Sunday, 26 June 2022

कथा-कठौती की समीक्षा

 कृति - कथा कठौती

लेखिका - बिनय षडंगी रामाराम 

प्रकाशक- शिवम् प्रकाशन, प्रयागराज 

मूल्य - रुपये ४००

 

                   लोक की वेद-व्याप्ति अर्थात् कथा कठौती 

                  प्रभुदयाल मिश्र 

 

'स्वर्ग का द्वार', 'किसी को तो शिव बनना होगा' और 'तथैव ' आदि कालजयी कृतियों के बाद जब डा बिनय राजराम जी बाल मनोविज्ञान परक 'कथा कठौती' बाल-कथा संग्रह की रचना करती हैं तो चिरंजीवी मार्कण्डेय से सम्बन्धित भगवान् विष्णु की प्रलय-पार की बाल छबि- दर्शन के इस श्लोक का स्मरण हो आना स्वाभाविक है

करारविन्देन पदारविंदं मुखारविन्दे विनिवेशयन्तम् 

वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बालमुकुन्दं मनसा स्मरामि  

इस परम साक्षात्कार की पृष्ठभूमि भी अद्भुत है भगवान् शंकर की कृपा से अपनी किशोर वय में ही सदा स्थित रह जब मार्कण्डेय जी ने छ: मन्वंतरों की चिरजीविता में भगवान् विष्णु से उनकी माया का साक्षात्कार करने की प्रार्थना की तो उन्होने विष्णु की दुस्तर माया से उत्पन्न महाजल प्लावन में अपने आपको स्थित पाया आकाश, पाताल और पृथ्वी के थपेड़ों के बीच अनेक कल्पांतों के बीत जाने पर अतिशय संतप्त उन्हें अंतत: बालमुकुन्द के दर्शन हुये और इसके बाद उन्होने अपने आपको पूर्ववत् यज्ञाग्नि में आहुति दान के लिये उठाये गये हाथ सहित यथावत उद्यत पाया

जब बिनय कहती हैं मन चंगा तो कठौती में गंगा ।  इस छोटी-सी 'कथा-कठौती' में बाल-कथाओं की गंगा का पुनीत प्रभाव समा जाने की चाह है- तो राम के पाँव धोने के लिये केवट के 'पानि कठौता भरि ले आवा' का स्मरण आना स्वभाविक है वह कठोता कुछ बड़ा रहा होगा बिनय की इस कठौती से क्योंकि उसके पास दृश्यमान भूत और भविष्य का सत्य भी था पर बिनय जी ने जीवन के थपेड़ों और तीखे आघात से उबरने के लिये कालक्षेप का अब बड़ा सशक्त माध्यम अपना लिया है इस प्रकार बालमुकुन्द के अवराधन और केवट-पात्र की निश्छल, निर्मलता में अपने को निखारने का यह उपक्रम उनकी परायात्रा का मंगलायतन है  

बिनय ने अपनी पूर्विका में उपनिषद्, जैन, बौद्ध आख्यान, बाइबिल, पंचतंत्र, जातक कथाओं, सिंहासन वत्तीसी और कथा सरित्सागर आदि का सम्यक् उल्लेख किया है जिनमें मानवीय शैशव, प्रकृति, नीति, रस और जीवन के आदर्श जीवन की समरसता के सार स्वर  विद्यमान रहे हैं यहाँ मुझे अंग्रेज़ी के रोमान्टिक ऐरा के कवि वर्ड्सवर्थ की प्रसिद्ध कविता टिंटर्न ऐबी की कुछ पंक्तियाँ उद्धृत करने का मन है जिसमें प्रकृति के साथ बाल मन की उदात्त निश्छलता की अलौकिक झलक दिखाई पड़ती है इसमें कवि अपनी छोटी बहिन डोरोथी को भी प्रकृति के एकाकार देखता है -

But oft, in lonely rooms, and 'mid the din

Of towns and cities, I have owed to them, 

In hours of weariness, sensations sweet, 

Felt in the blood, and felt along the heart;

And passing even into my purer mind

With tranquil restoration

.....

How often has my sprit turned to thee! 

...

And this green pastoral landscape, were to me 

More dear, both for themselves and for thy sake! 

