Sunday, 15 March 2015

'अमेरिका का भारत' ( यात्रावृत्त )

‘अमेरिका’ का भारत
प्रभुदयाल मिश्र

अमेरिका में रहने वाले लगभग ३० लाख भारतीय औसत तौर पर जैसे प्रति एक भारतीय परिवार का प्रतिनिधित्व करते हैं । अत: यह कोई आश्चर्य नहीं कि भारत में कहीं भी आसपास बात करते हुये औसत तौर पर १० में से ऐसे दो व्यक्ति मिल ही जाते हैं जिनका बेटा या बेटी यू एस में काम कर रहा है तथा वे या तो वहाँ होकर आये हैं अथवा वहाँ जाने की तैयारी में हैं । यही दृश्य अमेरिका यात्रा में भी प्रत्येक भारतीय देखता और अनुभव करता चलता  है । कहीं भी बाहर सैर सपाटे- न्यूयार्क, वाशिंगटन, नियाग्रा, डिजनीलैंड, गोल्डन गेट ब्रिज, सेन फ़्रांस्सिको, चिड़ियाघर या एक्वेरियम आदि में जाते हुये ५ से १० प्रतिशत भारतीय परिवार ( बुज़ुर्ग माता-पिता, पोता- पोती और बेटी/ बेटा तथा बहू/ बेटी ) दिखना एक आम बात है ।
एक समय था जब अमरीका यात्रा में गये भारतीय का मक़सद अमरीकियों से मिलना और उनसे संवाद लक्ष्य हुआ करता था । किन्तु अब आम भारतीय तो अलग राजनेताओं, महात्माओं और व्यवसायियों की यात्रा के केन्द्र में भी अधिसंख्य स्वदेशी या प्रवासी भारतीय ही रहते हैं । स्पष्ट है कि अमेरिका में अब ऐसे अनेक भारतीय संगठन और समुदाय सक्रिय हैं जो भारतीय जीवन, परम्परा, भाषा  और संस्कृति को पुनर्जीवित करने के प्रति बहुत सचेष्ट हैं ।
ज़ाहिर है कि अपनी इस भूमिका की पृष्ठभूमि में मैं कोलेराडो की अपनी ताज़ी यात्रा में ‘ बोल्डर बाल विकास सेन्टर’ के सामाजिक और सांस्कृतिक आचार और व्यवहार को केन्द्र में रख रहा हूँ जिसने मेरी इस यात्रा में मुझे एक और आत्मीय परिवार में साथ रख मुझे इस दूसरे घर बराबर आते जाते रहने की आवश्यकता जताई है ।

कुछ समय पूर्व जब एक पाकिस्तानी चैनल एक-एक कर क़रीब ३० भारतीय मूल के नाम गिनाकर अमेरिकी प्रशासन में बड़े पदों पर उनकी पदस्थता गिना रहा था, या श्री नरेन्द्र मोदी न्यूयार्क के मेरीलैंड स्क्वायर पार्क में महानायक की तरह सितम्बर १४ में २० हज़ार प्रवासी भारतीयों का ऐतिहासिक सम्बोधन कर रहे थे अथवा २७ जनवरी को बराक ओबामा सीरी फ़ोर्ट ओडीटोरियम में अपने राष्ट्रपति निवास व्हाइट हाउस में दिवाली मनाने की बात कर रहे थे, तो १८९३ के स्वामी विवेकानन्द के शिकागो भाषण की जैसे न केवल रह- रह कर आवृत्ति होती है, बल्कि स्वामी जी का विश्व मानवता के सपने के साकार होने का जैसे समय भी निकट आ रहा है ।
इस तरह जब मेरे कालरेडो के पिछले प्रवास के पहले बुधवार की शाम मेरी बहू शिल्पा ने बताया कि रात आठ बजे वह मुझे स्थानीय ‘बोल्डर बाल विहार केन्द्र’ प्रमुख प्रमिला पटेल के संयोजन में संचालित गीता गोष्ठी के दूर संचार सम्मेलन से जोड़ना चाहती है,तो मैंने प्रसन्नता पूर्वक इसकी सहमति दी । एक प्रकार से यह मेरी भोपाल की गतिविधि की ही निरन्तरता थी । यहाँ हमारी ६५ साल पुरानी गीता समिति रविवार को इसी तरह की प्रत्यक्ष गोष्ठी होती है ।यह परम्परा चिन्मय मिशन की वह लोक व्यापी पद्धत्ति है जो गीता के अध्ययन को सुगम बनाती है ।स्वभावत: यह मेरा अभीप्सित आयाम था तथा इससे मुझे एक प्रवास मात्र की यथास्थिति और डलनेस से मुक्ति प्राप्त होती थी। वाल संस्कार और भारतीय संस्कृति तथा साहित्य के इस भारतीय समुदाय के साथ नियमित संवाद और भागीदारी उत्साह वर्धक थी । इसकी बैठकों में सभी वर्ग - महिला, युवा, बुज़ुर्ग और बच्चों के लिये गतिविधियों की निश्चित रूपरेखा थी - प्रार्थना, संस्कृत पाठ और सूर्यनमस्कार आदि की सामूहिकता की अनिवार्यता सहित ।


