Tuesday, 2 October 2012

अगस्त्य गीता

अगस्त्य गीता
          प्रभुदयाल मिश्र, अध्यक्ष महर्षि अगश्र्त्य वैदिक संस्थानम, भोपाल www.vishwatm.com
  वाराह पुराण के अध्याय 51 और 52 में राजा भद्राष्व को ऋषि अगस्त्य ने जो ज्ञान प्रदान किया वह सृष्टि उत्पत्ति और विकास का अद्भुद कथात्मक आख्यान है । इसमें ऋग्वेद के मंडल 10 129वें नासदीय और 90वें पुरुष सूक्त के दर्षन की पौराणिक और प्रतीकात्मक व्याख्या की गई है । ऋषि अगस्त्य के इस संवाद को भगवान वाराह स्वयं देवी पृथ्विी को उसके हिरणाक्ष द्वारा हरण से उद्धार के पष्चात् पूछे जाने पर सुनाते हैं ।
 इस संवाद की पृष्ठभूमि में अध्याय 49 और 50 में ऋषि अगस्त्य की पुष्कर तीर्थ जाते हुए राजा भद्राष्व की नगरी की पूर्व यात्रा का विवरण है जब वे वहां सात दिन रुककर राजा के पूर्वकृत पुण्य के परिणाम स्वरूप उनके वर्तमान वैभव का आधार बताते हैं । तीर्थाटन से लौटकर ऋषि प्रथमतः भद्राष्व को भगवान विष्णु के कार्तिक मास की द्वादसी के व्रत की विधि और महात्म्य बताते हैं । इसके पष्चात् भद्राष्व ने ऋषि से निवेदन किया-
  भगवन्! व्ह कौनसा ऐसा कर्म है, जिसे करने से संसार से मुक्ति मिल सकती है । अथवा देहधारी एवं बिना देहवाले- सभी प्राणियों के लिए कौनसा कर्म वैध है, जिनका संपादन कर लेने पर उनके सामने शोक नहीं आ सकता ।
  महर्षि इस प्रष्न के उत्तर में राजा को सृष्टि उत्पत्ति की आख्यायिका सुनाते हैं । उनके अनुसार-यह कथा दृष्ट एवं अदृष्ट दोनों लोकों से संबंधित है । यह उस समय से संबंधित है जब दिन, रात, नक्षत्र, दिषायें, आकाष, देवता और सूर्य-सभी का नितान्त अभाव था । उस समय पषुपाल नाम के शासक थे । जैसाकि आगे स्पष्ट होता है, यह नाम परब्रह्म परमात्मा का ही व्यंजक है । इस राजा के मनमें पूर्वी समुद्र देखने की उत्कंठा जगी और वे तुरंत चल पड़े ।  उस महासागर के तट पर एक वन था और वहां बहुत से सर्प निवास करते थे । वहां आठ वृक्ष थे और एक स्वच्छंदगामिनी नदी थी । तिरछे और ऊपर की ओर गमन करने वाले अन्य प्रधान पांच पुरुष भी थे । एक विषिष्ट पुरुष था जिसके तेज के कारण एक स्त्री शोभा पा रही थी । हजार सूर्यों जैसी आकृति वाले उस महान् पुरुष को उस स्त्री ने अपने हृदय स्थल में स्थान दे रखा था । उस पुरुष के अधर पर तीन रंग वाले तीन विकार उपस्थित थे । वही पुरुष उसका संचालक था । उसकी गति कहीं रुकती न थी । उसे देखकर वह रूत्री मौन हो गई । वह पुरुष उस वन में चला गया । उसके वन में प्रविष्ट होते ही क्रूर स्वभाव वाले आठ सर्प राजा के पास पहुचे और उसके चारों ओर लिपट गए । इस अक्रमण से राजा को चिन्ता हुई कि इनका संहार कैसे हो !
   इतने में ही तीन वर्ण वाला एक दूसरा पुरुष प्रकट हो गया । उसने श्वेत, रक्त और पीत आदि तीन रूपों को धारण किया हुआ था । उसने अपना नाम जानना चाहा और कहा-‘मेरे लिए दूसरा स्थान चहिए।’ तब प्रधान पुरुष ने पूछा- ‘ कहां जाना चाहते हो?’ साथ ही उस पुरुष का नाम ‘महत्’ रख दिया । उस पुरुष ने जगन्नियंता के साथ ही रहने की अनुमति चाही । तब राजा ने कहा-तुम्हें जगत की जानकारी रखना आवष्यक है । इस पर उस स्त्री ने कहा कि -इस जगत में तो मैं ओतप्रोत हूं । तब जो दूसरा पुरुष प्रकट हुआ था उसने कहा- तुम डरो मत । इसके वाद वह वीर पुरुष राजा के पास जाकर स्वयं स्थित हो गया ।
  विचार करने पर इस वृत्त के प्रतीकार्थ इस प्रकार स्पष्ट होते हैं । प्रकृति की त्रिगुणात्मक क्षमता से प्रथतः महत् की सृष्टि हुर्इ्र । इस संसार की उत्पत्ति में इस एक विराट तत्व से जीव रूपी इकार्इ्र भी अस्तित्व में आई । इस प्रकार संसार के विस्तार का यह आदि आधार है ।
  इस कथानक की स्त्री माया है । शांकर वेदान्त की दृष्टि से यह प्रकृति का ही पर्याय है जोकि नाम रूपतामक संसार के सृजन, संपोषण और संहार का कारण है। ‘म’ धातु से निष्पन्न माया मापने का अर्थ ध्वनित करती है । संसार केा जब हम अपनी बुद्धि, इन्द्रिय बोध अथवा अनुमान के आधार पर परिमित कर देखते हैं तो अनन्त, असीम और अनादि सत्ता का मायात्मक स्वरूप ही हमारे अनुभव में आता है । श्वेतराष्वर उपनिषद् में माया को ऐसे जाल के रूप में समझाया गया है जिसे चैतन्य सत्ता ने ओड़ रखा है । इससे ऐसा प्रतीत होता है कि संसार इस जाल के नियमों में आबद्ध है । माया को असत् कहा गया है क्योंकि ब्रह्म मात्र ही एक सत्ता हेै । इसे असत् भी नहीं कहा गया है क्योंकि यह सृष्टि रचना का का आधार है । और इसे सदासत् भी नहीं कहा जा सकता क्योंकि यह कथन स्वयं में विरोधाभाषी है।