सूर के कृष्ण कभी ऐसे ही भाव बोध की लीला में उद्धव को कह रहे थे

जबहि सुरति आवत वा सुख की जिय उमगत तनु माहीं 

ऊधौ मोहि ब्रज बिसरत नाहीं  

भक्ति की पुष्टि मार्गीय परंपरा में अष्टछाप के कवि छीत स्वामी की एक कथा का स्मरण भी मुझे यहाँ हो रहा है जब बाल-कृष्ण आधी रात उनकी कुटिया में प्रकट होकर उन्हें एक भक्त गोपिका के यहाँ मक्खन की चोरी करने ले साथ गए और छीतस्वामी को पकड़वा कर खुद साफ बचकर निकल आए ! इससे तो यही समझ आता है कि भगवत साक्षात्कार का सरल और सिद्ध मार्ग तो जैसे वतसलता से ही गुजरता है ! और यह तो कहा ही जाना चाहिए कि अध्यात्म में गति और जीवन में प्रगति का पर्याय संभवत: बचपन का भाव, प्रपन्नता का लौटना ही है – सकृदेव प्रपनय तवास्मि इति याचते – (वाल्मीकि रामायण)

समीक्ष्य पुस्तक के तीन प्रमुख खण्ड हैं - बाल मनोभावों की साम्यता में पशु-पक्षियों के कथा-रूप इसमें चटोरा कौआ गोकि इतना चटोरा भी नहीं लगता वह कुंदरू खाने के लिये कितने- कितने बेगार नहीं उठाता माली की खुरपी की आवश्यकता, लोहार की मटकी की आवश्यकता और कुम्हार के गधे की सेवा की पूर्ति कर ही उसे कागभुषुण्डि की तरह संतोष का महामन्त्र मिलता है इस तरह उसमें श्रम, कुशलता, बुद्धि और लक्ष्य के प्रति तल्लीनता की अद्भुत मानवीय क्षमतायें दिख जाती हैं  

और तो और एक कोयल के साथ तुलना किये जाने पर भी कौआ इक्कीस ही ठहरता है कोयली के अंडों को अपने घोंसले में सेते हुये कोयली के ताने सुनने और सहने की क्षमता में बिनय द्वारा उसे सभी युगीन अभिशाप से मुक्त करने का यह एक अच्छा उपक्रम है  

तीसरी कहानी के कुयें और तालाब के मेंढक का संवाद मुझे ऋग्वेद के प्रसिद्ध मंडूक सूक्त की ओर ले जाता है  

वैसे मंडूक के वेदपाठी होने का प्रमाण तो गोस्वामी दे ही देते हैं - दादुर धुनि चहुँ दिसा सोहाई वेद पढहिं जनु वटु समुदाई  

बिनय के इन मेंढकों ने कुछ तरीक़ा तो वेद से ही उठाया है ज़रा ध्यान दें मंडल १० के सूक्त ८२ के मंत्र के इस काव्यानुवाद पर  

एक बोली सीख 

वह दूसरा

दुहराता 

कुशलता पूर्वक जल में 

कि जैसे शिष्य गुरु से 

सीखता होता

इस खण्ड का गप्पू हाथी और चितेरा मोर भी अपनी रोचकता और संदेशवत्ता में परिपूर्ण हैं न्याय प्रिय राजा का न्याय तो सचमुच ही निराला और कल्पनातीत ही है एक साथ ही लोक और परलोक को साध लेने की ऐसी क्षमता किसी वेताल विजयी विक्रम की हो सकती है यह ज़रूर है कि कोई बड़ा बच्चा लेखिका से यह पूछ भी सकता है कि क्या विक्रमादित्य ने कभी कॉमन सिविल कोड पर कोई विचार कर रखा था