मुझे यहाँ विशेष रूप से  ‘ फ़ोर पाथ्स आफ योगा’ विषय पर अपने व्याख्यान और इसके पूर्व और पश्चात् भारत के अनेक भागों में रहने वाले भारतीयों द्वारा उठाये गये कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न सहज ही याद आते हैं ।ऐसे भारतीय परिवार जिनकी पिछली कई पीढ़ियाँ अमेरिका में रही बसी हैं, वे कहीं और भी तीव्रता से अपनी मूल पहचान में सचेष्ट हैं। भारतीय मूल की अमरीकी सांसद तुलसी गैलार्ड द्वारा सदन में ली गई गीता की शपथ और गीता पर उसकी बहुप्रचारित वीडियो क्लिपिंग बहुसंख्य भारतीयों की आँख खोलने का काम करती है ।
मेरे पहुँचने के साथ ही मेरी छ साल की पोती की मार्फ़त बहू शिल्पा ने मुझे इन्टरस्टेलर फ़िल्म देखने के लिये राज़ी कर लिया । उस बर्फ़ीली रात जहाँ थियेटर के बाहर बेटे अनुभव को गाड़ी पार्क करना मुश्किल हो रहा था, वहीं उसे यह भी चिन्ता थी कि टिकिट मिल जाने के बाद भी भीड़ के कारण कहीं फ़िल्म खड़े होकर ( बच्चों के साथ!)  देखने की नौबत आ सकती है ।यह मुझे भारत लौटकर ९ जनवरी के गार्जियन में ‘हाऊ मूवीज़ एम्ब्रेस हिन्दूइज्म’ पढ़कर ठीक समझ आया कि किस प्रकार समय के वर्तुल होने की भारतीय अवधारणा समय की सापेक्षता के परे पहुँचाने के अमरीकी आयाम को दिशा दे रही है ।
छ वर्षीय अन्वी ( पौत्री) और २ वर्ष के अव्ययन (पौत्र) जिनका जन्म अमेरिका में ही हुआ है, घर में अधिकतम हिन्दी ही बोलते हैं । अमेरिका में नवम्बर में मनाये जाने वाले महोत्सव पंपकिन के लिये कद्दू के देवता को अव्ययन ने ‘कम्पन’ नाम दे डाला है । इन कम्पन महाराज की रावण के सेनापति अकम्पन से तुलना कर मुझे पुराण कथा सुनाने में ख़ूब रस मिलता है । अन्वी ने सौन्दर्य की अमरीकी नारी प्रतीक एलसा तथा अव्ययन ने एन्ना को अपना फ़ेवरिट बनाया है । डिजनीलैंड में उनका इनसे साक्षात्कार भी हो चुका है । मैं लक्ष्मी और सरस्वती सी इन देवियों की कथा सुनने और सुनाने में मिथक की समान महिमा से अभिभूत हूँ ।
अपनी कुछ नई पुरानी किताबों पर लैपटॉप या आईपैड पर पौढाते मुझे देखकर प्रायः: घर से ही आफिस का
काम करने वाली शिल्पा मेहमानों को बताती है ‘पापाजी तो मुझसे भी ज़्यादा बिजी रहते हैं ।’ जब एक दिन मैंने अमेजान की सहयोगी क्रियेटस्पेस द्वारा प्रकाशित अपनी ‘देवस्य काव्यं’ पुस्तक का नाम लिया तो तीसरे दिन घर में पुस्तक बुलाकर शिल्पा ने बताया कि उसके अमेजान की सदस्य होने कारण बिना परिवहन व्यय के घर किताब प्राथमिकता से आ जाती है ।रचनात्मकता, भाव और साहित्य की सार्वभौमिकता के वर्तमान डिजीटलाइज्ड विश्व में मानवीय सभ्यता और अभिव्यक्ति के माध्यम भाषा संबंधी मूल पहचान की चेष्टा में भाषाविदों ने भारतीय भाषा परिवार विषय पर व्यापक शोध किये हैं ।२४ जनवरी के गार्जियन में प्रकाशित ‘लैंग्वेज ट्री’ के शोधपूर्ण आलेख को शिल्पा ने भेजकर संभवत: यही प्रकट किया है कि भारत- अमेरिका का भाषाई मेल युगों पूर्व का है ।( आगे यहां यह कथन परिशिष्ट भाग ही बनता है कि मैंने जहाँ अपनी टिप्पणी में सभी भाषाओं के मूल संस्कृत में भी जाने की आवश्यकता बताई वहीं ईशान थरूर ने दक्षिण भाषा परिवार के योग का माहात्म प्रतिपादित किया।)
दुनिया में तेज़ी से फैल रहे आतंकवाद और इसमें सर्वथा अयुद्धवादी भारतीय यदि अनिश्चित भविष्य और आत्मरक्षा के प्रति आशंकित है, तो कोई अचरज नहीं । योग और अध्यात्म की चर्चा से अलग प्रायः प्रवासी मित्रों का यही प्रश्न होता था । वे आत्म त्राण के साथ भारतीय प्रज्ञा की रक्षा में भी सचेष्ट रहना चाहते थे । और यह प्रश्न तो स्वभाविक था ही कि ईश्वर स्वयं यह सब क्योंकर सहता है ?
मेरा इस पर यही कहना था कि यह कुछ वैसा ही है जैसे कोई प्रति व्यक्ति एक परमात्मा की तैनाती मानकर चल रहा हो ।इतना ही नहीं उसे ( परमात्मा को) हमारी जैसे सहायता की भी दरकार हो गई है । इस तरह उसकी प्रार्थना या आलोचना करने वाले को हम पुरस्कृत या दंडित करते हैं । ( शायद उसकी सहायता में और शायद उसकी असहायता दोनों में!) यह हमें स्मरण नहीं आता कि इतने विराट ब्रह्माण्ड, जिसकी आकाशगंगाओं की गणना भी हम न कर सकते हों, उसके निर्माता ( यदि हम ईश्वर का यह कार्य मानना ही चाहते हैं) के इस सीमित संसार पृथ्वी की एक सीमित समय की घटना विशेष से क्या किसी को  इतना प्रभावित होना चाहिये?
भारतीय वेदान्त दर्शन ऐसे सभी जटिल प्रश्नों का बहुत प्रभावी समाधान प्रस्तुत करता है ।हिंसा और हत्याओं से आत्मा की अविनश्वरता के आश्वासन पर ही यह नहीं ठहर जाता । यह आत्मा की किसी पृथक सत्ता का दर्शन न होकर एक ऐसी सार्वभौम, सार्वकालिक, सनातन सत्ता की स्वीकृति है जिसमें कुछ बढ़ने या कम होने का कहीं प्रसंग ही नहीं है ।हमारा शाश्वत दर्शन जीवन और मृत्यु तथा सभी स्थान और समय के परे ऐसी निरन्तरता है जिसमें न तो अल्प विराम की सत्ता है और न ही पूर्ण विराम का अस्तित्व ।
वर्ष १९७० में जब मैं भारत में आयोजित एक शिविर में अमरीकी शान्ति सैनिकों को हिन्दी और भारतीय संस्कृति समझाता था तो एक सुवह केन क्लीवलैंड ने आकर मुझे अपना सपना सुनाया -
‘मैंने आज देखा है कि हमलोग सेनफ्रान्सिसको में साथ-साथ घूम रहे हैं । मैं देखता हूँ कि आप एक सड़क दुर्घटना में आहत हो जाते हैं । मैं एम्बुलेंस के लिये दौड़ता हूँ । लौटकर देखता हूँ कि आप एकदम बदले हुये हैं । आपकी वेशभूषा एक योगी की है ।’
 इस बार मैंने अनुभव को केन के इस सपने को साशय सुनाया । अनुभव ने कहा कि ज़रूर जायेंगे और गाड़ी सावधानी से ही चलायेंगे । फिर बच्चे भी साथ हैं । और आलोक ( अनुभव के मित्र)  ने बार-बार कहा भी है कि पापा को इस बार ज़रूर लाना। अत: हम लोग तीन दिन लासएंजेलिस और डिजनीलैंड में बिताकर जब ८ घंटे सड़क यात्रा कर अमेरिका के इस पश्चिम द्वार पहुँचे- पश्चिम द्वार रहा बलवाना । मेघनाद सन करि लराई, टूट न द्वार बहुत कठिनाई ! यह तो हनुमान के सामने की लंका की चुनौती थी । पर इस सिलीकोन वैली का हमारा मार्ग मेघमाला और तूफ़ान रोक रहा था । इस प्रकार हमारा वह सपना चकचूर हो रहा था जिसने हमें यह समझाया था कि मौसम के मामले में सेनफ्रान्सिसको भारत जैसा ही है और हमें डेनवर के एक दिन में ऊपर- नीचे २० डिग्री तक गुलांच लेने वाले मौसम से निजात मिल जायेगी । बहरहाल एप्पल, फ़ेसबुक और जीमेल आदि के अहातों को छूकर जब हम आलोक के यहाँ पहुँच गये तो भारत के तात्कालिक समय की तेज़ी से तजबीज करने लगे जिससे कुछ समय की टूटी कड़ी को जोड़कर फ़ेस टाइम पर अपने ताज़े समाचार पहुँचा सकें ।
अनुभव ने सचमुच ही बड़ी सावधानी से गाड़ी चलाकर गोल्डन गेट ब्रिज, क्रकुड लेन,घिराडेली चाकलेट फ़ैक्टरी, समुद्र तट आदि की यात्रा कराई । मेरी नज़र समुद्र पार इस महानगर में कहीं किसी कोने में रहने वाले ( अब संभवत: ही) केन क्लीवलैंड की झलक पाने की थी । किन्तु यहाँ जिस परिमाण में मुझे पूर्वी जापान, चीन और भारत आदि से आयी आकृतियाँ दिख रहीं थीं, उससे यह संभावना क्षीण हुई जा रही थी ।जैसे पश्चिम का यह पूरा अमेरिका ही पूर्वान्तरित हो चुका था ।


दूसरे दिन हम लोग पैसिफ़िक समुद्र में बने विशाल मोन्टेरी बे एक्वेरियम देखने गये । यह ऐसा पहला एक्वेरियम हम देख रहे थे जिसमें विराट समुद्री जीव मूल समुद्र के पानी से तर अत्याधुनिक विशाल मत्स्य भवन में रहते थे । तब भी इन प्राणियों को भोजन तो अलग से ही दिया जाता है । इस ज्ञान से दर्शकों को क़तई महरूम नहीं रखा जाता । उन्हें तो भोजन कराते समय समूह में आमंत्रित कर प्रश्न पूछने का भी अवसर दिया जाता है । ऐसे ही मौक़े पर पेंग्युन पक्षियों को मेरी पौत्री अन्वी ने पहला प्रश्न यह पूछा था कि यह पानी और पानी के बाहर उड़ने वाली चिड़िया पानी के अन्दर कितनी देर रहती है और मैंने यह कि पेंग्युन प्रकाशक ने आख़िर इन्हें क्यों अपना ट्रेड मार्क बनाया ?

