswati of Rishikesh U.P. India, himself initially a physician, made immense contribution towards a systematic exposition of this science through many books and has a wide ranging following in India and abroad.
Yoga tends to become mystical in the course of the expansion of consciousness of a man. Yogis tell us that there is a mysterious power called Kundalini lying dormant at the base of the spinal cord in every human being. If this power is awakened and activated, a man can perform miracles by exercising conscious control over his autonomous nervous system. He can also at the same time experience extra-sensory perceptions like hearing, seeing and smelling things existing at any distance or time. Some Yogis call it the science of Shaktipata (the incidence or fall of energy from the enlightened one to the disciple). By following this system, the aspirants does not have himself to take any trouble of being effortful doing the physical exercises because they occur automatically once the dormant power of the person is awakened and put to action. Late Swami Vishnuteertha of Dewas, MP India had his disciple Swami Shivomteertha have this competence. Late Swami Muktananda of Bombay also was an acclaimed yogi of this category.
The devotional aspects and properties of yoga have been vitalized by Bhaktivedanta Prabhupada of Krishna Consciousness and Satya Sai Baba of South India. Srila Prabhupada prescribes a Mantra for chanting whose vibrations lift a person on to a transcendental plane. Sai Baba is a man of miracles. He says that the miracles are as inherent in his nature as the normal physical movements of an ordinary human being. I have myself witnessed a number of miracles while visiting him many times in his place and have experienced them several times from a distance of thousands of kilometers. I have seen many kilograms of sacred ashes falling from his empty hand while materializing also many precious objects from nowhere. The greatest of all his miracles is the universal love flowing from his person which keeps millions of people in his following. His Yogic presence is felt and experienced by thousand of people all over the world.”
It was afterwards on August 14, 1991, that I was sitting in a long queue of about 40 thousand people in Puttaparthy with this manuscript in my hand. Sai Baba walked in my direction and halted for some moments, but I could not seek his blessings for the book as I wished. My desire of dedicating it to Sai Baba in the literal sense seemed to remain unfulfilled till I had the following dream at 5 AM on 7th June, 1992 (exactly a week before I heard from my Publishers about their willingness to print the book with some modifications as per editorial screening). I am reproducing here the vivid dream from a personal note made immediately after it.
‘I am just awake from a vivid dream. It must have been exactly 5 AM at the time of my undergoing this awakened experience! - I am sitting among devotees of Sai Baba, praying for Baba to appear. He appears. Baba looks towards my direction and characteristically asks me not to talk about the approval of the book as he has been waiting for the ‘Doctors’ examination. He also mentions that there is the need to change some of the references. The devotees present there urge that the pattern of the book is flexible enough to accommodate necessary changes.
‘Baba agrees. He nods his head. He asks me if it is so. Then he asks me to give him the copy of the book. He opens the last page. He asks me if it is the first copy. I say ‘Yes, it is’. He puts his signature stating ‘The first copy signed.’
Can knowledge and action be indeed combined? Yes, Gita teaches and trains for it..
It is evidently improper to think that the Gita just teaches Yoga or Knowledge, or Action. The Gita has been an eternal source of all universal philosophies and shall continue to remain so for ever.
What is the significance of the Yoga technique which Krishna lays so much stress on and the ‘Supreme Knowledge’ which he introduces with adjectives like ‘Top most secret’, ‘Superbly sacred’, ‘Directly experienced’, ‘Righteous’, ‘Easy to practice’ and ‘Imperishable’.
                                                  राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्
             प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं  कर्तुमव्ययम् ।.( 9-2)
As a matter of fact, the technique and the science that Krishna introduces does not differ in the sense that it points out the knowledge which should form the basis of all our doings. Our actions in this manner shall stand qualified to be termed as ‘Karmayoga’. It does not, therefore, carry much meaning when the message of the Gita is construed as Yoga, or Knowledge, or Action. The Gita, in fact, has interwoven all them so uniquely that it could well be concluded to be three in one. It is thus an awareness, a constant vigil on the part of a doer which is material. Obviously, action in human life is the base and the knowledge input is the technique of skillfully performing it.
I have often said when asked that the knowledge of Bhagvad Gita is the dearest and the best gain of my life so far ‘attaining which no other acquisition seems to be greater than that”.

यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नािधकं तत: । (6-22)
Naturally, I am extremely happy to share this experience with my readers.
I have obviously not gone into every detail of the text and have confined myself to just summation at places.
I have added an appendix ‘Agniyoga’ to the book to link the traditional yoga system to the psychic phenomenon of it as seen and noticed all over the world. There are also a few notes given in the end on some relevant terms so as to bring home to the foreign readers their true meaning and significance.