'बच्चों की भीड़ से 

राज्य को बचाना था 

दो ही बच्चे अच्छे हैं 

यह संदेश भी देना था ( पृष्ठ ४१

दूसरा खण्ड लोक-कथा प्रधान है इसकी मुख्य विशेषता यह है कि चूँकि ये कथायें लेखिका के जन्म स्थल उत्कल प्रदेश -उड़ीसा प्रान्त की हैं अत: पश्चिमी, मध्य और उत्तर भारत के हिन्दी पाठकों को इनमें नवीनता मिलेगी ग्रामीण बालक बलराम के भय को दूर करने के लिये स्वयं गोपाल का आना, ईर्ष्या द्वेष और स्वार्थ के स्थान पर वनदेवी तपई में सदाशयता की जय और चंड अशोक का धर्म-अशोक बन जाना इतिहास की लोक लेखनी से जैसे एक पुनर्लेखन का कार्य ही है इसी तरह चाहे कोणार्क निर्माण के शिल्प कौशल की अलौकिकता और नन्हें शहीद बाज़ी का जंगल की रक्षा में आत्म वलिदान के चरित्र हों, वे पूर्व के इस महाकाश के ऐसे नक्षत्र हैं जो अचल और अमिट ही रहने वाले हैं  

तीसरे खण्ड में लेखिका जैसे अपने वर्तमान को भी अतीत की चादर में ओडाने के लिये सन्नद्ध है इसमें चार कहानियाँ हैं पहली उज्जैन के अतीत में ले जाती है, दूसरी दीपावली त्योहार के दिनों का सिलसिलेवार विवरण पहुँचाती है, तीसरी जंगल के राजा शेर तथा चौथी शक्तिमान बरगद की आत्मकथायें हैं ज़ाहिर है इन सभी विषयों पर बड़े शोधपूर्ण आलेख, उपन्यास और बड़े ग्रन्थ भी लिखे जा सकते हैं किन्तु कथाकार बिनय ने यहाँ अपनी भूमिका एक बाल-कथाकार की ही अख़्तियार की है अत: इनका बाना आत्मकथा, डायरी और यात्रा वृतान्त जैसा है इसमें उज्जैन के सिंहस्थ का कारण संशोधित करने का परामर्श मुझे देना है सिंहस्थ ' तिथि के अनुसार वह दिन सिंह राशि में पड़ने के कारण' नहीं बृहस्पति गृह के सिंह राशिस्थ होने के कारण है यह स्थिति १२ वर्षों में पुन: लौटती है क्योंकि बृहस्पति को प्रत्येक राशि में एक-एक वर्ष चलते हुये सिंह राशि में वापिस आने के लिये १२ वर्ष लग जाते हैं  

अंतिम कहानी शक्तिमान बरगद में बौन्साई के बरगद का विराट में रूपान्तरण बहुत रोचक है ठीक सप्तवर्णी साहित्य कला केन्द्र की पहचान की तरह ! स्वयं ही सिद्ध है यह कि राजाराम दंपत्ति ने इस उद्यान को सजाने संवारने में कितनी तपस्या और श्रम नहीं किया है !  

 

आवरण, चित्रांकन कृति में प्रख्यात् महा कला मर्मज्ञ रामाराम जी की विरासत और कल-छाया के पग-पग पर दर्शन होते हैं - आवरण पृष्ठ से अंतिम पृष्ठ तक निर्वाध। चित्र बाल मनोविज्ञान के समनुरूप कथा-सूत्रों को बुनने, संवारनें और कथा मर्म को पैनापन प्रदान करने वाले हैं  

काव्य कलियाँ - प्रत्येक कहानी के आदि, मध्य और अंत में नट-नटी, नांदी कथन और भरत-वाक्य जैसी कविता पंक्तियाँ यह उद्घोष करती चलती हैं कि यह कृति काव्य कारयित्री शक्ति वाली बिनय षडंगी रामाराम की स्वयं की प्रकृत पहचान है  

प्रूफ़ सुधार

1.     पृष्ठ १६ अंतिम पैरा, अंतिम पंक्ति - उपहरा - उपहार 

2.     पृष्ठ ३३ नीचे चौथा पैरा - पसनद -पसंद 

3.     पृष्ठ ८३ - ऊपर से चौथी पद पंक्ति - देखा - देखी 

4.     पृष्ठ ९१- नीचे से चौथी पंक्ति - भैवर - भैरव 



35 ईडन गार्डन, चूनाभट्टी, कोलार रोड भोपाल 462016 

निर्वचन माह जून तुलसी मानस भारती 2022


निर्वचन (जून 22) 