अनेक व्यक्तियों और जगहों के नए से नाम बिना नोट किये कोई कैसे याद करे ? वह तो यहाँ मुझे गूगल महान् के निकट से गुज़रने का लाभ कहीं बाद में जाकर पता चला जब बापस लौटने पर मेरे आई पैड में एक चित्रमाला - प्रभु मिश्र की सिलीकोन वैली यात्रा - उभर कर आ गई ।बन गया काम ।
स्वामी विवेकानन्द के बाद अमेरिका में सनातन भारतीयता और वेदान्त दर्शन को शहर-शहर पहुँचानेवाले स्वामी चिन्मयानन्द जी का कहना था कि कोई देश अपने भूगोल, सम्पन्नता अथवा शक्ति से महान् नहीं बनता । उसकी महानता का वास्तविक पैमाना उसके आदर्श, उसके नागरिकों की बौद्धिक, वैज्ञानिक और मानव - मूल्य प्रधान क्षमता तथा इन विचारों की निरन्तरता है । भारत और अमेरिका इस पैमाने पर समतुल्य ठहरते हैं । जैसाकि अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा ने २७ जनवरी को  सीरी फ़ोर्ट ओडीटोरियम में भी कहा, इन दोनों सबसे बड़े जनतांत्रिक राष्ट्रों की क्षमता की परीक्षा इनकी विविध संस्कृतियों, विश्वास और मान्यताओं के मेल से उत्पन्न विविधता लगातार कर रही है ।
१९वीं सदी के अमरीकी रोमान्टिक ट्रान्सडेंटलिस्ट कवि थोरो, इमर्सन, वाल्ट विटमैन, मैलविल आदि पर भारतीय उपनिषदों के प्रभाव से सभी परिचित हैं । इधर महात्मा गांधी पर थोरो के सविनय अवज्ञा आन्दोलन के प्रभाव की भी स्पष्ट पहचान है । आगे मार्टिन लूथर किंग पर गांधी का असर हुआ । भक्ति वेदान्त प्रभुपाद, महर्षि महेश योगी, ओशो आदि ने तो यहाँ अमिट छाप छोड़ी ही है, वर्तमान में भी अनेक भारतीय अध्यात्म गुरु और योगी अमेरिका में भारत की धूम क़ायम किये हुये हैं । अत: अब हर संदेह से परे अमेरिका में एक ऐसा भारत स्थित है, जिसकी वास्तविक पहचान शुद्ध सनातन भारतीयता है ।

Thursday, 19 February 2015

मानस शब्दानुक्रमनिका की भूमिका



                               मानस शब्द-कोष क्रमावली
प्रभु श्री रामभद्र के चरणों में परम प्रीति रखने वाले बंधु श्री ओम प्रकाशजी गुप्ता ने इस अनुष्ठानात्मक कार्य में अपनी अद्भुत क्षमता का परिचय दिया है. उन्होंने सप्रेम मुझे इसके अनेक अंश भेजकर इस पर मेरी टिप्पणी मांगकर अपने सौहार्द्य का ही परिचय दिया. मैंने स्वभावतः इस पर उनसे अनेकशः बात कर अपना पूर्व समाधान किया है. तदनंतर मेरा इस ग्रन्थ पर मत इस प्रकार अवधारित होता है.
अपनी साहित्य साधनाकाल में मैंने अपने स्मरण के अनुसार यह पढ़ा था कि किसी विदेशी भाषाविद का कहना है कि गोस्वामी तुलसीदास ने हिंदी साहित्य को नए लगभग २७००० शब्द प्रदान किये हैं . मैंने श्री गुप्तजी से उनके कोष की शब्द संख्या पूछने पर ज्ञात किया कि इसमें लगभग १४००० शब्दों के सन्दर्भ उन्हें मिले हैं. उन्होंने यह भी बताया कि उन्होंने अपना शोध केवल दोहा, चौपाई, सोरठा और छंदों तक ही सीमित रखा है. स्पष्ट है कि उन्होंने मानस के २७ श्लोक और उनमें आये शब्दों को अपने कोष में नहीं लिया है. १ वर्ष पूर्व हमारे तुलसी मानस प्रतिष्ठान, भोपाल में मनीषी विद्वान डा. रामाधार शर्माजी ने इस सम्बन्ध में बहुत महत्वपूर्ण सूचनाएं दी थीं किन्तु वे मुझे सम्पूर्णतया स्मरण नहीं आ रही थीं अतः डा. शर्मा से मैंने संपर्क साधकर उन्हें इस प्रकार संजोया है –
मानस में चौपाई – ९२१८, दोहे ११७३, सोरठे ८७, छंद २२८ और श्लोक संख्या २७ है. इसमें प्रयुक्त शब्द संख्या १,१६,७३३ और अक्षर हैं २,९१५८०. यह रामचरित मानस की ही बात है. उनके अन्यान्य ग्रंथों का इसमें समावेश नहीं है.
श्री रामचरित मानस भगवान श्रीराम का वांग्मय विग्रह ही है. तुलसी की सिद्ध शब्द साधना ने इसके प्रत्येक शब्द को मंत्रात्मक सामर्थ्य प्रदान की है. उन्होंने स्वयं ही मानस में लिखा कि अर्थहीन और अनमिल होते हुए भी ‘महेश के प्रताप’ से अनेक शब्द ‘साबर मंत्र’ हो जाते हैं. अतः इस ‘महेश मानस’ की रचना में ऐसी शक्ति न होगी तो अन्यत्र कहाँ होगी?
मैंने ऐसे अनेक साधकों और मानस प्रेमियों का साक्षात्कार किया है जो मानस की शब्द आवृत्ति पर अनेकशः विचार करते हैं. उदाहरण के लिए ‘करुण निधान’ शब्द का छ बार का प्रयोग, विशेकर जानकीजी के समक्ष श्री हनुमान का यह नामोल्लेख कितना सटीक है. इसी तरह यह धारणा कि रामायण में तीन चौपाइयों को छोड़कर कहीं भी ‘र’ या ‘म’ का अभाव देखने को नहीं मिलता. अतः यदि उत्तरकाण्ड में ‘ झूठहि लेना झूठहि देना, झूठहि भोजन झूठ चबेना’ आता है तो असत्य आचरण के इस प्रसंग में क्रमशः अग्निधर्मा और मातत्व के परम प्रतीक वर्ण र’ और ‘म’ से उसे दूर ही रखा जाना योग्य है. अतः ऐसे लोगों की संख्या कम नहीं है जो अपने लोक और परलोक की सिद्धि के लिए मानस की चौपाई और उसके सिद्ध शब्दों का अनेकशः आश्रय लेते हैं.
मानस के इस शब्दानुक्रम कोष में पाठकों की ऐसी अनेक जिज्ञासाओं का समाधान है जैसे मानस में ‘राम’ या ‘सीता’ शब्द की आवृत्ति कितनी है? वह शब्द कौनसा है जिसकी आवृत्ति सर्वाधिक है ? एकाक्षरी शब्द कितने हैं? तथा संधि, उपसर्ग, प्रत्यय और तुलसी की स्वयं की मौलिक प्रतिभा के आधार पर किं शब्दों ने हिन्दी भाषा के विकास क्रम की रूपरेखा अवधारित की.
मानस के अनेक मूल संस्करण तो हैं ही, क्षेपक रामायण प्रसंग भी अनेक हैं. डा. गुप्त ने सभी विवादों के परे रहते हुए गीता प्रेस गोरखपुर की रामायण का ही आधार लिया गया है. इस संस्करण की सर्वव्यापकता की दृष्टि से यह निर्णय सर्वथा उचित ही है.   
श्री गुप्तजी भारत से दूर अमेरिका में रहकर मानस संबंधी अनेक शोध कार्य में निरत हैं. कुछ पूर्व उन्होंने १००८ चौपाइयों की एक संक्षिप्त मानस पुस्तिका भी प्रकाशित की थी जिसका जिज्ञासु भक्त जनों ने बहुशः स्वागत किया. मेरा विश्वास है कि उनकी यह कृति भी मानस के सन्दर्भ और शोध कार्य में लगे लोगों के अतिरिक्त सामान्य पाठक वर्ग में समादृत होगी.
प्रभुदयाल मिश्र,
२८ जनवरी २०१५
अध्यक्ष, महर्षि अगस्त्य वैदिक संस्थानम्, भोपाल, भारत     
           