  ऋषि के कथासूत्र के अनुसार दूसरे पांच पुरुष आए और राजा के चारों ओर खड़े हो गए । उन डाकुओं ने शस्त्र उठाकर प्रधान राजा को मारने की तैयारी करली । फिर डर जाने के कारण वे एक दूसरे में लीन हो गए । उनके लीन होने पर भी राजा का भवन विषेष रूप से शोभित होने लगा । फिर पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाष आदि पांच महाभूतों ने अपना एक समूह बनाया । उस समय वायु का रूप शीतल और सुखदायी था । अन्य तत्व भी उत्तम गुण और प्रकाष से संपन्न थे । ये सभी राजभवन में आए । वहां पर प्रधान पुरुष पषुपाल के सूक्ष्म रूप को देखकर तीन वर्ण वाले पुरुष ने उनसे कहा- महाराज! म्ेरे कोई पुत्र नहीं है । उस समय पषुपाल ने पूछा-बतलाइए, आपके लिए मैं क्या करूं? तब तीन वर्ण वाले पुरुष ने उत्तर दिया- हम लोग आपको बंधन में डालना चाहते थे । यद्यपि हमने प्रयत्न भी किया किन्तु असफल रहे । राजन्! ऐसी स्थिति में अब आपके शरीर में आश्रय पाना चाहते हैं । मुझपर आपकी पुत्र भावना होनी चहिए ।
  तीन वर्ण वाले पुरुष के ऐसा कहने पर राजा पषुपाल ने उससे कहा-मैं पुत्र  ऐसा चाहता हूं जो दूसरों का भी प्रबंधक हो । इस प्रकार उसने उस तीन वर्ण वाले पुरुष को अपना पुत्र मान लिया, पर उसमें उसकी आसक्ति न हुई ।
  महषि अगस्त्य कहते हैं  िकइस प्रकार पषुपालक संज्ञक परम प्रभु ने एक पुरुष का सृजन किया और उसे शासन करने की आज्ञा दे दी । स्वतंत्र होने के कारण वह पुरुष राजा बन गया । उस पुत्र में तीन रंग थे । उसने अहंकार नामक पुत्र उत्पन्न किया । उस पुत्र से अवबोधरूपिणी (चेतना) एक कन्या उत्पन्न हुई । उस कन्या ने ज्ञान प्रदान करने की योग्यता वाले एक सुन्दर पुत्र (ज्ञान) को जन्म दिया । उस पुत्र के पांच पुत्र (ज्ञानेन्द्रियां) उत्पन्न हुए । उनमें सभी रूपों का समावेष था और वे विषयों को भोगने की रुचि रखते थे जो इन्द्रिय कहलाए ।
  यहां एक क्षण ठहरकर ऋग्वेद मंडल 1 के 164 में अस्यवामीय सूक्त के निम्न 20वें मन्त्र का स्मरण किया जा सकता है-
द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परि षस्व जाते
तयोरन्यः पिप्पलं स्वादत्त्यनष्नन्नयो अभिचाकषीति ।
  प्रधान पुरुष और गौण पुरुष में मुख्य भेद यही हेै । इस द्वितीय पुरुष में अहंकार के साथ-साथ इन्द्रिय भोग भी उत्पन्न हो गया । इसके परिणामस्वरूप इसने जो नाना प्रकार के बन्धनों युक्त अपने संसार की रचना की वह आगे इस गीता में प्रकार वर्णित होता हेै -
  इन सभी ने रहने के लिए एक सुन्दर भवन बना लिया । उनका यह मंदिर ऐसा था जिसमें नौ दरवाजे हुए और चारों ओर जाने वाला एक स्तंभ हुआ । जल से संपन्न हजारों नदियां उसे सुषोभित कर रही थीं । राजा पषुपाल अब साकार रूप धारण कर पुरुष के रूप में विराजने लगे । वेद और छंद उन्हें स्मरण हो आए । फिर उन वेदों में प्रतिपादित नियमों और यज्ञादि की उन्होने व्याख्या की ।
  किसी समय की बात है जब राजा पषुपाल के मनमें आनन्द का अनुभव हुआ । तब उन्होंने संसार की सृष्टि करने की इच्छा की और योगमाया का आश्रय लेकर एक ऐसा पुत्र प्रकट किया जिसके चार मुख, चार भुजायें, चार वेद और चार पग हुए । समुद्र, वन और तृण से लेकर हाथीप्रभृति पषु तक में उनका प्रवेष है ।
  इसके प्रतीकार्थ को स्पष्ट करते हुए ऋषि अगस्त्य राजा भद्राष्व को समझाते हैं कि पषुपाल से जिसकी उत्पत्ति हुई, उसके चार चरण और चार मुख थे । उन्हीं को इस कथा का उपदेष्टा और प्रवर्तक कहा गया है । सत्यस्वरूप स्वर ही उसका पुत्र है । उसने जो कुछ कहा है वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चारों का साधन है । इनमें जो प्रथम -धर्म है, उसका दूसरा रूप वृषभ का है । उसके चार सींग हैं- चत्वारिश्रृंगः(ऋग्वेद मंडल 4-58-3) । काम और अर्थ इसी का अनुसरण करते हैं । चौथी मुक्ति है जो परमात्मा की पुनर्प्राप्ति है । इस ब्रह्म का ही सनातन अंष मनुष्य में व्यक्त रूप से विराजमान है । इसकी प्राप्ति के साधन के रूप में वर्णाश्रम धर्म उत्तम व्यवस्था है ।
  इसके पष्चात् उस परब्रह्म ने-‘अहमस्मि’- केवल मैं ही हूं- इस प्रकार कहा । फिर वह दूसरे ही चार, एक एवं दो प्रकार के रूप से विराजने लगा । भिन्न प्रकार से उत्पन्न होने के कारण उसकी प्रजायें भी उसी का अनुसरण करने लगीं ।  सर्वप्रथम चार मुखवाले ब्रह्मा ने देखा कि कुछ प्रजायें नित्य और कुछ अनित्य हैं । तब ब्रह्मा के मनमें यह प्रष्न उठा कि जो परमब्रह्म की विषेषतायें हैं  वे उनकी संतानों में क्यों दृष्टिगोचर नहीं हैं? सामान्य सिद्धान्त से पिता के पुत्र को अपने पितामह के नाम का संरक्षक होना चाहिए । अब मुझे क्या करना चाहिए । अब ब्रह्मा ने स्वर मथना प्रारम्भ किया जिससे स्वर का सिर प्रकट हो गया । उसकी आकृति नारियल के फल के समान थी । ब्रह्मा जी के प्रयास से वह सिर फिर विभक्त हो गया । अब वे प्राण, अपान, उदान, समान एवं व्यान रूप से सामने आ गए । तब ब्रह्मा ने उन्हें ठहरने का स्थान बता दिया ।
 इस प्रकार अथक परिश्रम कर जब ब्रह्मा ने पुनः प्राणि शरीर पर दृष्टि डाली तो उन्हें शरीर के भीतर परब्रह्म परमात्मा की झांकी दृष्टिगोचर हुई । संपूर्ण प्राणियों में त्रसरेणु के समान सूक्ष्म रूप धारण कर वे सर्वत्र विराजमान थे । वे सर्वोपरि और सर्वत्र विद्यमान थे ।
  अन्ततः ऋषि का कहना था कि संपूर्ण जगत की सृष्टि से संबंध रखने वाला यह आख्यान प्रथम स्थान रखता है । जो इसे तत्व से जानता है, उसे उत्तम कर्म करने की योग्यता प्राप्त हो जाती है । 
 35, ईडन गार्डेन भोपाल 462016