                                    चिरजीवी – चिरंजीवी 

            सप्त चिरजीवियों के साथ चिरंजीवी मार्कंडेय जी को स्मरण करने की परंपरा सनातन है । यह इसलिए भी स्मरणीय है क्योंकि जहाँ चिरंजीविता एक कल्प की है (विभीषण को श्री राम ने वरदान दिया – करहु कल्प भर राज तुम) वहीं श्री मार्कंडेय जी तो भगवान शिव के प्रसाद से मुनि लोमश की ही तरह प्रलयांत तक चिरंजीवी हैं । फिर हम कागभुशुंडि जी को भी कैसे भुला सकते हैं जिनके संबंध में स्वयं भगवान शिव का साक्ष्य है - जासु नाश कल्पांत न होई ! अस्तु चिरजीवियों का एक पृथक क्रम भी कुछ इस प्रकार बनता है – अपने प्रत्येक रोम की संख्या में प्रति कल्प तक जीने वाले लोमश जी, कल्पांत के प्रलय के साक्षात्कर्ता मार्कण्डेय जी और कल्पांत को भी अतिक्रांत करते काग भुशुंडि जी !   

भगवान शिव की अहैतुकी कृपा प्राप्त यमराज की सत्ता का अतिक्रमण कर जन्मना अल्पायु के मार्कण्डेय जी को जब अपनी चिरंजीविता में भगवान की माया के दर्शन की कामना हुई तो उन्हें महाप्रलय का साक्षात्कार हुआ जिसके महाजल प्लावन की अनंतता में अंतत: भगवान ने जिस अलौकिक छ्वि के दर्शन कराये उन ‘बाल मुकुन्द’ का ‘चिरजीवी मार्कण्डेय’ द्वारा साक्षात्कार तो जैसे वैष्णव जनों की परम निधि ही है - 

करारविन्देन पदारविंदं मुखार्विन्दे विनिवेशयन्तम् 

वटस्य पत्रस्य पुटे शयानं बाल मुकुंदं मनसा स्मरामि ।    

यह सही है कि जीवन, जगत और परमात्मा की सत्ता का सत्य किसी निर्वचन का विषय नहीं है । क्रांत-दर्शी भारतीय ऋषियों की परा प्रज्ञा ने उसका साक्षात्कार किया है और उसे पश्यन्ती वाक् के जिस परार्द्ध में प्रकट किया है उसे समझने और समझाने की चेष्टा मात्र ही हो सकती है । 

दीर्घजीविता प्रत्येक जन्म लेने वाले प्राणी की जैसे जन्मना अभीप्सा है । अत: सात चिरजीवियों संबंधी यह श्लोक अपनी फलश्रुति सहित किसी के भी के मुखाग्र पर देखा जा सकता है – 

अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनूमांश्च विभीषण:

कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन: । 

सप्तैते संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्

जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित: ॥  

इस सूची के द्वापर युगीन महाभारत के दो योद्धा अश्वत्थामा और उनके मामा कृपाचार्य की विशिष्ठता पर उनके कौरवों के पक्ष लेने को लेकर प्राय: प्रश्न उठता है जबकि शास्त्र सूचना के अनुसार ये महानुभाव अगले मन्वंतर में सप्त ऋषियों की नई सूची में सम्मिलित होने वाले हैं । यह तो स्पष्ट है कि ये ऋषि कुलीन है । श्री कृप गौतम ऋषि के कुल के हैं जबकि अश्वत्थामा भारद्वाज वंशज हैं । किन्तु मूलत: ये शिव गण हैं तथा महाभारत काल में अपनी विहित भूमिकाएँ संपादित कर अगले मन्वंतर में अपनी प्रतिष्ठा के लिए वर्तमान में तप निरत हैं  ।        