        

Saturday, 1 November 2014

पुस्तक समीक्षायें

समीक्षा  
पत्थर की परत उघारते हुए 
प्रभुदयाल मिश्र 

श्री हरिविष्णु अवस्थी की समीक्ष्य पुस्तक ‘बुंदेलखंड के शिलालेख’ के हस्तगत मैं अपनी ‘स्वकृतियों के शिलालेख’ शीर्षक वाली एक पुरानी कविता की निम्न पंक्तियाँ बड़ी सिद्दत से याद करता हूँ-
स्मारकों में बंद/ अब भी हैं खिलाफ 
शेष स्वीकृतियों के संस्करण और
अर्थात हमारी इतिहास की खोज एक तरह से सदा अधूरी ही रहने वाली है. जैसे कुछ और, कुछ और पाने की तलाश सदा बनी ही रहेगी बावजूद इतने अनुसंधान और इतिहास लेखन के. ऐसा नहीं है कि हमारे इतिहास-पुरुष इस दिशा में स्वयं सचेष्ट नहीं रहे किन्तु अपने सीमित साधनों और अपने चिरजीवी बनने की उनकी चाह कुछ ऐसी रिक्तियां जरूर छोड़ जाती है जिसे आज की कुशल और पारदर्शी दृष्टि ही किसी तटस्थता से समाकलित कर सकती है.
श्री हरिविष्णु अवस्थी में इसके लिए जहां अपना सम्यक इतिहासबोध है वहीं उनमें शोधार्थी की गहरी पहल और चेष्टा भी विद्यमान है. यह स्वाभाविक ही है कि इसके लए उन्होंने बुन्देलखंड के उस कालखंड को चुना है जो इस क्षेत्र का स्वर्णयुग तो है ही, सम्पूर्ण भारत के इतिहास का भी वह ऐसा अविस्मरणीय अध्याय है जिसकी भित्ति पर हमारा वर्तमान टिका है. भारतीय इतिहास के इस मध्ययुग ने दुर्धर्ष काल की उस शिलाखंड पर यहाँ कदम रखा था जो अपनी वक्रता में एक परीक्षक की तरह बेरहम भी था. 
पृथिवीराज चौहान ने (११८२ ई.) में जिस चंदेल राजा पर्मार्दिदेव (राजा परमाल) विन्ध्येला (बुन्देला) पर आक्रमण किया अंततः वह वंश गढ़कुडार के मार्ग सन् १५३१ में ओरछा राज्य का संस्थापक हुआ. इसके ओरछेश वीरसिंह देव प्रथम (१६०५-२७ ई.) बुन्देला वास्तुकला के जनक हैं. पुस्तक में अडजार, ओरछा, कारी, टीकमगढ़, प्रथिवीपुर, बल्देवगढ़, बौरी, शिवपुरी (कुण्डेश्वर), हीरानगर आदि के जो शिलालेख वर्णित हैं प्रायः वे सभी इस राजवंश की कीर्तिगाथा के आलेख हैं. इनसे इतिहास के साथ-साथ उस युग के समाज, संस्कृति, साहित्य और कला की जीवन से अन्तरंगता का अद्भुत तालमेल द्रष्टिगोचर होता है. 
पुस्तक की मूल परिकल्पना के अनुसार ‘बुंदेलखंड के शिलालेख’ संग्रह का यह भाग- एक (विक्रम संवत १०११ से २०१२) ओरछा भूभाग से सम्बंधित है. बुंदेलखंड के अंतर्गत उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के क्रमशः - झांसी, बांदा, चित्रकूट, ललितपुर, उरई, हमीरपुर, महोबा, राठ तथा दतिया. टीकमगढ़, सागर, दमोह, छतरपुर और नरसिंहपुर, शिवपुरी आदि जिले आते हैं. ऐसा प्रतीत होता है कि दूसरे भाग में लेखक उस बृहत्तर बुंदेलखंड को समाविष्ट करेगा जो ‘इत चम्बल उत नर्मदा’ और तमसा नदी के विशाल भूभाग में मध्य प्रदेश सहित उत्तर प्रदेश के उक्त जिलों को समेटता है. अतः अपनी वर्तमान एक सीमा में ही सही यह पुस्तक विराट भारतीयता के परिप्रेक्ष में जो गवाक्ष खोलती है वह आलोक का ऐसा आमंत्रण है जो इतिहास के पुनर्लेखन की ओर शोधार्थियों को प्रेरित करता है. 
पपौरा के शिलालेख (आसाढ १० बुधवार वि. संवत १२०२) में इस उल्लेख कि ‘भोपाल नगर वासीक गोपालपूर्वान्वये साह टडा सुत साहु गोपाल तस्य भार्या माहरिणी सुत साहु प्रशामंति नित्यं जिनेश चरणारविन्द पुण्य प्रतिष्ठायाम’ पर टिप्पणी करते हुए लेखक का कहना है- ‘इस क्षेत्र की प्रसिद्धि उस समय जब आवागमन के साधनों का लगभग अभाव सा था,  भोपाल तक होना इस स्थान के महत्व को प्रतिपादित करता है.’ (प्रष्ट ६१) 
‘माडूमर के वि.सं. १४५० के शिलालेख में मूलचंद की पुत्रवधू कच्छी के सती होने तथा इसके लगभग २५ किलोमीटर दूर ग्राम बर्माडाग के शिलालेख (वि. सं. १४६६ ) में पति की वीरगति पर सती का शिलालेख उस इतिहास का स्मरण कराता है जिसे लेखक ने इस शोध परक टिप्पणी के साथ उजागर किया है-
‘ज्ञातव्य है कि वि. सं. १४४७ में नसीरुद्दीन सुलतान बना था. इसके राज्य में अराजकता फैल गयी थी. मालवा का सूबेदार दिलावर खान गौरी स्वतंत्र हो गया था तथा उसने चंदेरी पर चढाई कर बुंदेलखंड के दक्षिणी और पश्चिमी भाग पर अधिकार कर लिया था. सुलतान मुहम्मद देहली सुलतान अलाउद्दीन का पिता था.’ (प्रष्ट ७९)
ग्राम बर्माडाग संयोगतः मेरा जन्म ग्राम है गाँव में इस शिलामूरति को 'छोटी महामाईकहा जाता था । ये दुर्गा मंदिर से करीब एकफ़र्लांग की दूरी पर एक पेड़ के नीचे स्थापित थीं । गांव में एक प्रकार से बँटवारा था - बड़ी माता उच्च और छोटी माता निम्न वर्ग के लिये ! शायद छोटी माता को प्राकृतिक प्रकोप जैसे चेतक आदि का भी हेतु माना जाता था । इसीलिये जब बड़े दाजू के छोटे बेटे बूँठे का ७-८ साल की उम्र में क़रीब साठ साल पूर्व 'देवीजीके कारण निधन हो गया तो बडेदाजू ने छोटी देवी के अनेक शिला खंडों को अपने क्षात्र क्रोध में आकर टुकड़े-टुकड़े कर दिया । यह प्रस्तर खंड शायद उनके सव्वल से नहीं टूटा । कुछ समय पहले ही गाँव वालों ने छोटी देवी को जब बड़ी देवी के पास पधराया तो पुरातत्वविद अवस्थी जी की दृष्टि पड़ी । उसका परिणाम यह सबके सामनेहै ।