P.D.Mishra
Bhopal
October 16, 1992


                                               CONTENTS

           1.THE SETTING FOR THE DISCOURSE
    2.THE PATH OF DISCRIMINATION
                              3. YOGA THROUGH ACTION
                              4. YOGA THROUGH KNOWLEDGE
                             5.RENUNCIATION OF ACTION THROUGH       KNOWLEDGE
6. YOGA THROUGH SELF CONTROL
                          7. SCIENCE OF CREATION
                          8. THE INDESTRUCTIBLE BEING
                          9. THE SUPREME SECET KNOWLEDGE
                      10. DIVINE FORMS AND SPLENDOR
                      11. THE VISION OF THE UNIVERSAL FORM
                      12. YOGA THROUGH DEVOTION
                      13. DISCRIMINATION BETWEEN THE BODY AND THE EMBODIED SELF
                     14. THE THREE MODES AND GOING BEYOND
                     15. THE SUPREME SELF
                     16. THE DIVINE AND THE DEMONIAC PROPERTIES
                     17. THREE CATEGORIES OF HUMAN BEHAVIOR
                    18. REALIZATION


   APPENDIX-1
                                                                                          “

Thursday, 29 December 2016

Foreword TO ABC; XYZ; GOD

One of the best readers ! Surely amazing and superb in its approach to the unfathomable knowledge of the Supreme Truth and Reality. I have all appreciations to Shri CB Rao for this masterpiece of deep understanding and exploration.
Basically a scientist, Mr Rao has an unshakable faith in Divine. His wisdom is all assuring and well signals a lasting reward for the awakened human race. Let us only see how long it takes a scientist to become the saint now ! It has been said that the greatness of GOD will remain ever unsung even if the ink pot earth finishes entire ocean of ink using all trees as pen writing in His praise all over the sky! I only wonder if it is a beginning of this process actually begun this way here. The manifold aspects and attributes which Mr Rao discusses in 'Titbits about GOD'  surely exhibit his deep insight of accumulated vast learning as well as the exact experience required in this direction.
I am also very much impressed by the command the author exercises in a foreign language, English. The selection of appropriate words, the precise and communicative use of the punctuations and the lucidity in expression- all mark the utmost care Mr Rao takes trying to bring home his point to the reader.
About the themes and contents of the book, I will only add that Shri Rao lays a little too much stress on the principle of Karma. This principle basically gets much related to the theory of cause and effect and the birth and rebirth idea on this earth. The Vedantic view of India is indeed the ultimate indication of Reality in true tradition of knowledge. When Gita compares death to be an other aspect of life like childhood, youth or old age, it assures that there is no break in the continuity of it by death as it is One Consciousness only ever living. Further in Chapter thirteen of it when Krishna declares that He is one Kshetragya ( cosmic soul) living in all bodies, there is no case of single outing any one  soul with any separable individual identity. We do no consider an electric bulb or a fan or a tube light having a distinct electric power to be used and reused!
Further, it may sometimes be concluded by Mr Rao's exposition that GOD being All Powerful and Competent, is the Supreme Performer. In the ninth Chapter of the Gita, Bhagwan very well explains that the nature in 'His Chairmanship performs and for no other reason than this, the world evolves'. To my mind, therefore, talking about GOD, as the Supreme Performer, may at times be misleading.
I have finished reading this book word by word amidst loud marriage ceremonial noise remaining totally undisturbed. This is perhaps because the author is silently in long persuasive conversation with his readers with all earnestness and sincerity. I wish this epoch building work a great success. 
President, Maharshi Agastya Vedic Santhanam, Bhopal 