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तुलसी मानस भारती के अप्रेल 22 अंक में डा. प्रेम भारती का एक आलेख ‘मैं विभीषण’ छ्पा था । इस पर पाठकों की प्रतिक्रिया सकारात्मक थी । तथापि विभीषण द्वारा व्यक्त इस पीड़ा कि उनका नाम लोग क्यों नहीं रख रहे हैं, पर गुफा मंदिर, भोपाल के महंत श्री राम प्रवेश दास जी ने आगे यह कहा कि यह तब है जबकि विभीषण चिरजीवी हैं ! तथापि उनके द्वारा यह व्यावहारिक समाधान भी दिया गया कि नाम लोग संक्षिप्त, प्रवाही और परंपरा के प्रभाव में रखते हैं । और विभीषण तो वैसे भगवान की भक्ति में सर्वथा आप्तकाम ही हैं अत: उनमें किसी पीड़ा का भाव एक लक्षणा प्रयोग ही हो सकता है ।  


प्रभुदयाल मिश्र, प्रधान संपादक, तुलसी मानस भारती



 

निर्वचन मानस भारती माह जुलाई 2022

 निर्वचन जुलाई 22

 

                          विशिष्ठाद्वैत वैष्णव- परंपरा

 

भोपाल के 66 वर्ष पुराने रामानद संस्कृत महाविद्यालय के गुफा मंदिर प्रांगण में 5 जून से 9 जून ’22 तक आद्याचार्य रामानंद जी के सिद्धान्त ग्रंथ श्रीवैष्णव मताब्ज भास्कर” पर श्रीमज्जगद्गुरु द्वाराचार्य मलूकपीठाधीश्वर स्वामी श्री राजेंद्रदास देवाचार्य जी महाराज का  व्यासपीठस्थ निर्वचन हुआ । यद्यपि प्रतिदिन तीन घंटे की समयावधि में बोलते हुये उन्होने केवल इस ग्रंथ के तीन- प्रकृति, जीव और ब्रह्म विषयक श्लोकों की भूमिका का ही प्रवर्तन किया, किन्तु स्वामी जी का कहना था कि इसका विषय विस्तार वे आगामी कथा क्रमों के आरंभ में करते रहेंगे ताकि इस महत्तर विषय का सम्यक् निर्वहन हो सके ।

श्री देवाचार्य जी इस अवसर पर तुलसी मानस भारती के स्वर्ण जयंती विशेषांक के विमोचन के लिए मानस भवन भी पधारे और अनंतर उन्होने अपने मुख्य सम्बोधन में तुलसी मानस भारती अप्रैल अंक 22 की इस स्थापना कि विशिष्ठाद्वैत की रामाश्रयी शाखा के प्रवर्तक रामानुजाचार्य जी थे, के संदर्भ में श्रीअगस्त्य संहिता, श्रीवाल्मीकिसंहिता, श्रीवसिष्ठसंहिता, श्रीमैथिलीमहोपनिषद् और आचार्य संहिता के आधार पर कहा कि इस श्री संप्रदाय की परंपरा सर्वेश्वर श्रीराम से आरंभ होकर श्री सीता, हनुमान, ब्रह्मा, वशिष्ठ, पाराशर, व्यास, शुकदेव, बोधायन और श्री रामानंद के द्वारा ही तारक मंत्र द्वारा लोक विस्तारित हुई है –

गृहीत्वा विधिवद् रामान्मंत्रराजं षडक्षरम्

भारत के अतीत में जाते हुये स्वामी जी ने बताया कि देश के दुर्निवार इतिहास में वैदिकी हिंसा के निवारण के लिए बुद्धावतार हुआ किन्तु इससे वेद का ज्ञान-खंड विलुप्त होने लगा जिसके लिए आदिशंकर ने ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या का प्रवर्तन किया । यद्यपि शंकर भगवद्पाद महान् उपासक थे जैसाकि उनके सभी देवों से संबन्धित स्तोत्रों से स्पष्ट होता है, किन्तु इसके लिए जन-जन को संवल प्रदान करने वाले परमेश्वर की उपलब्धता और नैकट्य के आश्वासन की महती आवश्यकता थी जिसका महनीय कार्य श्री रामानन्द के रूप में साक्षात् भगवान राम ने ही प्रादुर्भूत होकर सम्पन्न किया –

श्रीरघुवर अवतार ले प्रगटे रामानन्द

कलिमहॅं जे मतिमंद अति मुक्त किए नरवृन्द ।

श्री रामानन्द जी वैष्णव मत के श्रीसंप्रदाय के आचार्य थे। उन्होने श्रीभाष्य, वेदार्थसंग्रह, गद्यत्रय, वेदांतसार आदि ग्रन्थों की रचना की । श्रीरामानन्द जी द्वारा श्रीराम का मंत्रराज षडाक्षरी तारक राम मंत्र वेदार्थ संपृक्त और तथैव प्रतिपादित है ।