इस पुस्तक को पढते और सुविज्ञ मित्रों से बात करते हुए कुछ अन्य बातों की ओर भी ध्यान जाता है. यह तो स्पष्ट है ही कि इस पुस्तक के अध्याय मुख्य रूप से वर्तमान जिला टीकमगढ़ और सामायन्तः ओरछा राज्य की सीमा का ही संस्स्पर्श करते हैं. किन्तु इस क्षेत्र में भी जैसे कुछ और पड़ताल शेष रह जाती है. ओरछा राज्य के दीवान मुस्लिम रहे हैं. इनके द्वारा मकबरों में ‘कुतवा’ शिलालेख तो हैं ही, वे प्रकारांतर से अपने समय और समाज की यथातथ्य बयानी करते हैं. उदाहरण के लिए दीवान वजीरुद्दौला का अल्प आयु में मृत पुत्र के लिए टीकमगढ़ ईदगाह की मजार में लिखा यह शेर-
‘फूल तो वो दो दिन के हैं जो खिले और मुरझा गए
हसरत उन गुन्चुओं की जो बिना खिले मुरझा गए .’       
लेखक ने पुस्तक प्रष्ट ५३ पर ईदगाह मस्जिद के १२०५ हिजरी के एक शिलालेख को उद्धृत भी किया है किन्तु उर्दू हिन्दी के घालमेल से इसका आशय अस्पष्ट रह जाता है. लगता है यह प्रूफ में यथेष्ट त्रुटि सुधार न हो सकने से हुआ है. 
इस संग्रह की सबसे बडी उपयोगिता मुझे भाषा की दृष्टि से समझ आती है. देवनागरी लिपि में संस्कृत से आरम्भ होकर, ब्रज-बुन्देली मिश्रित कविता और मुग़ल बादशाहों की उर्दू-फारसी से अविभूत हमारी आज की खड़ी बोली जैसे यहाँ अपना स्वरूप निर्धारित कर रही है. जिस भूभाग ने केशव जैसा महाकवि, तानसेन जैसा संगीतज्ञ, राय प्रवीण जैसी नृत्यांगना और महाभारत से भी वृहत्तर धर्मशास्त्र ‘वीरमित्रोदय’ के रचयिता मित्र मिश्र जैसा शास्त्रज्ञ दिया हो, उसकी साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत को अनेक अतल गहराइयों से निकालने की आवश्यकता अभी शेष है. यहाँ इस पुस्तक से एक यह उदाहरण द्रष्टव्य है-
‘ महाराजा विक्रमाजीत सिंह (ई. १७७६-१८१७) जिन्हें विक्रमादित्य सिंह कहा जाता है, परम धार्मिक प्रकृति के थे. वे कवि भी थे और ‘लघुजन’ उपनाम से काव्य सृजन करते थे. नित्य प्रति जब वे अपने आराध्य की सेवा पूजा करने हेतु बैठते थे तो एक नये स्तुति भाव से परिपूर्ण छंद अपने आराध्य को सुनाया करते थे.
‘ आपने लघु सतसईमाधव लीलास्फुट पदावली नामक काव्य ग्रंथों की रचना की. ‘लघु सतसई’ में ७२० दोहे हैं जिनमें से किने ही दोहे कविवर बिहारी की ‘सतसई’ से टक्कर लेते हैं. ‘माधव लीला’ में राधा माधव की लीलाओं का वर्णन है. स्फुट पदावली में आपके उन पदों का संग्रह है जो आप नित्य नए रचकर अपने आराध्य को पूजा के समय सुनाया करते थे.’ (प्रष्ट ६२ ) 
मरुभूमि शोध संस्थान, राजस्थान ने पुस्तक प्रकाशन बड़ी सुरुचि पूर्वक अपनी अनुभव सिद्ध कला-कूची से अभिसिंचित कर किया है. शिलालेखों में प्रयुक्त संस्कृत, हिन्दी, बुन्देली, प्राकृत, उर्दू और फारसी की शब्दावली को यथारूप मुद्रित कर उसके मूलभाव को हिन्दी में प्रकट करते हुए कुछ प्रूफ संबंधी त्रुटियों का शेष रह जाना स्वाभाविक और सामान्य बात है. आशा है  पर लेखक और प्रकाशक दोनों की दृष्टि जायेगी और वे अगले संस्करण में आवश्यक सुधार कर लेंगे.
लेखक श्री हरिविष्णुजी अवस्थी को भारतीय कला और संस्कृति के लिए उनके इस उत्कट अवदान के लिए भूरिशः बधाई.                                     
                                                ३५, ईडन गार्डन, चूनाभट्टी, कोलार रोड, भोपाल १६        
 कृति  बुंदेलखंड के शिलालेख 
 कृतिकार- हरिविष्णु अवस्थी 
 प्रकाशक- मरुभूमि शोध संस्थान, डूगरगढ़, राजस्थान  
 मूल्य  दो सौ रुपए                             
                                       



समीक्षा 
      रामकथा की रस- मंदाकिनी 
                 प्रभुदयाल मिश्र 

डा. रामसनेहीलाल यादव की ‘रामकथा मंदाकिनी’ रामकथा से सम्बंधित २१ ऐसे आलेखों का संकलन है जो ‘रामकाव्य की अर्थवत्ता’ और ‘मूल्यवत्ता’ की गहरी पड़ताल करती है. इसमें सार्वकालिक मानवीय जीवन के परिप्रेक्षगत ऐसे कथा और कथ्यों को छुआ गया है जिनका सामना प्रायः प्रत्येक पाठक और आस्तिक मन रामकथा में गोते लगाता हुआ करता रहता है . उदाहरणार्थ रामचरितमानस में ‘यायावरी’, ‘जन्तान्त्रिक मूल्य’, ‘जनतांत्रिक संस्थाएं’, ‘सांस्कृतिक क्रान्ति के अग्रदूत ऋषिगण’, ‘मानवेतर प्राणी’, ‘दंडकारान्य’, ‘न्यायपालिका’, ‘गर्हित नारी पात्र’, ‘गुप्तचरी’, ‘नभचर’, ‘जल और जलचर’ आदि. ये सभी विषय एक पृथक शोध कार्य का परिपूर्ण विषय बन सकते हैं. इस अर्थ में अनेक शोधार्थियों के मार्गदर्शन और दृष्टिबोध में सहायता करेंगे. 
इसी तरह कुछ अन्य विषय तुलनात्मक दृष्टि को आधार बनाकर लिए गए हैं जैसे- ‘आर कांड: मानस और कम्ब रामायण के सन्दर्भ में’, भक्ति का द्रविड़ सबंध, ‘तुलसी पूर्व राम साहित्य’, रीतिकाल के रामभक्त, सेनापति की रामभक्ति, गुरुगोबिन्दसिंह के राम, ‘सहजराम और रघुवंश दीपक’, ‘पवन तनयबल पवन समाना’, ‘पुरुष सिंह दोउ वीर’, आदि. ये विषय जहां अन्ततः मूल रामकथा की आधार भूमिका प्रतिपादन के लिए महत्वपूर्ण हैं वहीं इनकी भी शोधार्थियों को सामान उपयोगिता है. 
जहां तक इन विषयों की ‘अर्थवत्ता’ का प्रश्न है, वह स्वतः सिद्ध है. मानस या रामकथा का सन्दर्भ आने पर यह सोच सदा पहला रहता है कि इस कथा का हमारे वर्तमान जीवन से क्या सम्बन्ध है? क्या इससे हमारा वर्तमान सुधर सकता है? क्या इससे समाज को नई दिशा मिलेगी? क्या इसमें उन समस्यायों का निदान उपलब्ध है जो हमारे लिए अत्यंत ज्वलंत हैं? मैं  समझता हूँ कि लेखक इन सभी प्रश्नों के प्रति अत्यंत जागरूक है.
लेखक बहुपठित और बहुश्रुत है. उसने अपने आलेखों में संस्कृत और अन्य भारतीय भाषाओं के बहुशः सन्दर्भ दिए हैं. यह स्वागतेय कृति सर्वदा आलोडन किये जाने योग्य है .
कृति  रामकथा मंदाकिनी 
कृतिकार- डा. रामसनेहीलाल शर्मा ‘यायावर’
प्रकाशक- शिवांक प्रकाशन , नईदिल्ली 
मूल्य-  ५९५/ 