Sunday, 16 September 2012

An interpretation of Daxinamurti Stotra with Introduction


                       दक्षिणामूर्ति स्तोत्र का भाव और भूमिका
              pdmishrabpl67@hotmail.com                               प्रभुदयाल मिश्र

दक्षिणामूर्ति स्तोत्र अदिशंकर का अद्वेS वेदान्त की उत्कृष्ट शिक्षा संबंधी अद~~भुद् स्तोत्र है । यह संस्कृत के शार्दूल विक्रhड़ित छन्द की मनोहारी रचना है । इसमें ज्ञान के अमूर्त विज्ञान को जैसे वेद वाक्य और गुरु उपदेशों के प्रचलित पदों में उड़ेल दिया गया है । इसकी संधि और समास से संवरी संस्कृत भाषा की बिम्ब रचना वाली सशक्त पदावली इसमें देखते ही बनती है ।
वस्तुतः यह एक शिव आराधना स्तोत्र हेS A किन्तु इसमें गुरु को प्रत्यक्ष शिव की संज्ञा प्रदान की गई है । दक्षिणामूर्ति में दो शब्द- दक्षिणा और मूर्ति एक सामासिक प्रयोग हेSa। यदि इसका बहुब्रीह समास से अर्थ लेते हैं तो इसका आशय होता है- जिनकी मूर्ति दक्षिण की ओर अभिमुख है । कर्मधारय समास के रूप में इसका अर्थ है-जो दक्ष (कुशल) और अमूर्त अर्थात् निराकार हैं । मृत्यु रूपी दक्षिण दिशा की ओर अभिमुखता भगवान शिव के कालातीत महाकालत्व की परिचायक है ।
इस स्तोत्र के संबंध में पौराणिक गाथा इस प्रकार कही जाती है । ब्रह्माजी के चार मानस पुत्र थे- सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार । वे जन्मना ही सिद्ध और तत्वज्ञान युक्त थे । उन्होंने अल्प आयु में ही ज्ञान की खोज में ब्रह्म लोक का त्याग कर दिया । उनकी यह खोज दीर्घकाल तक चलती रही । अन्ततः जब उन्हें गुरु की प्राप्ति हुई तो वे आयु वृद्ध हो चुके थे । वे अन्त में भगवान शिव के पास कैलाश पर्वत पर पहंचे । अजन्मा शिव स्वभावतः युवा हैं । वे एक वटवृक्ष के नीचे बैठे हुए हैं  । ये आयु वृद्ध शिष्य ही मौन परमगुरु शिव से यहां ज्ञान प्राप्त कर रहे हैं । कुछ विद्वानों के अनुसार ये चार वृद्ध शिष्य स्वयं चार वेद ही हैं ।
उनके मस्तक का तिलक उनके तृतीय नेत्र को दर्शाता है । उनके हाथ की रुद्राक्ष माला उनकी चिरन्तन साधनावस्था की परिचायक है । उनका त्रिशूल उनकी गुणातीत स्थिति का दिग्दर्शक है । 
भगवान दक्षिणामूर्ति के निचले बायें हाथ में भोजपत्र में लिखे गये वेद हैं। उनका दायंk निचला हाथ अभय चिन्मुद्रा में है ।  उनके हाथ की तर्जनी आत्म स्वरूप का संकेत कर रही हेS। अंगुष्ठ ब्रह्म तत्व का वोध कराता है । दक्षिणामूर्ति भगवान का दायां पांव बायें पांव के नीचे है । उनके चरण के नीचे अपस्मर नामक असुर पड़ा हुआ है । यह विस्मृति का प्रतीक है ।
इस स्तोत्र के अनुष्ठान परक पाठ को आवश्यक व्याख्या सहित नीचे प्रस्तुत किया जा रहा है ।
आवाहन मंत्र
ऊं नमो भगवते दक्षिणामूर्तये महां मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा  
ध्यान श्लोक
मौनव्याख्याप्रकटितपरमब्रह्मत्वं युवानं
वर्षिष्ठान्ते वसद्रषिगणैरावृत्तं ब्रह्मनिष्ठैः ।
आचार्येन्द्रं करकलितचिन्मुद्रमानन्दरूपं
स्वात्मारामं मुदितवदनं दक्षिणामूर्तिमीडे । 1 !
ब्रह्मनिष्ठ o`) ऋषियों से घिरे युवा गुरु मौन रह कर ब्रह्म ज्ञान प्रदान कर रहे हैं । अपने हाथ की ज्ञान मुद्रा द्वारा उपदेश करते हुए ऐसे आनन्दरूप गुरुओं के गुरु दद्विाणामूर्ति को मैं प्रणाम करता हूं । 1 