पानी बिच मीन पियासी

कहानी खुद बोलती है

कहानी, उपन्यास और कविता की सामान्यतया कोई भूमिका नहीं होती. एक सर्जक की यह रचना अपने आप में स्वगत-कथन ही तो है ! वैसे तो एक रचनाकार जीवन को उसकी सम्पूर्णता में समझ लेने का कभी दावा ही नहीं करता दूसरे वह यह बखूबी जानता है कि वह अपनी सीमा में अंततः एकांगी ही रहेगा. अतः उसके कहे को सम्पूर्ण जीवन की प्रतिकृति मान लेने की भूल करना किसी के भी लिए उचित नहीं है. सामान्य तौर से प्रत्येक मनुष्य को यह भी लगभग बहुत साफ़ ही है कि यदि जीवन को कला से पृथक कर उसका यथातथ्य रूपांकन या चित्रण भी किया जाता है तो उसमें किसी को भी ऐसा तरतीब रेखांकन नहीं मिल सकता जो पूरी तरह से लकीरों और सीमाओं में बांधा जा सकता हो. तब भी एक रचनाकार अपनी कला साधना से एक परम चितेरे की कला का अनुगमन जरूर करते रहना चाहता है. इस प्रकार वह अवश्य ही जगत के सर्जक के निकट पहुँच कर उसके ऋण अथवा वरदान से कुछ अपनी भी छाप छोड़ रखना चाहता है ! अस्तु !
रामस्वरूप पाण्डेय की ‘जल बिच मीन पियासी’ कथा-रचना की पृष्ठभूमि में प्रकट उक्त विचार आरम्भ में ही जैसे यह पूछ रहे हैं कि क्या यह भूमिका मैं एक समीक्षक की हैसियत  में लिख रहा हूँ ? यह स्पष्ट है कि पाण्डेय जी मेरे परम आत्मीय हैं अतः स्नेहाविष्ट होकर ही वे उनकी इस मनोज्ञ कृति पर मेरी सम्मति चाह रहे हैं. इस तरह मैंने इसे आदि से अंत तक सप्रेम पढ़ा है. रचनाकार, आस्थावान और शुद्ध सनातनी विचारक श्री पाण्डेय जी के चिंतन के सभी आयाम मेरी दृष्टिपटल में सजीव विद्यमान हैं. शुद्ध कला और साहित्य का जीवन से गहरा सरोकार उनकी कलम से अनुप्राणित रहता है. इस कृति में भी सनातन भारतीय समाज, परिवार, शिक्षा और संस्कारों के पुनर्स्थापन की महत्ता जीवन के कोमल पक्षों से सुसंवेदित होकर मूर्तिवती हुई है.
किन्तु यह बात कला का यदि सम्पूर्ण उद्देश्य जीवन मानकर चला जाय तभी लागू होगी. मेरी समझ में जिस तरह कला कला के लिए अधूरी रहती है वैसे ही कला जीवन के लिए एक ध्येय लेकर चलती हुई भी अधूरी ही रहेगी. वास्तव में कला अर्थात साहित्य द्वारा कला का स्वतंत्र और जीवनोन्मुखी –दोनों ही ध्येय सिद्ध होने चाहिए. इस अर्थ में विचार करते हुए इस रचना के सम्बन्ध में कुछ प्रश्न स्वभावतः उद्भूत होते हैं. पहली बात तो यह कि साहित्य में सपाट चरित्र स्वाभाविक नहीं माने जाते. एक रचना का पात्र कोई मिट्टी का घडा नहीं होता कि उसे कुम्हार ने एक बार जैसा ढाल दिया अपने टूटने तक वह वैसा ही बना रहेगा. चरित्र विकास में मनोविज्ञान के अनुशीलन की महती आवश्यकता स्पष्ट रहती है. किस परिस्थिति में एक व्यक्ति अपने मूल चरित्र से एकदम भिन्न कब कैसा मोड़ ले लेगा, इसका पूर्वानुमान करना उसके स्वाभाविक विकास को रोक देना है. मन की यह चंचलता न केवल आज के विज्ञान का आधार है अपितु यह कृष्ण, महर्षि पतंजलि आदि भारतीय मनीषियों के चिंतन के भी केंद्र में है. इस मन या इसकी चित्तवृत्तियों के नियंत्रण के लिए सिद्ध, मुनि, साधू संत कितने पापड जीवन भर बेलकर भी ईमानदारी में यह दावा नहीं कर पाते कि उन्होंने अपने आप पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है. मन पर नियंत्रण की यह दरकार हमने इसलिए भी मान राखी है क्योंकि हमने प्रायः जीवन और संसार को स्वर्ग-नरक और अच्छे तथा  बुरे विभागों में बाँट डाला है. वास्तव में यह सरलीकरण भी मन की ही लीला है. विचित्र बात यह है कि सब कुछ करने धरने वाला यह मन साफ़ बच जाता है और वह किसी नाम और रूप को बदनामी के लिए अपने पीछे छोड़ जाता है.