दोहों में रामकथा- पात्र  
डा. रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ की ‘रामकथा पात्रामृतम’ एक कविता पुस्तक है जिसमें रामकथा के पात्र (और स्थल) मैनाक, अशोक वाटिका, नन्दीग्राम, बालि, मातलि, सुषेण, माल्यवान, ताड़का-मारीच, खर-दूषण-त्रिसिरा, कबंध, विराध, त्रिजटा, सुलोचना, रत्नावली और श्रवणकुमार लिए गए हैं. डा. रमानाथ त्रिपाठी के शब्दों में-
‘ इन दोहों में जिस पात्र का वर्णन है उसकी मुख्य विशेषता तो स्पष्ट होती ही है उसमें जुड़े प्रसंग भी सांकेतिक शैली में उभरकर मन चक्षुओं के समक्ष साकार हो जाते हैं. लेखक ने पात्रों के मनोभावों के रूप में भी कही-कहीं प्रस्तुत किया है या मनोभावों का मानवीकरण किया है.’ 
उदाहरणार्थ लक्ष्मण का चरित्र चित्रण 
‘सदा सिया के चरण पर झुकी पलक की कोर
किन्तु बाण की नोक है मेघनाद की ओर’               
वस्तुतः यह कृति एक भक्त के समर्पण का अर्घ्य है. इसकी साहित्यिकता और कलातमक संसृष्टि इसकी उपोत्पत्ति है जो तुलसी के शब्दों में 
राम निकाई रावरी है सभी को नीक 
जो यह सांची है सदा तो नीको तुलसीक’ (बाल. २९)
अर्थात जहां राम की श्रेष्ठता ही दांव पर आ जाए तो अन्य कसी पक्ष की विचारणीयता शेष और आवश्यक नहीं रह जी ! अस्तु ‘ धन्यास्ते कृतिनः पिवन्ति सतत श्री रामनामामृतम’   
कृति- रामकथा पात्रामृतम
कृतिकार- डा. रामसनेहीलाल शर्मा ‘यायावर’
प्रकाशक- शिवांक प्रकाशन, अंसारी रोड, दरियागंज, दिल्ली 
मूल्य  ५९५/  
                                     ३५, ईडन गारन चूनाभट्टी, कोलार रोड, भोपाल १६