वटविटपसमीपे भूमिभागे निषण्णं सकल मुनि जनानां ज्ञानदातारमारात्
त्रिभुवनगुरुमीशं दक्षिणामूर्तिेदेवं जननमरणदुःखच्छेददक्षं नमामि । 2
वट विटप के समीप समागत मुनिजनों को ज्ञान प्रदान करते हुए जीवन और मृत्यु के संताप को दूर करने वाले तीनों लोकों के गुरु दक्षिणाewर्ति को मैं नमस्कार करता हूं । 2

चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धाः शिष्याः गुरुर्युवा गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्न संशयः
निधये सर्वविद्यानां भिषजे भवरोगिणाम् गुरवे सर्वलोकानां दक्षिणामूर्तये नमः । 3
वट वृक्ष के नीचे वृद्ध शिष्य युवा गुरु के चारों ओर बैठे हुए हैं । गुरु के मौन रहते हुए शिष्यों के सभी संशय दूर हो रहे हैं । ऐसे सभी ज्ञान के आधार, सभी रोगों के निवारणकर्ता और सभी लोकों के गुरु दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है । 3

ऊं नमः प्रणवार्थाय शुद्धज्ञानैकमूर्तये निर्मलाय प्रशान्ताय दक्षिणामूर्तये नमः । 4
जो प्रणव के अर्थ रूप हैं, शुद्ध ज्ञान स्वरूप हैं और जो परम प्रशान्त हैं ऐसे दक्षिणामूर्ति को नमस्कार है । 4

                                                     
                                                      दक्षिणामूर्ति स्तोत्र


विश्वं दर्पणदृश्यमाननगरीतुल्यं निजान्तर्गतं पश्यन्नात्मनि मायया वहिरीवोद्भूतं यथा निद्रया
यस्साक्षात्कुरुते प्रबोधसमये स्वात्मानमेवाद्वयम् तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये । 1
जेा संसार को माया के कारण अपने भीतर स्थित स्वयं से अभिन्न एक स्वप्न की भांति अथवा दर्पण में प्रकट प्रतिबिब की तरह देखता है किन्तु जो ज्ञान प्राप्त होने पर विश्व को स्वयं से अभिन्न देखता है ऐसे ज्ञान स्वरूप गुरु  दक्षिणामूर्ति को हमारा नमस्कार है । 1    

बीजस्यान्तरिवान्कुरो जगदिदं प्राङ् निर्विकल्पं पुनः मायाकल्पितदेशकालकलना वैचित्र्यचित्रीकृतम्
मायावीव विजृम्भयत्यपि महायोगीव यः स्वेच्छया तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये । 2
जो प्रारंभ में बीज के ही भीतर में एक अप्रकट अंकुर की तरह और पश्चात् एक महायोगी या इन्द्रजालिक की तरह अपनी इच्छा से माया के संसर्ग से देश और काल के रूप में नाना आकार कर लेता है ऐसे ज्ञानस्वरूप गुरु दक्षिणामूर्ति को हमारा नमस्कार है । 2

यस्यैव स्फुरणं सदात्मकमस्तकल्पार्थकं भासते साक्षात्त्तत्वमसीति वेदवचसा यो वोधयत्याश्रितपान्
यत्साक्षात्करणाद् भवेन्न पुनरावृत्तिर्भावाम्भोनिधैा तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये । 3
जिसका यथार्थ स्वरूप मिथ्या संसार की भांति प्रतीत होता है, जो तत्त्वमसित्वंवेद वाक्य से शिष्यों को प्रत्यक्ष ज्ञान कराते हैं, जिनके प्रत्यक्ष ब्रह्मज्ञान के पश्चात् संसार सागर में पुनः आवर्तन नहीं होता  ऐसे ज्ञानस्वरूप गुरु दक्षिणामूर्ति को हमारा नमस्कार है । 3

नानाच्छिद्रघटोदरस्थितमहादीपप्रभाभास्वरं ज्ञानं यस्य तु चक्षुरादिकरणद्वारा बहिस्पन्दते
जानामिति तमेव भ्रान्तमनुभात्येतत्समस्तं जगत् तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये । 4
जिनका ज्ञान एक अनेक छिद्र वाले घट के अन्दर स्थित उस प्रकाशवान दीप की तरह है जो आंख अदि नाना इन्दियों के द्वारो से प्रक्ट होता है और जो चैतन्य ज्ञान स्वरूप यह अनुभव करता है कि यह समस्त संसार उसी की प्रतीति है, ऐसे ज्ञानस्वरूप गुरु दक्षिणामूर्ति को हमारा नमस्कार है । 4

देहं प्राणमतीन्द्रियाण्यपि चलां बुद्विं च शून्यं विदुः स्त्रीबालान्धजडोपमासस्त्वहमिति भ्रान्ता भृशं वादिनः
मायाशक्तिविलासकल्पितमहाव्यामोहसंहारिणे  तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये । 5 
वे जो जड, अंधे और बालबुद्धि वाले दिग्भ्रमित विचारक द्वारा देह, प्राण, इन्द्रिय, बुद्धि और अभावात्मा शून्य को आत्मा बताने वाले माया की शक्ति से उत्पन्न अज्ञान को मिटा देते है, ऐसे ज्ञानस्वरूप गुरु दक्षिणामूर्ति को हमारा नमस्कार है । 5

राहुग्रस्तदिवाकरेन्दुसदृशो मायासमाच्छादनात् सन्मात्रः करणोपसंहरणतो योऽभूत्सुप्तः पुमान्
प्रागस्वाप्समिति प्रवोधसमये यः प्रत्यभिज्ञायते तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये । 6
जो माया से प्रभावित गहन निद्रा काल में इन्द्रिय चेतना को गृहण काल के सूर्य और चन्द्रमा के आच्छादन की तरह समेट लेता है तथा जो जागृत होने पर यह जानता है कि वह सोयाथा, ऐसे ज्ञानस्वरूप गुरु दक्षिणामूर्ति को हमारा नमस्कार है । 6