सही अर्थ में एक साहित्यकार भी एक संत और सद्गुरु की भूमिका वाला होता है. जिस प्रकार संत और सद्गुरु दूसरों के दोषों के परिमार्जन में अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं वैसे ही एक साहित्यकार को भी मात्र अपने पात्रों का ही नहीं अपने चरित्रों ही जैसे सभी सामान्य लोगों के परित्राण का कार्य विधेय है. उसकी यह शुद्ध जिम्मेवारी बनती है कि वह अपने चरित्रों में प्रवेश कर उनकी कमजोरी को मानव का स्थाई भाव न बनाते हुए किसी परिस्थिति विशेष में किसी आवेग का परिणाम सिद्ध कर उसे जन्मना दोषी होने के अपराध से मुक्ति प्रदान करे. उसे एक ऐसा धर्मगुरु कतई नहीं बनना है जो आदिकाल में कभी किसी प्रथम एक के किसी एक अपराध (जो अपराध भी स्वतः प्रश्नाधीन हो) के कारण सारी मानव जाति को सदा सदा के लिए अभिशप्त घोषित करता है. यहाँ तक कि वह भारतीय दर्शन के कर्म के सिद्धांत का भी निर्णायक बनने की भूमिका नहीं ले सकता क्योंकि यह सिद्धांत भी बहुत सूक्ष्म और अविज्ञेय है. संक्षेप में एक साहित्यकार की दृष्टि में यह स्वीकार ही अभीष्ट रहता है कि बुराई यदि ईश्वर के लिए भी इतनी बड़ी बुराई होती तो वह अच्छाई के साथ इसे गूंथता ही किसलिए? यह अवश्य है कि उसने मन की गतिशीलता और चंचलता के साथ बुद्धि का संकल्प और विकल्प भी मनुष्य को दिया गया है अतः इस मामले में भगवान् को बीच में न लाकर भी विचार और विश्लेषण का काम अच्छी तरह से चल सकता है.
यह सब मैंने इसलिए लिखा क्योंकि गौरी का अपाहिज ( शराबी, मांसभक्षी और दुर्व्यसनी मात्र नहीं) पति से आबद्ध रहना, नेताजी की अंत में पोल खुल जाना और गौरी की ससुराल की संपत्ति का कानूनन उसके हक़ में फैसला हो जाना इस रचना के लेखक का कर्तव्य नहीं बनता. प्रथम तो कथा का सुखान्त कथा की कोई शर्त नहीं है दूसरे कथाकार सभी परिस्थितियों के निबटारे के लिए किसी न्यायाधीश की भूमिका में नहीं होता. प्रत्येक के जीवन में प्रायः ऐसे अप्रत्याशित मोड़ आते हैं कि वे उसे विशिष्टता प्रदान करते हैं. यह अप्रत्याशित विशिष्टता ही किसी कहानी को पढने योग्य बनाती है.
वास्तव में कहानी को अपने आप में जोर जोर से यह बोलने में समर्थ होना चाहिए कि हे प्रिय पाठक, मैं जो कह रही हूँ वह कुछ हेर फेर से तुम्हारी ही बात कह रही हूँ. तुमने भी अपने जीवन में ऐसे ही उतार चढ़ाव देखे हैं ? किन्तु तुम बहुत परेशान रहते आये हो इसलिए मैं अपनापन देकर तुम्हारा दुःख बांटने आई हूँ. तुम अब अपने आप को अपराध बोध में गाली देना बिलकुल बंद करदो. और हाँ यदि कुछ बदल सको तो बदलो नहीं तो मौके वेमौके मुझे याद भर कर लेना, हो सकता है इससे भी कुछ बात बने. अच्छा, अब मैं चली ...
पुस्तक के शीर्षक पर भी मुझे कुछ कहना और शेष रह जाता है. उपन्यास की केंद्रीय चरित्र गौरी किस पीड़ा में है ? ठीक है उसकी ससुराल में अटूट संपत्ति है तथा वह उसके उपभोग में आबद्ध नहीं है. मुकुंद उसके इतने निकट होकर भी कितनी दूर नहीं है. किन्तु क्या वह उससे प्रेम का प्रतिदान चाहती है ? और उसका एक पति भी है – अपंग, पुंसत्व हीन ! किन्तु क्या गौरी की चारित्रिक प्रष्ठभूमि उससे यह कहला सकती है ?
वास्तव में कबीर की उलटबांसी का यह ध्रुव पद जीवन में उत्पन्न आध्यामिक बिसंगति का सन्देश देता है. अतः इससे विज्ञ पाठकों के मन में यह प्रतीक्षा जग सकती है कि गौरी भी देर सबेर मीरा के मार्ग पर चल सकती है. पर इसमें देर किस बात की ? इतने सुन्दर राजमार्ग को प्रशस्त कर लेखक आगे ‘मार्ग अवरुद्ध’ का बोर्ड क्यों टांग देता है ?
सारतः इस उपन्यास के केन्द्रीय चरित्र गौरी और मुकुंद हैं. ये दोनों ही पात्र सनातन भारतीयता के आदर्श हैं. इनमें प्रेम, संयम, त्याग, साधना, शिक्षा, अध्यवसाय, सेवा, परोपकार और समर्पण का परमोत्कृष्ट प्रकाश है. वर्तमान शिक्षा प्रणाली में इन दिनों युवा वर्ग के लिए देश में जिस शिक्षा और संस्कार की आवश्यकता प्रकट की जाती है, उसकी पूर्ति इस तरह की रचना बखूबी कर सकती है.
 प्रभुदयाल मिश्र, अध्यक्ष महर्षि अगस्त्य वैदिक संस्थानम्, भोपाल