समीक्षा 

                      बुंदेलखंड का अंतर्साक्ष्य 
                             प्रभुदयाल मिश्र 

जिस प्रकार आत्मसाक्षात्कार, स्वयं की इयत्ता अथवा अपनी क्रांतिकारिता में कभी कबीर ने काशी को छोड़ मगही में अंतिम संस्कार की कामना की थी ठीक उसी प्रकार बुंदेलखंड के प्रसिद्ध लोक सिद्ध कवि ईसुरी ने भी कहा 
‘गंगा जी लों मरे ईसुरी दाग बगौरा दीजो’
अर्थात ‘मेरी मृत्यु भले ही गंगा तट पर हो किन्तु मेरा अंतिम संस्कार मेरे जन्म स्थान बगौरा (बुंदेलखंड) में ही किया जाय .’ 
यह स्वाभाविक ही है कि प्रख्यात समीक्षक- साहित्यकार डा. गंगाप्रसाद गुप्त ‘बरसयाँ अपनी मिट्टी के ऋण को बखूबी समझते हैं. उनकी सद्य संसृष्टि ‘बुंदेलखंड का साहित्यिक एवं सान्स्कतिक परिदृश्य इसी संदृष्टि का परिचय देती है.
सबसे पहले इस कृति के शीर्षक से ध्वनित संकेत पर ही विचार कर चलते हैं. इस कुछ बड़े से नाम-धाम को लेकर यह संकेत लेना उचित नहीं होगा कि यह बुंदेलखंड- समग्र- संधान है. जैसाकि कृति के अनुशीलन से प्रकट होता है , यह प्रधानतया लेखक के समय-समय पर लिखे आलेखों, शोध सन्दर्भों का एक सुचिंतित संग्रह है. यूं तो इसमें बुदेखंड के इतिहास, भूगोल, समाज, कला और लोक जीवन की झांकी भी विद्यमान देखी जा सकती है किन्तु यह कोई इस भूखंड के सम्पूर्ण साहित्य और संस्कृति का समाहार नहीं है. मैं इस प्रकार स्वयं भी अपने इस संशय का समाधान कर चल रहा हूँ कि इसमें मैथिलीशरण और सियाराम शरण गुप्त हैं तो तुलसी क्यों नहीं है और केशव हैं तो उनके राजदरबार (हरदौल, राय प्रवीण सहित) की झलक क्योंकर नहीं है. 
यह एक विडम्बना ही है कि एक हजार वर्ष से भी अधिक पुरातन भारतीय सनातन और लोक संस्कृति का प्रतिनिधि परिक्षेत्र इतिहास, साहित्य, कला और संस्कृति के पहरेदारों की इतनी बड़ी उपेक्षा का शिकार बना रहा. स्वयं इस समीक्ष्य कृति के लेखक श्री बरसैंयां जी ने अनेक रचनाकारों (उदाहरणारथ तुलसी के समकालीन विक्रम कवि पुस्तक प्रष्ठ ४१) की खोज की है जिन्होंने अनेक उत्कृष्ट कविता साहित्य का संसर्जन किया. जगनिक के आल्हा के साहित्यिक प्रमाणाकन और दीवान प्रतिपालसिंह के १२ खण्डों के बुंदेलखंड के इतिहास की जानकारी भी ऐसा ही दर्लभ कोटि का अभिदाय है जिसके लिए लेखक अनेकशः साधुवाद का पात्र है.
पुस्तक के अध्यायों को अनुशीलन की दृष्टि से निम्न पांच श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है- 
१, बुंदेलखंड का लोक साहित्य और इतिहास  इस शीर्षक के अंतर्गत मुख्यरूप से निम्न दो अध्याय रखे जा सकते  हैं- १. आल्हागाथा के रचयिता कवि जगनिक और परमाल रासो २. लोक ईसुरी का धार्मिक एवं दार्शनिक चिंतन. आल्हागाथा बुंदेलखंड के लोक जीवन में इतनी भीतर तक पैठ करती है कि यदि उसे भुलाया जाता है तो इस क्षेत्र की सही पहचान असंभव है. किन्तु इतिहास और साहित्य दोनों ने इसकी उपेक्षा की है. इतिहासकार इसे अतिरंजित लोक कल्पना कहते हैं तो साहित्यकार के लिए कवि जगनिक की प्रमाणिकता का प्रश्न शेष रहता है. डा. बरसैंया जी ने अपने अध्ययन और शोध के आधार पर इसकी एतिहासिकता और साहित्यिक पुनर्मूल्यांकन कर अपनी क्षमता का सदुपयोग तो किया ही है, अपनी जन्मभूमि का भी ऋण चुकाया है. वस्तुतः पृथिवीराज रासो और आलहाखंड दोनों का इतिहास और साहित्य में महत्व समान ठहरता है तथा यदि इसकी पूर्व में उपेक्षा हुई है तो अब समय की धारा इस अन्याय का प्रतिकार भी करे. 
इसी शीर्षक में ईसुरी को उनकी लोक- संवेदना के संस्पर्श की क्षमता के कारण रखा गया है. जैसा कि लेखक ने भी प्रतिपादित किया है, ईसुरी अपने दर्शन में कबीर और तुलसी तथा भक्तिरस में सूरदास से तुलना किये जाने योग्य हैं. उनके द्वारा शरीर को ‘किराए के मकान’ की संज्ञा देना जितना मौलिक है उससे अधिक उसकी वह सनातन भारतीय दार्शनिकता है जो उसे जीवन के मिथ्यात्व से परिचित कराती है. लेखक के अनुसार-
‘ ब्रह्म सत्यम् जगन्मिथ्या’ सूत्र की पुष्टि इन पंक्तियों ( बखरी रैयत है भारे की, दई पिया प्यारे की ) से होती है. माता-पिता, भाई-बंधु, बेटा-बेटी-पत्नी, धन-दौलत कुछ भी और कोई भी साथ जाने वाला नहीं है....इस संसार से पार लगानेवाला केवल ईश्वर है.’ (प्रष्ट ६७)          
२. बुन्देली साहित्य का इतिहास  इस शीर्षक के अंतर्गत तीन अध्याय लिए जा सकते हैं-१ बुन्देली के प्रमुख प्राचीन कवि २. बुन्देली का प्राचीन साहित्य और इतिहास ३ . बुन्देली के रचनाकार ग्रन्थ : बुन्देली रचनाकारों का विश्वकोश. इस प्रसंग में लेखक ने अपने मूल प्रबंध  ‘बुंदेलखंड के अज्ञात रचनाकार’ का उल्लेख कर यह प्रकट कर दिया है कि इस दिशा में उसका अपना मूल अभिदाय कितना है. यहाँ यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि बुंदेलखंड में साहित्य सृजन केवल बुन्देली भाषा में ही नहीं खड़ी बोली में भी प्रचुर पैमाने में हुआ है तथा वह अपनी रचनाशीलता, गति और परिमाण के आधार पर हिन्दी साहित्य में विशेष स्थान प्राप्त करने की क्षमता रखता है. 
३. बुंदेलखंड का इतिहास  १. दीवान प्रतिपाल सिंह और उनका बुंदेलखंड का इतिहास. लेखक के अनुसार- ’९० वर्ष पूर्व इतिहास का लिखा जाना जितनी बड़ी ऐतिहासिक घटना थी अब सन् २०१० में उसका समग्र प्रकाशन भी उतनी ही महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना है’. (प्रष्ट ५२ )
४. बुन्देली का लोक साहित्य  साहित्य के विद्यार्थी यह प्रश्न उठा सकते हैं कि लोक गीत, लोक व्यंग्य और लोक गाथा में कितना साहित्य है. इसके लिए उन्हें इस पुस्तक के इन तीन अध्यायों - १. लोककवि ईसुरी की फागों में सराबोर राधा-कृष्ण २. बुन्देली गीतों में रामकथा ३. बुन्देली कविता में व्यंग्य. को पढ़ना चाहिए. वास्तव में ईसुरी की सामर्थ्य अपार है. यहाँ इस पुस्तक से एक उदाहरण ही पर्याप्त होगा-
‘मनुआ को सम्मन है आयो, बूडे बार दिखायो 
दूजो सम्मन है जवानगी, दांत हिलत जब पायो 
तीजो सम्मन लाठी लेके, कम्मर दर्द करायो 
कात ईसुरी तऊ न चेते, सोई वारंट पठायो’ (प्रष्ट ६८)
यह एक चमत्कार ही है कि लोक जीवनी भी प्रशाकीय शब्दावली को इतना पैना कर जीवन-सन्देश में ढाल सकती है!    
५. क्षेत्रीय पुरातत्व और सांस्कृतिक समाहार  इस श्रेणी में १. डोलते-बोलते पाषाण खजुराहो २. अहार और खजुराहो के मंदिरों में गहोहियों का योगदान ३. क्या गहोई और जैन कभी एक थे? आयेंगे. खजुराहो पर कला, संस्कृति, इतिहास, तंत्र और सौंदर्य आदि अनेक दृष्टियों से बहुत लिखा गया है. इस पुस्तक के लेखक द्वारा प्रस्तुत एक झांकी बहुधा द्रष्टव्य है- 
‘ विविध मुद्राओं वाली अलौकिक नर्तकियां देवताओं की अनुचरियों के रूप में अंजलि में पद्म, दर्पण, घट, वस्त्रालंकार, आदि भेंट लिए अपने को विवस्त्र करती, अंगड़ाई लेती, प्रष्ट भाग को नखों से खरोंचती, पयोधरों का स्पर्श करती, बहती वेणी से जल निचोड़ती, पैरों से काँटा निकलवाती, पालित पशु पक्षी से क्रीडा करती, पत्र लिखती, वीणा अथवा बंशी बजाती, दीवार पर चित्रांकन करती, पैरों में महावर रचाती, नूपुर बंधवाती,नेत्रों में सुरमा अथा काजल लगाती, कंदुक क्रीडा करती कमनीय और संपुष्ट युवतियों का चित्रांकन देखते ही बनता है.’ (प्रष्ट ९७) 
६. परिशिष्ट  १. मैथिलीशरण गुप्त और उनकी ‘भारत भारती’ २. श्री सियारामशरण गुप्त . इन दो आलेखों को मैंने इसलिए परिशिष्ट भाग माना है क्योकि ये दोनों कवि बंधु मूलतः खड़ी बोली के साहित्य सिद्ध कवि हैं. क्षेत्र की दृष्टि से इनका चयन करते हुए क्या बाबू वृंदावनलाल वर्मा तथा विजावर के कविराज बिहारीलाल का स्मरण योग्य न होता ? किन्तु यह भी स्पष्ट ही है कि यह कोई प्रबंध ग्रन्थ नहीं है.
पुस्तक में कुछ पुनरावृत्तियाँ और मुद्रण त्रुटियाँ अवश्य शेष रह गयी हैं जिनका आगामी संस्करण में परिष्कार कर लेना उचित होगा. 
पुस्तक शोध, इतिहास दर्शन और हिन्दी साहित्य में बुन्देलखंड अचल के उचित समाहार की दृष्टि से अपरिहार्य है.                                          ३५ ईडन गार्डन, कोलार रोड भोपाल १६  

कृति- बुंदेलखंड का साहित्यिक एवं सांस्कृतिक परिदृश्य 
कृतिकार- डा. गंगाप्रसाद गुप्त ‘बरसैंया 
प्रकाशन- सन्दर्भ प्रकाशन, अलोपीबाग, इलाहाबाद 
मूल्य- रुपए- २५०/ मात्र               
                               indiamart.com/vishwatm