बाल्यादिष्वपि जाग्रदादिषु तथा सर्वास्ववस्थास्वपि व्यावृत्तास्वनुवर्तमानमहमित्यन्तस्फुरन्तं सदा
स्वात्मानं प्रकटीकरोति भजतां यो मुद्रया भद्रया तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये । 7
ज्ीवन की प्रत्येक अवस्था में जो सदा विद्यमान मैं हूंके रूप में अपनी उपस्थिति और प्रतीति को  अपनी ज्ञान मुद्रा के द्वारा प्रकट करता है, ऐसे ज्ञानस्वरूप गुरु दक्षिणामूर्ति को हमारा नमस्कार है । 7

विश्वं पश्यति कार्यकारणतया स्वस्वामिसंबंधतः शिष्याचार्यतया तथैव पितृ पुत्राद्यात्मना भेदतः
स्वप्ने जाग्रति वा य येष पुरुषो मायापारिभ्रामितः तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये । 8
जो माया के कारण संसार को कार्य और कारण, स्वामी और सेवक, गुरु और शिष्य, पिता और पुत्र अदि संबंधों के रूप में ज्राग्रत और स्वप्न सभी अवस्थाओं में देखता हेै ऐसे ज्ञानस्वरूप गुरु दक्षिणामूर्ति को हमारा नमस्कार है । 8

भूरम्भास्यनलनोऽनिलोऽम्बरमहर् नाथो हिमान्शुः पुमान् इत्याभाति चराचारत्मकमिदं यस्यैव मूर्त्यष्टकं
नान्यत्किंचन विद्यते विमृशतां यस्मात्परस्माद्विभोः तस्मै श्रीगुरुमूर्तये नम इदं श्रीदक्षिणामूर्तये । 9
यह चराचर विश्व पृथ्वी, जल,अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र और चैतन्य रूप अष्टधा जिसकी यह सृष्टि है और जिसकी सर्व व्यापी सत्ता के परे ज्ञानी जनों के लिए कुछ भी स्थित नहीं है, ऐसे ज्ञानस्वरूप गुरु दक्षिणामूर्ति को हमारा नमस्कार है । 9

सर्वात्मिति स्फुटीकृतमिदं यस्मादमुष्मिन्तवे तेनास्य श्रवणात्तदर्थमननाद्ध्यानाच्च संकीर्तनात्
सर्वात्मत्वमहाविभूतिसहितं स्यादीश्वरतव स्वतः सिद्धयेत्पुनरष्टधापरिणतं चैश्चर्यमव्याहतम् । 10
 इस स्तोत्र में आत्मा की जो सर्व व्यापकता प्रकट हुई है, उसका श्रवण, अर्थ मनन, ध्यान और अनुगान कर एक व्यक्ति बिना परिश्रम और बाधा के स्वात्मा में स्थिति सहित सभी अष्ट विभूति युक्त ज्ञान प्राप्त कर लेता हेै । 10
                                  ऊं तत् सत्
                                         अध्यक्ष महर्षि अगस्त्य वैदिक संस्थानम्
                                                                                          35, ईडन गार्डन, राजाभोज मार्ग, भोपाल 16