रामचरित मानस के पठनकर्ता को इस मंत्र की महत्ता के सूत्र मानस में प्राप्त करते हुये बहुत हर्ष का अनुभव होगा । सबसे पहले भगवान शिव पार्वती को काशी के मुक्तिदायनी होने का रहस्य बताते हुये यही कहते हैं कि ऐसा करने की उनकी क्षमता इसी मंत्र से प्राप्त हुई है –

कासी मरत जन्तु अवलोकी । जासु नाम बल करऊँ बिसोकी ।

जब महर्षि वाल्मीकि भगवान श्री राम को उनके रहने के लिए निवास बताते हैं तो एक महत्वपूर्ण निवास कक्ष उनके हृदय में आरक्षित करने का उनके द्वारा अनुरोध यह किया जाता है –

“मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा”

और सबसे बढ़कर तो स्वयं भगवान ही शबरी को नवधा भक्ति का उपदेश देते हुये यही कह देते हैं –

‘’ मंत्र जाप मम दृढ़ विश्वासा । पंचम भजन सो बेद प्रकासा । “

यहाँ यही ध्यातव्य है कि वेद में विवर्णित यह मंत्र भगवान का अग्नि बीजात्मक तारक मंत्र ही है ।

इस विषय में आगे भी यथावसर विचार किया जाएगा जिसके लिए हमें पाठकीय प्रतिक्रिया की भी प्रतीक्षा रहेगी ।

 

प्रभुदयाल मिश्र

प्रधान संपादक                                                   

Friday, 15 April 2022

तुलसी मानस भारती संपादकीय मई 2022

 निर्वचन मई 2022

 

 

                                स्वागतेय सांस्कृतिक अनुष्ठान

नव विक्रम संवत 2079 के नवोन्मेष पर मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग के सौजन्य से महाराजा विक्रमादित्य शोध पीठ और स्वराज संस्थान संचालनालय, मध्य प्रदेश भोपाल ने श्री राम तिवारी के सम्पादन तथा पं चन्दन श्याम नारायण व्यास और राजेश्वर त्रिवेदी के सहयोग से 40 पृष्ठीय जिस विक्रम पंचांग का प्रकाशन किया है वह भारत-राष्ट्र के गौरव की उस महान विरासत का अवलेख है जिसका हमारी वर्तमान शिक्षा, संस्कृति और संदेश के रूप में अध्ययन और अध्यवसाय देश के प्रत्येक नागरिक का प्रथम कर्तव्य होना चाहिए । ईशवी सन से 57 वर्ष पहले उज्जैन के महाराज विक्रमादित्य ने शकों पर विजय के पश्चात चैत्र शुक्ल की प्रतिपदा से आरंभ वर्ष भारत के आत्म गौरव तथा भारतीय अस्मिता का बोधक प्रतीक है । जिस महादानी, संस्कृति, विज्ञान और अध्यात्म के पुरोधा की राज्य सभा में महाकवि कालिदास, वराहमिहिर, वेताल भट्ट, अमरसिंह, घटखरपर, धन्वंतरि, वररुचि, शंकु, क्षपणक आदि नवरत्न उपस्थित हों उसका दिक्काल दर्शन कितना बहुआयामी होगा, उसकी आज तो कल्पना भी की जाना कठिन है ।

इस पंचांग की पृष्ठ सामग्री में वेद और विज्ञान के त्रिकाल द्रष्टा ऋषि वामदेव, अंगिरा, अगस्त्य, भारद्वाज; भेषज धन्वन्तरि, सुश्रुत, चरक; वेदांग दर्शन और विज्ञानविद कणाद, बौधायन, लगध; राजनीति शास्त्री चाणक; गणितज्ञ खगोल शास्त्री वाराहमिहिर, वररुचि; रसायन शास्त्री व्याडि; ज्योतिर्विद भास्कराचार्य और भोगवादी दर्शन के प्रणेता चारवाक आदि के संबंध में महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है साथ ही यह भी बताया गया है कि हम किस प्रकार पश्चिम के पिछलग्गू बन उनके अधकचरे ज्ञान को बटोरकर अब तक वर्तमान के अंधेरे में इठलाते रहे हैं । गोस्वामी तुलसीदास जी ने संभवत: उन्हीं के संबंध में यह सटीक टिप्पणी की है –