ज्ञान मोक्षप्रद वेद बखाना

                              ज्ञान मोक्षप्रद वेद वखाना  
                                                                                  प्रभुदयाल मिश्र 
मानस के आरणयकांड में दोहा क्रमांक १३ से १६ तक श्री राम लक्ष्मण संवाद को विद्वान ‘लक्ष्मण- गीता’ की संज्ञा देते हैं. श्री राम द्वारा ज्ञानोपदेश का यह विशेष अवसर है. मानस की दूसरी गीता ‘विभीषण-गीता’ है जो लंकाकाण्ड तथा तीसरी गीता ‘भरत- गीता’ है जो उत्तर कांड में आती है. इसी लक्ष्मण- गीता में भगवान यह सूत्रवाक्य ‘ज्ञान मोक्षप्रद वेद वखाना’ प्रदान करते हैं. 
इसमें तीन बातें प्रधान हैं  ज्ञान, मोक्ष और वेद . इन तीनों शब्दों की व्याख्या इस सूत्र को समझने के लिए आवश्यक है. भगवान का कहना है कि ज्ञान से मोक्ष मोक्ष प्राप्त होता है, ऐसा वेदों ने वर्णित किया है. सबसे पहले हम वेद के प्रमाण को ही लेते हैं. श्रुति कहती है ऋते ज्ञानात न मुक्ति. अर्थात ज्ञान के बिना मुक्ति संभव नहीं. भगवद्गीता में भी श्री कृष्ण कहते हैं- सर्व कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ( ४/३३) अर्थात हे पार्थ सभी कर्मों का परिसमापन ज्ञान में प्रतिष्ठित होने पर हो जाता है. उल्लेखनीय है कि अकेले इस चतुर्थ अध्याय में ही भगवान ने पन्द्रह वार ज्ञान शब्द का प्रयोग किया है. उन्होंने तो यहाँ यह भी कह दिया है कि ‘ज्ञान से पवित्रतर कुछ है ही नहीं’- नहि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते (४/४८). इससे ज्ञान की महत्ता की सनातन भारतीय मनीषा में प्रतिष्ठा सुपष्ट हो जाती है. 
यह ज्ञान है क्या ? गीता के दूसरे अध्याय में सत् की प्रतिष्ठा और असतके मिथयात्व का बोध कराते हुए भगवान अर्जुन को सांख्य के प्रबोध ( एषा तेभिहिता सांख्ये २/३९ ) के बाद योग की शिक्षा देते हैं. आगे सातवें अध्याय में उन्होंने अर्जुन को ज्ञान को विज्ञान सहित और विस्तार से समझाया (ज्ञानं ते सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः -७/२) यहाँ पर भगवान ने वेदान्त दर्शन की सम्पूर्ण शिक्षा प्रदान करते हुए यही कहा है कि वे ही सम्पूर्ण सृष्टि के कर्ता और नियामक हैं किन्तु माया के वशीभूत जीव उन्हें (भगवान को) अपने ही समान साधारण जीव मान लेता है- अव्यक्त व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामअबद्धय ७/२४) 
अथात शुद्ध वेदान्त की प्रतिष्ठा ही सनातन भारतीय मेधा की परिसीमा है तथा यही वास्तविक ज्ञान है. इसके द्वारा जीव में ‘ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या ब्रह्मैवनापरं’ का बोध जागता है. ब्रह्मसूत्र, उपनिषद इस ज्ञान की सम्यक प्रतिष्ठा कराते हैं. आदि शंकर ने कर्मकांड की जड़ता का प्रतिरोध कर वर्तमान युग में इस ज्ञान की पुनर्प्रतिष्ठा की. श्रुति के चार महावाक्य  अहं ब्रह्मास्मि , तत्वमसि , प्रज्ञानं ब्रह्म और अयं आत्मा ब्रह्म जीव और ईश्वर के इसी अपार्थक्य की उद्घोषणायें है.
इस लक्ष्मण गीता के प्रसंग में भी स्वयं श्री राम लक्षमण को समझाते हैं-
माया ईश न आपु कह जान कहिय सो जीव 
ध मोच्छप्रद सर्वपर माया प्रेरक सीव . आरणकांड / १५
वेदान्त कहता है कि परमब्रह्म जब माया संयुत तो होता है किन्तु इसका उसे बोध रहता है तथा वह ईश्वर कहलाता है. यही ब्रह्म पञ्च महाभूतों से जुडकर संसार और पञ्च कोशों से सम्प्रक्त हो जीव बन जाता है. इस तरह ब्रह्म या चैतन्न्य ही उपाधियुक्त होकर ईश्वर, संसार या जीव बनता है. तत्वतः इनमें कोई भेद नहीं है. इस ज्ञान को प्राप्त कर जीव परमात्मा से अपने अपार्थक्य की प्रतीति कर लेता है .
और भी सरल शब्दों में यह कहा जा सकता है कि जीव और ईश्वर में तत्वतः कोई भेद नहीं है. दोनों मायोपहित ही हैं. सूक्ष्म सा अंतर केवल इतना है कि ईश्वर को इसका ज्ञान है जबकि जीव को नहीं है. और यह ज्ञान ही मोक्ष है. 

मुक्ति के नाम पर बैकुंठ या स्वर्ग की कल्पना प्राथमिक शिक्षा के सोपान हैं. इनमें भोग की धारणा तो और भी निम्नतर है. यदि स्वर्ग भोग की ही भूमि है तबतो पशु- लोक और स्वर्ग में कोई भेद ही नहीं रहेगा. इससे भी आगे यह बोध महत्वपूर्ण है कि मोक्ष का यह विकल्प मनुष्य के सामने स्वतः खुला हुआ है. इसके लिए वह पराश्रित नहीं है. 
स्वामी अनुभवानन्द जी इस सम्बन्ध में एक बड़ा सटीक उदाहरण देते हैं. उनका कहना है इस सम्पूर्ण स्थिति की कल्पना क्रिकेट के खेल से की जा सकती है. ष्टि के इस खेल में जीव बल्लेबाज है तो संसार मैदान (फील्डिंग टीम ) है. ईश्वर अम्पायर (निर्णयकर्ता ) है. अब यह एक सीधी सी बात है. यदि बल्ले वाला वाक ओवर दे देता है, खेलना खत्म कर देता है, तो मैदान और अम्पायर का काम अपने आप खत्म हो जाता है. इसके बाद न तो संसार की कोई भूमिका शेष बचेगी और न ही ईश्वर की ! 
वास्तव में गोस्वामी तुलसीदास ने अपनी इस सूक्ति में भारतीय मेधा का सार सर्वस्व भर दिया है. अद्वैत का यह परमोच्च ज्ञान भगवान श्रीकृष्ण ने उद्धव को अपने लीला संवरण के समय भागवत के एकादश स्कंध के २८वे अध्याय में सविस्तार प्रदान किया है. यहाँ उद्धव के यह पूछने पर कि भगवन, मारता कौन है, शरीर या आत्मा? वास्तविकता तो यह समझ आती है कि शरीर जड है अतः उसका मरना निरर्थक है और आत्मा अविनाशी है अतः उसके मरने का तो प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता !
इस पर श्री कृष्ण उद्धव को समझाते हैं कि सत्य यही है कि न तो शरीर मरता है और न ही आत्मा. वास्तव में मरता तो मनुष्य का वह अज्ञान है जो आत्मा को शरीर मान रखता है-
यावद देहेंद्रियप्राणरात्मनः संनिकर्षणम् 
संसारः फलवांसतावदपार्थोप्यव्वेकिन .( श्रीमदभागवत ११/२८/१२) 
अर्थात जिस प्रकार बंधन जीव ने ही स्वीकार किया है उसी तरह मोक्ष का वरण करने की भी उसकी स्वतंत्रता है.  यह ज्ञान ही मुक्ति है  ज्ञान मोक्षप्रद वेद वखाना.
                                    ३५ ईडन गार्डन चूनाभट्टी, कोलार रोड भोपाल १६                                    indiamart.com/vishwatm