Friday, 7 September 2012

A review of Dr Nagaich's book on Maharshi Dayanand

समीक्षा
 भारतीय समाज के युगान्तरकारी प्रहरी महर्षि दयानन्द
                                      प्रभुदयाल मिश्र
डा. उमाशंकर नगाइच का पुनर्प्रकाशित ‘महर्षि दयानन्द का समाज दर्शन’ शोध प्रबंध महान् मेधा पुरुष ऋषि दयानन्द सरस्वती के अमूल्य सामाजिक अवदान के साथ-साथ उनकी उस युगान्तरकारी प्रतिभा का भी प्रामाणिक उद्घाटन करता है जिसके योग के बिना भारतीय समाज न केवल दिशाहीन रहता, वल्कि वह अपनी अपूर्णता में ही आज शेष होता । इस महामानव के व्यक्तित्व की विराटता एक अर्थ में ‘ परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्क्रताम्’ के दैवी संकल्प को ही पूरा करती प्रतीत होती है । हमारे समाज और हमारे वर्तमान युग के इस जीवन्त सशक्त प्रहरी के प्रकट और परिपूर्ण जीवन दर्शन का साक्षात्कार प्रत्येक ‘समाजिक’ के एक धर्म कर्तव्य से कम नहीं है । इस दायित्व का उत्तरदयित्वपूर्ण ढंग से स्मरण कराने के लिए डा. नगाइच निश्चित ही साधुवाद के पात्र हैं ।
एक शोध प्रबंध अपनी संदर्भ साधना और दुष्क्रमिकता में बोझिल हो जाता है । डा. नगाइच के सुदीर्घ उद्धरण प्रायः इस आशंका को जहां तहां उत्पन्न करते हैं । किन्तु किसी भी लेखन की प्रामाणिकता का संदर्भ सरोकार तो अपरिहार्य होता ही है, एक पाठक यह आश्वस्ति भी लेकर चलना चाहता हेै कि उससे विषय से संबंधित कोई महत्वपूर्ण तथ्य छूट नहीं रहा है । इस प्रकार का आश्वासन लेखक ने पूरी सिद्यत के साथ प्रस्तुत किया है । इसके लिए भी उनकी यह कृति आशंसनीय है ।
महर्षि दयानन्द वे महान् युग चेता थे जिन्होंने वेदों के विस्मृतप्राय ज्ञान को न केवल पुनर्प्रकाशित किया बल्कि सायण की परम्परा में पश्चिम के विद्वानों द्वारा इनके कर्मकाण्ड परक लौकिक भाष्य को भी विराम लगाया । स्वभाविक रूप से श्री अरविन्दो और मधुसूदन ओझा आदि कालान्तर में इनके गूढ़ रहस्यों के उद्घाटन की दिशा में प्रवृत्त हुए और वर्तमान में तो वेदों की वैज्ञानिकता विचारकों का जैसे एक आवश्यक उपादान ही हो गई है । आंतरिक तौर पर भी भारत के एक वर्ग की धर्मभीरुता में प्रायः परम्परा पोषक समाज की इतनी व्यापक चुनौतियों का सामना करते हुए शुद्ध ज्ञान और विज्ञान की उनके द्वारा प्रदान की गई दिशा सहस्राब्दियों का भी अतिक्रमण करते हुए अत्यंत दीर्घ दृष्टिपूर्ण है । आज भी इस तथ्य की कल्पना की जा सकती है कि भविष्य में जब कभी भी मनुष्य धर्म की संकीर्णताओं और ईश्वर को अपने दुराग्रहों से परे देखने की चेष्टा करेगा तो उसे ऐसा ही परमात्मा मिलेगा जो अपनी निरपेक्षता में सबका होगा । उस समय उसे सुगंध, दीपक अथवा किसी मानवीय चेष्टा से बचाने जरूरत नहीं पड़ेगी क्योंकि उसकी प्रतिष्ठा स्वसाध्य और सर्वत्र ही है ।
पुस्तक में यद्यपि महर्षि दयानन्द द्वारा संद्रष्ट भारतीय और मानव समाज विषयक दृष्टि बहुमुखी है, किन्तु यहां वर्ण व्यवस्था के संबंध में संक्षिप्त उल्लेख समीचीन प्रतीत होता है ।  ऋग्वेद से आरम्भ ‘चतुर्वर्ण’ के रूप में विज्ञात इस व्यवस्था पर लेखक ने पृष्ठ 83 से लेकर 126 अर्थात् 43 पृष्ठों में विचार किया है । अपनी व्याख्या के संपोषण में लेखक ने 100 संदर्भ ग्रन्थों का व्यापक आधार लिया है । स्वभावतः लेखक का निष्कर्ष यह है-
‘ इस वर्णन में कहीं भी ऊंच-नीच, छोटे-बडे़ या अस्पृश्य-अस्पृश्य का संबंध नहीं । मुख, बाहु, उरू और पांव-ये सभी एक ही शरीर के अंग और अपने-अपने स्थान पर सब ही समान रूप से महत्वपूर्ण हैं ।...पांव के बिना गति असंभव है । इसलिए शरीर में जो स्थान पांवों का है, वही स्थान समाज में गति और प्रगति के आधार श्रमसाधक वर्ग का है । ’                                           पृष्ठ 116
जन्म से ही कोई उच्च वर्ण का नहीं हो जाता, इसकी पुष्टि में लेखक ने अनेक उदाहरण देते हुए बताया है कि वशिष्ठ वेश्या, पाराशर चाण्डाली, वेदव्यास मल्लाह कन्या, मतंग और जाबाल शूद्र कुल में उत्पन्न होकर भी ऋषि हुए हैं । क्षत्रिय कुल के पृषध को हत्या के कारण शूद्र हो जाना पड़ा ।  क्षत्रिय विश्वामित्र ने तपस्या से ब्राह्मणत्व प्राप्त किया । इतरा नाम की दासी से उत्पन्न ऐतरेय महीदास शूद्र माता के पुत्र थे किन्तु वे ब्राह्मण ग्रन्थ के रचयिता बने । मातंग चाण्डाल कुल के होकर भी ऋषि बन गए । नागवर्गीय अर्बुद ने वैदिक सूक्तों को रचा । इसी तरह दीर्घतमा उशिज नामक दासी और कक्षीवान् इलूष नामक दासी से उत्पन्न हुए थे । असुर कुल की स्त्री से उत्पन्न त्वष्टा पुत्र विश्वरूप देवताओं के पुरोहित बने । कण्व पुत्र वत्स का जन्म भी असुर माता से हुआ ।  इत्यादि ।
लेखक की भाषा विषय के अनुरूप परिनिष्ठित और सार संग्रही हेै । मुद्रण कार्य में भी, विशेषकर संस्कृत संदर्भेां की शुद्धता पर आवश्यक ध्यान दिया गया है जो लेखक में आर्ष परम्परा के समर्थ संवहन का ही प्रकटीकरण है ।
पुस्तक- महर्षि दयानन्द का समाज दर्शन
लेखक- डा. उमाशंकर नगाइच
प्रकाशक- आर्ष गुरुकुल महाविद्यालय, नर्मदापुरम्
मूल्य-300 रुपये                 अध्यक्ष महर्षि अगस्त्य वैदिक संस्थानम्, 35 ईडन गार्डन, राजाभोज मार्ग, भोपाल 16

Tuesday, 21 August 2012

A reviw and comments on 'Being Different' of Rajiv Malhotra

I have gone through Rajiv Malhotra's 'Being Different' with curiosity and enthusiasm. It is no doubt a masterpiece in the sense that it brings out a fairer side of Indian way and thought which the author boldly calls 'dharm' as opposed to a limited concept known as 'religion' by so called secular west or its followers.
Engaging one self with a seemingly defiant world with deep commitment and concept of deeper meaning of his side, mr. Malhotra undoubtedly exibits a long patience and suffering and he certainly deserves a pointd attention by all those who genuinely look for seeking truth in the light of all past endeavour of human beings and the faithful conclusions reached after a long drawn research and experiments deep within all human beings as well as the world ouside.
Some other responses which I would definitely like to make at the outset are firstly those which arise out of the feeling that perhaps Mr. Malhotra could also try to be more objective and critical about the Indian side as well. It might at times look like a nostalgia which all indians living abroad must undergo out of their attachment to their motherland and because of a  common human  psyche of glorifying all past. I also wished that mr malhotra could well remember anand coomar swami writing 'dance of shiva' in 1918 from the same platform -Boston- although born to an English  woman and having been educated only in west. It may seem that not a single word requires an alteration in that book even after such a long lapse of time. Mr Malhotra's book should in fact be a step forward in that direction.
I am further bewildered by the use of the term 'purva paksh' by Shri Malhotra so vigourously. The term would literally mean one side,the side of the first argumentator, but terming it to be the side of truth is an exaggeration.  Moreover, the Vedantic side of the Indian perception is not well brought out simply because it might imply a withdrawl, an idifference of an average 'dharmic' kind. Contrastingly though, the author certainly deliberately refrains from gathering courage to contradict Islamic view with equal vigour and force.
I do certainly await an overwhelming outreach of this classic confrontation by a scholar of deep understanding, skill and insight.
Pd mishra, www.vishwatm.comprabhudmishra@yahoo.co.in