काँच किरिच बदले ते लेहीं । कर ते डारि परस मनि देहीं । (उत्तरकाण्ड 120/12)

विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद के मण्डल 1 के दीर्घतमा ऋषि द्वारा संदृष्ट 164 वें सृष्टि सूक्त के मंत्र 11 में इस प्रकार 12 महीनों और 360 दिन तथा 360 रातों के संवत्सर की रोचक अवस्थिति अनुकल्पित की गई है –

द्वादशारं नहि तज्जराय वर्वेति चक्रं परि द्यामृतस्य

आ पुत्रा अग्ने मिथुनासो अत्र सप्त शतानि विश्तिश्च तस्थु: ।

अर्थात सूर्य का बारह अरों (महीनों) वाला चक्र पृथिवी के चारों ओर घूमता है और वह कभी भी जीर्ण नहीं होता । हे अग्ने! सात सौ बीस जोड़े पुत्र (360 दिन और 360 रातें) हमेशा रहते हैं ।

इस प्रकार यहाँ सूर्य, पृथिवी और भारतीय चांद्र पंचांग की अवधारणा की वेद मूलकता स्पष्टत: प्रतिपादित हुई है ।

इसी प्रकार अथर्ववेद कांड 10 के स्कंभ (विश्वरूप ज्योतिर्लिंग) नाम के सातवें सूक्त की ऋचा 6 में भी अद्भुद् मंत्र सृष्टि की गई है-  

क्व प्रेप्सन्ती युवती विरूपे अहोरात्रे द्रवत: संविदाने

अहा ! ये दो श्याम (रात) और धवल (दिन) युवतियाँ किस दिशा में भागी जा रही हैं !

वास्तव में अतीव वेगवान निर्वन्ध काल को लौकिक संगणना की सीमाओं में बांधने का काम तो अपौरुषेय महाकाल की ही सामर्थ्य हो सकती है । अत: यदि महाकाल की अवन्तिका के महाराज विक्रमादित्य ने उनकी कृपा से यह सामर्थ्य प्राप्त की तो इसका समादर करना भारतीय प्रज्ञा का धर्म कर्तव्य ही है ।

 

प्रभुदयाल मिश्र

प्रधान संपादक    

                                      

Friday, 25 March 2022

तुलसी मानस भारती का संपादकीय अप्रैल 2022

 श्री रामानुजाचार्य की विशिष्ट‘अद्वैत’ प्रतिमा 

 

5 फरवरी 2022 को प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने हैदराबाद में रामानुजाचार्य जी की हजारवीं जयंती पर आयोजित भव्य सहस्राब्दी समारोह में स्टेचू आफ ईक्वालिटी नाम की 216 फीट ऊंची और 120 किलो सोने की प्रतिमा का अनावरण कर इसका संस्थापन सम्पन्न किया । विश्व की दूसरी सबसे ऊंची इस प्रतिमा को स्वभावत: गिनीज़ बुक में भी स्थान मिला । श्री रामानुजाचार्य जी वर्ष 1017 में तमिलनाडु के श्रीपेरांबूदूर मैं जन्मे थे । उन्होने यद्यपि आदि शंकर की परंपरा में अद्वैत वेदान्त की शिक्षा प्राप्त की थी किन्तु श्री यमुनाचार्य जी से वैष्णव दीक्षा प्राप्त कर वे सर्व सुलभ विशिष्ट सगुण ब्रह्म मत ‘विशिष्ठाद्वैत’ के सूत्रधार बने जिससे भारत में सगुण भक्ति की रामाश्रयी और कृष्णाश्रयी धाराएँ निसृत हुईं । इनमें क्रमश: रामाश्रयी में द्वादश महाभाग संत और कृष्णाश्रयी में अष्टछाप (सूरदास, परमानन्ददास, कुम्भनदास, कृष्णदास, नन्ददास, चतुर्भुजदास, गोविन्दस्वामी और छीतस्वामी) भक्त कवियों ने जन्म लिया जिंहोने पराधीन भारत की चेतना में नूतन ऊर्जा का संचार किया । 