Monday, 25 June 2012

Atmkathya

               
क्या कहूं आज, जो नहीं कही                                        प्रभुदयाल मिश्र
      यह एक अतिरंजना ही होगी यदि मैं शीर्षक के पूर्वार्ध की काव्य पंक्ति-‘दुख ही जीवन की कथा रही ’ से यह आत्मकथ्य आरम्भ करता हूं । वैसे अपने आप को खास, अलग और महत्वपूर्ण सिद्ध करने का यह जरिया सर्व स्वीकृत है-विशेषकर रचना क्षेत्र में क्योंकि उसकी क्षमता इस निज को पर में ढाल चुकने का माद्दा रखती है -( कम से कम उसका दावा तो ऐसा होता ही है !) पर मुझे लगता है कि यह भी एक प्रकार का अतिक्रमण ही है-दूसरे की आजादी का । चूंकि दूसरों को अपने दुख से दबाने की कोशिश मात्र ही एक अन्याय, अत्याचार और नाफरमानी है, अस्तु! परन्तु....
    कहने और सुनाते रहने के लिए हम क्या-क्या रास्ते नहीं खोजते रहते हैं। क्या यह हमारा आत्मालाप ही नहीं है, प्रायः? पर अपने आपसे बतियाते रहने से कौन किसको रोक सकता है? इसमें दूसरे की आपत्ति का प्रश्न ही कहां उठता है?
   किन्तु शायद अपने आपको समझने और समझते रहने का हमारे पास इससे अच्छा कोई उपाय ही नहीं होता । आखिर धारणा, ध्यान अथवा समाधि क्या है? ये साधन हमें अपने आप ही के तो निकट पहुचाते हैं । यहां तक कि क्रिया, प्रेम और भक्ति भी आपने समर्पण की पूर्णता में अपनी फैली पहचान तक ही पहुंचाती है ।
   और ऐसे में यदि कोई अन्य आप बीती अथवा आगे पड़ती स्वयं की छाया को देखकर कुछ आनन्द ले सकता है तब तो यह रचनाकार की सिद्धि ही हो गई । सब दूर जो इतना छूटता जा रहा ह,ै समेटने स,े और जो एकदम आदमी के निकट है, उसे सहेजकर उसके हाथ में रख देने का संतोष भी कोई कम तो नहीं ही है । 
   मैं क्या कहूं अपने आपको-कवि, साहित्यकार, लेखक, विचारक अथवा कुछ और ? यह द्विविधा मेरे नाम जैसी ही है । एक सनातनी भक्त मेरी मां ने मेरा नाम रखा ‘प्रभ’ु । स्कूल में दर्ज होने पर यह हो गया ‘प्रभुदयाल मिश्र’। कालेज में आकर यह हो गया ‘मिश्रा प्रभुदयाल’ । सरकारी नौकरी में इसे गति देते हुए बना दिया गया-पी डी मिश्रा । यह निगुणीर्, निराकार नाम उच्चारण और प्रवाह की दृष्टि से करीब चालीस वर्ष तक बखूबी चला । बीच बीच में इसे कला और रचनाधर्मिता से जोड़ने के बाहर और भीतर के आग्रहों को दर किनार करते हुए मैंने जैसे ये दो छोर उनकी अपनी ही जोर आजमायश के लिए छोड़ रखे है । इतना जरूर हुआ कि आयातित नाम-पी डी मिश्रा मेरी अंग्रेजी रचनाओं से जुड़ गया । हिन्दी लेखन में अपने आपको और अधिक गुमशुदी में न डाल देने की चेष्टा में अब प्रभुदयाल मिश्र ही शेष हूं ।
   यही परेशानी जन्म तिथि के बारे में भी चल रही है । प्राईमरी कक्षा में मास्टर साहब ने अपने पूर्वानुमान से दो वर्ष आगे की तिथि दर्ज करली । मिडिल स्कूल में एक शुभ चिंतक ने इसे डेढ़ वर्ष पीछे एक मार्च 1948 कर दिया । ज्योतिष में भविष्य दर्शन के लिए जब 16 अक्तुबर 1946 की जन्मकुण्डली देखने की स्थिति आई तो देर हो चुकी थी । मित्रवर श्री कमलकान्त जी ने इसका एक हल निकाला है । उनका कहना है कि हम पैदा कभी भी हुए हों, हमारा वास्तविक जन्म तो हमारी लोक स्वीकृत पहचान ही सिद्ध करती है । ज्योतिष शास्त्र में भी प्रश्न कुण्डली और वर्ष कुण्डली बनती है । अतः उन्होंने सरकार की तरह 1 मार्च को ही मान्यता दी है । अब मैं अपने जन्म की तरह इस बेबशी को नकार भी कैसे सकता हूं !
   फेसबुक में यही तिथि दर्ज चल रही थी । बहुत से मित्रों ने इस पर जब बधाई देना भी शुरू कर दिया तो मैंने अपना धन्यबाद देते हुए एक समाधान गीता के इस श्लोक का उल्लेखा करते हुए प्राप्त किया-
   अजोपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोपि सन्
   प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया । गीता 4 । 6
 अर्थात् एक अर्थ में हम सभी अजन्मा ही हैं इसलिए पैदा होने की तिथि एक तात्कालिक सुविधा से अधिक और कुछ नहीं है। और यदि हमने कोई तिथि या तारीख निकाल या मान भी रखी है तब भी हमारी सनातन पहचान तो अप्रभावित ही रहेगी । अस्तु !
   अपने बहनोई श्री रामदेव जी मिश्र की कवितायें सुन-सुन कर लिखना मैंने 14 वर्ष की ही उम्र में शुरू कर दिया । उस समय अपने गांव पर लिखी एक लम्बी कविता की ये पंक्तियां मुझे अभी भी याद हैं-
      किन्तु बड़ी थी पुण्यमयी तू पुहुमि धन्य, गौरवशाली
      पाकर तुझ श्रेष्ठ अवनि तल को यह हुआ ग्राम समृद्धिशाली !
   ओरछा राज्य के कवि केशव और चालीस के दशक के कुण्डेश्वर से प्रकाशित ‘मधुकर’ की विरासत का जरूर कृछ असर होगा कि बी ए प्रथम की परीक्षा देकर मैंने ‘शिवप्रिया’ और बी ए अन्तिम वर्ष की परीक्षा देकर गर्मियों की छुट्टी में ‘समर्पण’ खण्डकाव्य लिखा । सागर विश्वविद्यालय पहुंचकर ऐसा लगा कि हिन्दी तो जैसे आ ही गई और शेष री आ भी जायेगी, किन्तु अंग्रेजी पढ़ लेना ज्यादा उपयोगी रहेगा । इसे जैसे मैं आज भी नकार न सकूंगा । और छूटा हुआ अतीत तो रह रह कर आता ही रहता है, अतः अब पछतावा भी किस बात का ?
   किन्तु क्या मैं कवि शेष रह सका? कविता के क्षेत्र में प्रकाशित कृतियां तो मुख्यतः काव्याानुवाद ही हैं-‘सौन्दर्य लहरी’ और ‘वेद की कविता’। आगे स्वतंत्र ‘वैदिक कविताओं’ के प्रकाशन का कब समय आयेगा, कौन जानता है!
   60-70 के दशक में प्रकाशित/अप्रकाशित कहानियों का संग्रह आ सकता था किन्तु तब प्रकाशक कहां होते थे! आखिर 96 में आत्मकथात्मक ‘उत्तर-पथ’ और 2001 में औपनिषिदिक उपन्यास ‘मैत्रेयी’ आया तो गद्य लेखन में जैसे प्रवृत्ति ही हो गई । योग और अध्यात्म का एक साहित्य पक्ष भी हो सकता है, यह मेरे मन में कहीं गहरे पैठा था । गीता और वेद के सम्बंध में अंग्रेजी और हिन्दी की दो-दो किताबें संभवतः इस धारणा की ही परिणति हैं ।
   ‘तंत्र दृष्टि और सौन्दर्य सृष्टि’ (विश्व विद्यालय प्रकाशन वाराणसी, 2007) की भूमिका में मैंने लिखा है-‘ कभी-कभी कविता कर्म को साधना का पर्याय भी माना जा सकता है । ऐसे में उसकी अनुष्ठानात्मक शक्ति बेजोड़ हो जाती है । जब कोई कविता शुद्ध साधनात्मक ही तो वह न केवल साहित्यकार, अपितु उसके पाठक और रस स्रोताओ की जीवन दृष्टि बदल सकती है ।’  
    कविता यदि मनोमय कोष का उद्घाटन है तो बुद्धि निश्चित ही उसके परे है। क्या ज्ञानमय और विज्ञानमय कोष में पहुंचकर कविता छूट नहीं जायेगी, यह प्रश्न मेरे मन में बना रहा है । फिर आनन्दमय कोष की तो बात ही कहां उठती है! किन्तु इसमें दो मत नहीं हो सकते कि संसार का श्रेष्ठतम लेखन और संदेश कविता के माध्यम से ही युग युगों से लोक-लोकान्तर में प्रसरित हुआ है । वेदांे के मन्त्र द्रष्टा ऋषि, वेद व्यास और तुलसी आदि को कोई मनोमय कोष का यात्री कैसे कह सकता है!
   अर्थात् कवि अपनी सामर्थ्य के बूते सात लोक और सातों समन्दर पार कर सकता है, इसमें संदेह नहीं किया जा सकता। और कहीं यदि संदेह है तो वह निश्चित ही कवि की क्षमता का होगा, कविता का नहीं ।
    कविता के उपासकों के लिए भी संभवतः योग साधकों की भंाति श्री कृष्ण का यह आश्वासन लागू हो सकता है-
     पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते
     न हि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति
                               गीता 6-40
    शर्त केवल ठीक पैमानेे की ही है । कविता के (यज्ञ ) लोक-कल्याण के पक्ष को अनदेखा न करने की है । ऐसे कवि और कविता के संबंध में ही वेद स्पष्ट घोषणा करता है-
     प्राप्त करते प्राप्य वे वक्ता प्रखर
     यज्ञ से गौरव गिरा
     जे निहित सप्तर्षि स्वर में
     मन्त्र, लय विस्तार वाली
     देश-देशान्तर गई
     वह ऋचा, कविता
     छन्दमय रचना ।
                      ( वेद की कविता/वि.वि.प्र./58)
                       35, ईडन गार्डन, राजाभोज (कोलार मार्ग) भोपाल 462016

Atmkathya

Sunday, 24 June 2012

श्री महेन्द्र शर्मा की ‘वह बूंद अभिलाष’ स्ंक्षिप्त टिप्प्णी


आदरणीय श्री शर्मा जी,
आपकी पुस्तक वह बूंद अभिलाषअभी पूरी नहीं कर सका हूं । चंूकि कहीं बाहर जा रहा था सो लगा कि कुछ तो अपनी बात कहूं इसलिए यह संक्षिप्त कथनः
भारतीय दर्शन के सनातन पक्ष पर पश्चिम के विचारकों की समस्वरता /समरूपता का आकलन उन्हें सार्वभैमिकता प्रदान करता है, यह निर्विवादित है । किन्तु यहां कठिनाई यह है कि इसका रूपान्तरण यदि हिन्दीतर हिन्दी के प्रभाव में अमूर्तता लिए हो तो यह दुरूह विषय और भी दुरूह हो जाता है । विषय की क्रमबद्धता, तारतमितता और संप्रेषणीयता की चिन्ता किए बिना लेखक अपनी बात किस सीमा तक पाठक के पास पहुंचा सकता है, यह तो विचारणीय ही है ।
यह हो सकता है कि लेखक बहुत से विषयों पर केवल टिप्पणी करते हुए समझदारपाठकों को निष्कर्ष लेने के लिए स्वतंत्र छोड़ रहा हो, लेकिन इस प्रत्याशामें वह (पाठक) पीछे ही न छूट जाय, मेरे विचार से यह ध्यान तो लेखक के लिए आवश्यक ही है ।
कुछ स्थान (पृ. 45) ऋत् शब्द तीन प्रकार से लिखा/छपा है । पृष्ठ
51 में ब्राह्मणक्या ब्रह्मन्है? यह ब्रह्मभी हो सकता है !
कृपया क्षमा करें, पहली ही प्रतिक्रिया ऐसी, शायद यह मेरी सीमा हो, पर पाठक असीमक्षमतावान् होगा यह अभिलाषा’...भी कैसी!
आपकी अपनी क्षमता निश्चित ही अप्रतिम है । इतना अध्ययन और मनन आपके संस्कार, शिक्षा और संकल्प की अतुलनीयता का ही प्रमाण है ।
भवदीय
प्रभुदयाल मिश्र
pdmishrabpl67@hotmail.com