श्री रामानुजाचार्य की भक्ति परंपरा क्रम में चतुर्थ श्री राघवानंद के शिष्य श्री रामानन्द का जन्म 1299 ई. में प्रयाग में हुआ । इनके द्वादश महाभाग शिष्यों में एक शिष्य श्री नरहर्यानन्द थे जिनके शिष्य गोस्वामी तुलसीदास थे । इस प्रकार रामोपासकों और गोस्वामी तुलसीदास के कृतृत्व प्रेमियों के लिए यह ऐतिहासिक उपक्रम निश्चित ही बहुत महत्व का है ।

यहाँ प्रसङ्गत: द्वादश महाभागों के अर्थ संदर्भ का भी उल्लेख उचित प्रतीत होता है । संत परंपरा में इस श्लोक का मंगल पाठ आज भी एक सुविहित परंपरा है –

स्वयंभूर्नारद: शंभु: कुमार: कपिलो मनु:

प्रहलादो जनको भीष्मो बलिर्वैयासकिर्वयम । (श्रीमद्भाग्वत 6-20)  

इस श्लोक में यमराज अपने दूतों को समझाते हुये यह कह रहे हैं कि कि उक्त द्वादश महाभाग सम्पूर्ण भागवत रहस्य को जानने वाले हैं, अत: वे स्वयं भगवत् स्वरूप ही हैं । 

इस संत परंपरा में यह भी मान्यता है कि उक्त सभी महाभाग रामानन्द जी के शिष्यों के रूप में विश्व के कल्याणार्थ इस प्रकार उत्पन्न हुये तो जैसे ब्रह्मांड की समस्त विभूतियाँ ही इस धारा को इस प्रकार संपृक्त करने धरा धाम पर अवतीर्ण हुई थीं –1. श्री अनन्तानन्द जी ब्रह्मा जी, 2. श्री सुखानन्द जी शंकर जी,3. श्री योगानन्द जी कपिल देव जी, 4. श्री सुरसुरानन्द जी नारद जी,5. श्री गालवानन्द जी शुकदेव जी,6. श्री नरहरियानन्द जी सनतकुमार जी,7. श्री भावानन्द जी जनक जी,8. श्री कबीरदास जी प्रह्लाद जी,9. श्री पीपा जी राजा मनु जी,10. श्री रैदास जी धर्मराज जी,11. श्री धन्ना जाट जी राजा बलि जी और 12. श्री सेन भक्त जी भीष्म जी

आस्था पथ का यह पर्मैश्वर्य भक्ति मार्ग की पराकाष्ठा ही कही जा सकती है !

भक्ति की इस सगुण धारा के अधिसंख्य भारतीय जनों को आज निश्चित ही यह अत्यंत प्रसन्नता का विषय है कि इसके आदि नायक की मूर्ति स्थापना इतने भव्य स्वरूप में सम्पन्न हुई । इसे भारत की अखंडता और इसके मूल की गह्वरता में अनुभव कर भारतीय मानस के यह अति आह्लादित होने का स्पष्ट अवसर है । यह ज्ञातव्य है कि नाभादास जी ने कलियुग के भक्तों का आरम्भ श्री रामानुजाचार्य से ही करते हुये अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ भक्तमाल के इस छप्पय में भगवान् के अवतारों की ही पुनरावृत्ति प्रकट स्वीकार की है -

(श्री)रामानुज उदार सुधानिधि अवनि कल्पपतरु

विष्णुस्वामी बोहित्थ सिंधु संसार पार करु

ध्वाचारज मेघ भक्ति  सर ऊसर भरिया।

निंबादित्य आदित्य कुहर अज्ञान जु हरिया॥

जनम करम भागवत धरम संप्रदाय थापी अघट।

चौबीस प्रथम हरि बपु धरे त्यों चतुर्व्यूह कलिजुग प्रगट॥

                            (भक्तमाल, उत्तरार्ध-28)